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चिंताजनक: ग्लेशियरों में छिपे ज्वालामुखी सक्रिय, बढ़ेगी विस्फोटों की रफ्तार; जलवायु परिवर्तन ने से नया खतरा

Sat, 12 Jul 2025 07:47 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Sat, 12 Jul 2025 07:47 AM IST
सार

दक्षिणी चिली की विशाल एंडीज पर्वतमाला में छह ज्वालामुखियों  जिनमें मोचो-चोशुएन्को जैसे फिलहाल निष्क्रिय ज्वालामुखी भी शामिल हैं पर शोधकर्ताओं ने बर्फ और चट्टानों का गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने आर्गन डेटिंग और क्रिस्टल विश्लेषण तकनीकों का उपयोग करते हुए यह जानने की कोशिश की कि किस तरह पैटागोनियन हिमचादर के आगे-पीछे होने से अतीत में ज्वालामुखीय गतिविधियों में बदलाव आया।

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Melting glaciers due to climate change also activating volcanoes buried in earth
जलवायु परिवर्तन (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

जलवायु परिवर्तन से पिघलते ग्लेशियर न सिर्फ समुद्र के स्तर को बढ़ा रहे हैं बल्कि धरती में दबे ज्वालामुखियों को भी सक्रिय कर रहे हैं। चिली के एंडीज पर्वतमाला में हुए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि बर्फीली चादरों के पीछे हटते ही ज्वालामुखी ज्यादा विस्फोटक होकर तीव्रता के साथ बार-बार फटने लगते हैं। यह शोध अब वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रहा है, क्योंकि यह खतरा केवल आइसलैंड तक सीमित नहीं बल्कि अंटार्कटिका, रूस, अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे बड़े भूभागों तक फैला हो सकता है।

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दक्षिणी चिली की विशाल एंडीज पर्वतमाला में छह ज्वालामुखियों  जिनमें मोचो-चोशुएन्को जैसे फिलहाल निष्क्रिय ज्वालामुखी भी शामिल हैं पर शोधकर्ताओं ने बर्फ और चट्टानों का गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने आर्गन डेटिंग और क्रिस्टल विश्लेषण तकनीकों का उपयोग करते हुए यह जानने की कोशिश की कि किस तरह पैटागोनियन हिमचादर के आगे-पीछे होने से अतीत में ज्वालामुखीय गतिविधियों में बदलाव आया। यह शोध अध्ययन जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च में प्रकाशित हुआ है।
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हिमयुग में बर्फ के नीचे दबे रहती थीं ज्वालामुखी
शोध में पता चला कि पिछले हिमयुग करीब 26,000–18,000 वर्ष पूर्व के दौरान बर्फ की मोटी चादरें ज्वालामुखियों पर इतनी भारी थीं कि वे विस्फोटों को दबाकर रखती थीं। इससे सतह के 10–15 किलोमीटर नीचे सिलिका-समृद्ध मैग्मा का विशाल भंडार बन गया था। फिर जैसे ही हिमयुग खत्म हुआ और ग्लेशियर तेजी से पिघले, धरती की सतह से अचानक भारी दबाव हट गया। इसका परिणाम यह हुआ कि नीचे दबी गैसें तेजी से फैलने लगीं और जोरदार ज्वालामुखीय विस्फोट हुए। इन विस्फोटों से न सिर्फ नई ज्वालामुखी संरचनाएं बनीं, बल्कि वातावरण में भारी मात्रा में गैसें और एरोसोल भी छोड़े गए।


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वैश्विक वातावरण पर असर
भूवैज्ञानिकों का कहना है कि जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो उनकी प्रतिक्रिया तुरंत होती है, परंतु ज्वालामुखीय मैग्मा प्रणाली में परिवर्तन धीरे-धीरे होते हैं। कई दशकों से लेकर सदियों तक। यदि समय रहते वैज्ञानिक प्रणाली विकसित की जाए तो इससे निगरानी और चेतावनी की संभावनाएं बढ़ती हैं।

  • ज्वालामुखीय विस्फोटों से सल्फर डाइऑक्साइड जैसे तत्व निकलते हैं जो अल्पकालिक रूप से पृथ्वी को ठंडा कर सकते हैं। जैसे 1991 में माउंट पिनाटुबो के विस्फोट के बाद वैश्विक तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया था।
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