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नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल, पर सच में क्या आप खुश हैं?
अपर्णा पांडेय फेलो/ हडसन इंस्टीच्यूट, अमरीका
Updated Thu, 26 May 2016 02:51 PM IST
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- फोटो : Dasarath deka
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जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार चुनी गई थी तब केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में एक उम्मीद जगी थी। इस सरकार से विदेश और आर्थिक नीति में ठोस कदम उठाने की उम्मीद थी।
किन दो साल बाद ये आशा अब निराशा की ओर बढती नजर आ रही है। जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने दावा किया था कि वही एक नेता हैं जो भारत को आगे की ओर बढा सकते हैं।
लगा था कि वे भारत को आर्थिक तौर पर पिछडा रखने वाली नीतियों को बदलने का काम करेंगे।
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किन दो साल बाद ये आशा अब निराशा की ओर बढती नजर आ रही है। जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने दावा किया था कि वही एक नेता हैं जो भारत को आगे की ओर बढा सकते हैं।
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लगा था कि वे भारत को आर्थिक तौर पर पिछडा रखने वाली नीतियों को बदलने का काम करेंगे।
उम्मीद थी कि वे न्यूनतम सरकार के साथ अधिकतम प्रशासन उपलब्ध करा सकें
उनसे ये भी उम्मीद थी कि वे न्यूनतम सरकार के साथ अधिकतम प्रशासन उपलब्ध करा सकते हैं। लेकिन बीते दो साल में इस सरकार ने ऐसे कदम नहीं उठाए जिससे ये लगे सरकार अपने वादों पर खरी उतरे। यहां तक कि सरकार फिजूल के आतंरिक विवादों में उलझती दिखाई दे रही है।
सरकार का सारा जोर राज्यों के चुनाव जीतने में लग गया है, यह भूलते हुए कि जनता को उनसे प्रशासन की उम्मीद थी और अगर वे बेहतर प्रशासन दे पाते तो चुनाव अपने आप ही जीत जाते।
सरकार का सारा जोर राज्यों के चुनाव जीतने में लग गया है, यह भूलते हुए कि जनता को उनसे प्रशासन की उम्मीद थी और अगर वे बेहतर प्रशासन दे पाते तो चुनाव अपने आप ही जीत जाते।
संप्रदायिकता की लड़ाई औऱ मोदी सरकार
नई सरकार के आते ही कई राज्यों में, खासकर उन राज्यों में जो चुनाव की ओर जा रहे थे, वहां सांप्रदायिक तनाव की खबरें आनी शुरू हुईं। घर वापसी, गोवध पर पाबंदी और गोमांस खाने पर पाबंदी की मांग उठी।
यहां तक कि महाराष्ट्र की प्रदेश सरकार ने बीफ रखने या खाने पर कानूनी पाबंदी लगा दी। इस सरकार ने व्यर्थ में हैदरबाद विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थाओं पर प्रहार किया जो वामपंथियों के प्रभाव में समझी जा रही थीं।
यहां तक कि महाराष्ट्र की प्रदेश सरकार ने बीफ रखने या खाने पर कानूनी पाबंदी लगा दी। इस सरकार ने व्यर्थ में हैदरबाद विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थाओं पर प्रहार किया जो वामपंथियों के प्रभाव में समझी जा रही थीं।
मोदी सरकार ने विदेश नीति में जरूर कुछ करने की कोशिश की है
इसका नतीजा यह भी हुआ कि सभी दल एकजुट हो करके इस सरकार की ससंद में एक नहीं चलने दी और महत्वपूर्ण कानून पारित नहीं हुए। लेकिन मोदी सरकार ने विदेश नीति में जरूर कुछ करने की कोशिश की है और इसमें नरेंद्र मोदी की छाप नजर आती है।
मोदी ने चीन और पाकिस्तान से संबंध सुधारने में कई नए कदम उठाए हैं। इसके अलावा उन्होंने अमरीका, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, अफगानिस्तान, अरब देश, इसराइल से अपने संबंध बढाए हैं, हालांकि यह नीति कितनी कारगर होती है, यह देखना अभी बाकी है। लेकिन यह सराहनीय तो है ही।
मोदी ने चीन और पाकिस्तान से संबंध सुधारने में कई नए कदम उठाए हैं। इसके अलावा उन्होंने अमरीका, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, अफगानिस्तान, अरब देश, इसराइल से अपने संबंध बढाए हैं, हालांकि यह नीति कितनी कारगर होती है, यह देखना अभी बाकी है। लेकिन यह सराहनीय तो है ही।
भारत-अमेरिका को पास लाने का क्रेडिट तो मोदी को ही जाएगा
जहां तक अमरीका से संबंध है, दोनों देश आर्थिक और सामाजिक पहलुओं में, जनतंत्रात्मक होने के नाते एकसमान भी हैं और मोदी में इन दोनों देशों को पास लाने का माद्दा भी है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)