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मोदी ने पूछा, 'सरकारी नौकरी, फौज में कितने मुसलमान हैं'

Mon, 25 Apr 2016 01:47 PM IST
नितिन श्रीवास्तव/ बीबीसी संवाददाता
नितिन श्रीवास्तव/ बीबीसी संवाददाता Updated Mon, 25 Apr 2016 01:47 PM IST
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Modi asks for data on number of Muslims in government jobs
मुस्लिमों के साथ नरेंद्र मोदी - फोटो : Getty

भारत की अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने कहा है कि दो हफ्ते पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकारी नौकरियों में मुस्लिम भागीदारी का डाटा मांगा है। बीबीसी हिंदी से एक खास बातचीत में कैबिनेट मिनिस्टर हेपतुल्ला ने कहा कि भारत में मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए भाजपा नहीं, बल्कि पुरानी सरकारें जिम्मेदार रही हैं।

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उन्होंने कहा, "नरेंद्र मोदी ने पता करना चाहा है कि आखिर सरकारी नौकरियों और सर्विसेस (फौज) में मुसलमानों समेत अल्पसंख्यक समुदाय के कितने लोग काम कर रहे हैं। मोदी जानना चाहते हैं मुस्लिमों के कम प्रतिनिधित्व की आखिर वजह क्या रही है?"
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दशकों तक कॉंग्रेस पार्टी की सांसद और अब भाजपा की वरिष्ठ मंत्री नजमा हेपतुल्ला का मानना है कि भारत के अल्पसंख्यक समुदायों पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उससे कहीं कम दिया गया है। उन्होंने कहा, "मेरे पास हज मंत्रालय भी है और मेरी मुश्किल का अंदाजा इस बात से लगाइए कि मैं पिछले कई दिनों से एक संयुक्त सचिव जैसे वरिष्ठ अफसर की तलाश में हूँ क्योंकि हज का मामला है और वहां आना-जाना भी होगा। इसीलिए मुझे मुस्लिम अफसर चाहिए, जो कि मुझे ढूंढने पर भी नहीं मिल पा रहा है।"

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सरकारी प्रतिनिधित्व पर एक रिपोर्ट संसद में पेश

Modi asks for data on number of Muslims in government jobs
मोदी ने मांगा है मुस्लिमों की नौकरियों का हिसाब - फोटो : Getty

नजमा हेपतुल्लाह ने इन आरोपों का भी खंडन किया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के सत्ता सँभालने के बाद अल्पसंख्यक समुदाय में अपनी सुरक्षा को लेकर कथित बेचैनी बढ़ी है।  बहरहाल, 2005 में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने जस्टिस राजिंदर सच्चर के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया था जिसने भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक और सरकारी प्रतिनिधित्व पर एक रिपोर्ट संसद में पेश की थी।

2006 में पेश हुई इस रिपोर्ट के अनुसार ब्यूरोक्रेसी में मुसलमानों का प्रतिशत मात्र 2.5 फीसदी था जबकि उस समय भारत की आबादी में उनका हिस्सा 14 फीसदी से भी ज्यादा था। उस रिपोर्ट के आठ वर्ष बाद जेएनयू के प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के नेतृत्व में एक और कमिटी का गठन हुआ था जिसने 2014 अक्तूबर में अपनी रिपोर्ट पेश की थी।

अल्पसंख्यक समुदाय की मौजूदा स्थितियों का विश्लेषण करने वाली इस रिपोर्ट के भी मुताबिक सच्चर कमेटी के बाद से इन समुदायों पर सरकारों का ध्यान तो बढ़ा है लेकिन अभी भी वो पर्याप्त नहीं है।

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