मोबाइल ने बदली नक्सल प्रभावित इलाकों की जिंदगी, घने जंगलों में अब हो रही परिवर्तन की बात!

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 25 Jul 2020 08:27 PM IST
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Naxal Affected Area, Chattisgrah
Naxal Affected Area, Chattisgrah - फोटो : Amar Ujala

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सार

  • सीआरपीएफ की बदौलत नक्सली इलाकों में लगाए मोबाइल टावर
  • इलाकों के लोग अपने बच्चों को पढ़ने की लिए भेज रहे हैं 'आश्रम'
  • सीआरपीएफ ने हर टावर पर जवान तैनात किए और सुरक्षा अपने नियंत्रण में ली

विस्तार

देश के नक्सल प्रभावित इलाके मसलन बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, राजनांदगांव, खूंटी, लातेहार, गिरिडीह, पलामू, गढ़चिरोली और जमुई आदि के घने जंगलों में अब परिवर्तन की बात हो रही है। नक्सल इलाके की जिंदगी ने एक नई करवट ली है। इस नए दौर की गवाह 'सीआरपीएफ' बनी है। कुछ समय पहले तक यहां दो ही बातें देखने को मिलती थीं।
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नक्सलियों के खौफ के चलते शाम होने से पहले अपने घरों में घुस जाओ और दूसरा, सुरक्षित सुबह का इंतजार करो। इनमें से कई इलाके तो देश-दुनिया से बिल्कुल कटे हुए थे। मोबाइल फोन मिला तो नक्सलियों ने टावर नहीं लगने दिया। जो लगा, उसे जला दिया।
सीआरपीएफ ने धुर नक्सली इलाकों में जब मोर्चा संभाला तो लोगों की जिंदगी में बदल गई। सीआरपीएफ की सुरक्षा में अब वहां मोबाइल टावर भी लगा और गूगल भी चल गया। नतीजा, जंगल में रह रहे लोगों ने अपने बच्चों को दूर पढ़ने के लिए भेज दिया। जो नहीं जा सके, उनके लिए सीआरपीएफ ने कंप्यूटर लैब तैयार करा दी।
 
सीआरपीएफ के डीआईजी 'इंटेलिजेंस' एम. दिनाकरण और दंतेवाड़ा की 111वीं बटालियन के सीओ अंब्रेश कुमार बताते हैं कि पहले इन इलाकों में बाहरी दुनिया का संपर्क उतना नहीं था। सड़क, परिवहन एवं दूसरी मूलभूत सुविधाओं की भी कमी थी। कोई बीमार होता तो उसे इलाज कराने में दिक्कत होती थी।

चूंकि नक्सल प्रभावित इलाकों में सीआरपीएफ ने अब अपना एक मजबूत नेटवर्क स्थापित कर लिया है, तो अब हमारा प्रयास है कि लोगों को अधिक से अधिक सुविधाएं मिलें। सीआरपीएफ, सिविक एक्शन प्रोग्राम के तहत ही नहीं, बल्कि अपनी तरफ से भी इन लोगों की हर संभव मदद करती है। कई बार लोगों को अस्पताल जाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिलती तो ऐसी स्थिति में सीआरपीएफ अपनी गाड़ी मुहैया कराती है।

सबसे बड़ी बात यह थी कि इन लोगों के पास ऐसा कोई जरिया नहीं था, जिससे ये खुद की तुलना बाहरी दुनिया के साथ कर सकें। सीआरपीएफ टीम जब किसी ऑपरेशन या सर्च पर निकलती तो ये लोग जवानों के पास मौजूद फोन को छू कर देखते थे। जब कभी फुर्सत और रेंज होती तो जवान उन्हें मोबाइल पर कोई वीडियो या फोटो दिखा देता था। इससे उनकी खुशी और उत्साह दोगुना हो जाता था।
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