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मनरेगा: कोरोना संक्रमण में 'देवदूत' बनी इस योजना पर नहीं हुई सरकार की खास कृपा
Mon, 01 Feb 2021 10:23 PM IST
सुरेंद्र जोशी
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Mon, 01 Feb 2021 10:23 PM IST
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MANREGA
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कोरोना संक्रमण के दौरान ग्रामीण भारत के लिए देवदूत बनकर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की मदद करने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 'मनरेगा' योजना पर मौजूदा बजट में खास कृपा नहीं हुई।
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कोरोना काल में एक लाख करोड़ से ज्यादा खर्च
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट 2021-22 में मनरेगा के लिए 73,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। कोरोना काल में इसके बजट पर 1,11,500 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। उस वक्त बड़े पैमाने पर शहरों से ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन हुआ था। पिछले साल केंद्र सरकार ने मनरेगा के तहत अतिरिक्त बजट का प्रावधान कर दिया था। इससे काफी हद तक ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को रोजगार मिलने में खासी सुविधा हासिल हुई थी। सितंबर 2020 में रोजगार मांग का स्तर 22 करोड़ से ज्यादा हो गया था। सितंबर 2019-20 के दौरान रोजगार की मांग 16 करोड़ से अधिक थी।
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पिछले साल रखे थे 61 हजार करोड़ से ज्यादा
वित्त वर्ष 2020-21 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में मनरेगा के लिए 61,500 करोड़ रुपए आवंटित किए थे, लेकिन उसके बाद जब कोरोना संक्रमण फैला तो शहरों से ग्रामीण इलाकों में मजदूरों का भारी संख्या में पलायन शुरु हो गया। सरकार के सामने यह संकट था कि अब एकाएक इतनी बड़ी संख्या में गांव में आने वाले लोगों को रोजगार कैसे उपलब्ध कराया जाएगा। तभी केंद्र सरकार ने मनरेगा के लिए 40,000 करोड़ रुपए के अतिरिक्त बजट का ऐलान कर दिया। सरकार ने पूरे वित्त वर्ष में इस योजना के लिए कुल एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की धनराशि आवंटित की। वर्ष 2020 में पहली छमाही के दौरान ही मनरेगा पर 64,000 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके थे।
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कोरोना काल में योजना से मिली ताकत
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार का कहना है कि कोरोना में इस योजना ने ग्रामीण क्षेत्र को एक बड़ी ताकत प्रदान की थी। केंद्र सरकार को ग्रामीण रोजगार संकट के मद्देनजर मनरेगा के लिए बजट को बढ़ाना चाहिए था। बजट में ग्रामीण अर्थ नीति को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरी पकड़ रखने वाले अविक साहा बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के संसाधन बढ़ाने की जरुरत है। एक परिवार को सालाना बीस हजार रुपये की आमदनी मनरेगा से होना चाहिए।