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Metro Man E Sreedharan: क्या इन वजहों से मेट्रो मैन श्रीधरन ने राजनीति से लिया संन्यास, समझिए उन पांच संभावित कारणों के बारे में

Thu, 16 Dec 2021 06:39 PM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Thu, 16 Dec 2021 06:39 PM IST
सार

यह पूछे जाने पर कि क्या वह किसी पछतावे के कारण राजनीति छोड़ रहे हैं, ई श्रीधरन ने कहा कि जब वह मार्च में भाजपा में शामिल हुए, तो उन्हें लगा कि केरल में पार्टी की अच्छी संभावनाएं हैं लेकिन अब स्थिति बदल गई है।
 

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Metro Man and BJP leader Sreedharan makes surprise exit from active politics, know reasons, state unit of the bjp of kerala has been paralysed by controversy,
ई. श्रीधरन

विस्तार

मेट्रो मैन श्रीधरन ने इसी साल मार्च में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली और केरल की पलक्कड़ विधानसभा सीट से पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़े। हालांकि वे यह चुनाव हार गए थे। लेकिन जिस तरह श्रीधरन सबको चौंकाते हुए भाजपा में शामिल हुए थे उसी तरह अचानक उन्होंने गुरुवार को राजनीति से संन्यास भी ले लिया। उन्होंने मलप्पुरम में संन्यास की घोषणा करते हुए कहा कि मैंने चुनाव में हुई अपनी हार से सबक लिया है। 
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श्रीधरन ने और क्या कहा? 
उन्होंने कहा कि ‘जब मैं हार गया तो इसने मुझे दुखी कर दिया। लेकिन अब मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं जीत भी जाता तो कुछ नहीं हो सकता था। मैं कभी राजनेता नहीं था। मैं कुछ समय के लिए नौकरशाही से राजनीति में आया। मैंने देर से राजनीति में प्रवेश किया लेकिन उससे बाहर निकलने में देर नहीं हुई है। मैं अब 90 वर्ष का हूं। मैं एक नौजवान की तरह इधर-उधर नहीं भाग सकता। मैं तीन अलग-अलग ट्रस्टों से जुड़ा हूं और मैं अपना बाकी समय उनके साथ बिताऊंगा’। यह पूछे जाने पर कि क्या वह किसी पछतावे के कारण राजनीति छोड़ रहे हैं, ई श्रीधरन ने कहा कि जब वह मार्च में भाजपा में शामिल हुए, तो उन्हें लगा कि केरल में पार्टी की अच्छी संभावनाएं हैं लेकिन अब स्थिति बदल गई है।
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Metro Man and BJP leader Sreedharan makes surprise exit from active politics, know reasons, state unit of the bjp of kerala has been paralysed by controversy,
मेट्रो मैन ई. श्रीधरन - फोटो : ANI
स्थितियां बदल गईं से श्रीधरन का इशारा किस ओर है? क्या उनके राजनीति छोड़ने की वजहें ये हैं।

नंबर 1-अपनी एक सीट भी नहीं बचा पाई भाजपा
भाजपा के लिए केरल अभी भी एक अबूझ पहेली की तरह है। भगवा पार्टी ने देश के सबसे साक्षर राज्य में हिंदुत्व के आधार पर विधानसभा चुनाव में अपना जनाधारा बढ़ाने की कोशिश की लेकिन लेकिन 2021 के विधान सभा में पार्टी अपनी एक मात्र  सीट नेमोम भी नहीं बचा पाई। केरल की राज्य इकाई अन्य राज्यों की इकाई और संगठनों की तरह केंद्र की मोदी सरकार की उपलब्धियों को भुनाने में विफल रही। जबकि चुनाव से पहले भाजपा नेताओं ने बड़े-बड़े वादे किए थे। केरल में इस बार भाजपा कुल 115 सीटों पर चुनाव लड़ी थी।

हालांकि 2016 के चुनाव में जहां छह विधानसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर थी, वहीं इस बार नौ विधानसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे। 2009 के लोकसभा चुनाव में, भाजपा का कुल वोट शेयर यहां 6.3 प्रतिशत था। वो 2014 में बढ़कर 10.3 फीसदी हो गया। 2016 के विधानसभा चुनाव में, भाजपा ने केरल में अपना वोट शेयर बढ़ाकर 14.9 फीसदी कर लिया और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी इसे बनाए रखा।

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केरल में भाजपा के नेता कुम्मनम राजशेखरन - फोटो : एएनआई
नंबर 2- खराब छवि संकट में फंसा राज्य नेतृत्व
कहा गया इस साल हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कथित तौर पर प्रचार पर 400 करोड़ रुपये खर्च किए। त्रिशूर में भाजपा के चुनावी फंड के 3.5 करोड़ रुपये लूटे जाने को लेकर भी सवाल उठे थे। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जून में इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश पर जांच शुरू कर दी है।  वहीं, राज्य भाजपा अध्यक्ष के सुरेंद्रन के खिलाफ अपने विरोधी उम्मीदवार को पैसे देकर नामांकन वापस लेने और आदिवासी नेता सीके जानू को भाजपा में शामिल होने के लिए 10 लाख रुपए दिए जाने की घटनाएं भी सामने आईं। राज्य नेतृत्व अपने सबसे खराब छवि संकट में फंस गया।

नंबर 3-पार्टी नेता अंदरुनी कलह में फंसे थे
मीडिया रिपोट्स के मुताबिक चुनाव के बाद भाजपा के एक नेता ने कहा था ‘माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विकल्प के रूप में उभरने के लिए भाजपा के पास हर तरह का मुद्दा था। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे ने हमें हिंदू वोट बैंक को एकजुट करने का एक सुनहरा मौका दिया था, लेकिन हमारे नेता भयंकर अंदरूनी कलह में फंसे थे और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे थे। यही वजह रही कि केंद्रीय नेतृत्व से संस्थागत समर्थन के बावजूद हमें वोट शेयर खोना पड़ा।

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भाजपा महिला मोर्चा ने किया विरोध प्रदर्शन - फोटो : ANI
नंबर 4. 45 फीसदी अल्पसंख्यक वोट बैंक बड़ा कारण
भाजपा नेता दबे स्वर में यह स्वीकार करते हैं केरल त्रिपुरा और बंगाल से अलग है। यहां 45 फीसदी से अधिक वोट अल्पसंख्यकों के हैं। यही बात पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि मुसलमान भाजपा के स्वाभाविक सहयोगी नहीं हैं और ईसाई हमें राजनीतिक रूप से समर्थन देने के बजाय अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं।

नंबर-5 हिंदू वोट बैंक एकमुश्त मिलने के आसार नहीं
पार्टी को निकट भविष्य में भी केरल में हिंदू वोट बैंक एकमुश्त मिलने के आसान नजर नहीं आ रहे हैं, क्योंकि वामपंथी, विशेष रूप से सीपीआई (एम) इस वोट बैंक को बांटने की रणनीति बनाने में माहिर मानी जाती है। ऐसे में पार्टी को अपनी भविष्य की चिंता है। 

महिलाओं पर फोकस बढ़ाएगी पार्टी
सूत्रों के मुताबिक पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व केरल के लिए एक अलग योजना पर काम कर रहा है। सूक्ष्म उद्यमों वाली महिलाओं के लिए कुदुम्बश्री के मॉडल में स्वयं सहायता समूह स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। पार्टी शिक्षित युवाओं को आकर्षित करने के लिए सांस्कृतिक संगठन बनाने की योजना पर भी काम कर रही है। 
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