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मीरा कुमार ने देश में 'डर के माहौल' पर खेद प्रकट किया

Tue, 04 Jul 2017 05:58 AM IST
एजेंसी/ हैदराबाद
एजेंसी/ हैदराबाद Updated Tue, 04 Jul 2017 05:58 AM IST
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Meira Kumar regrets the atmosphere of fear in the country
meira kumar
राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार ने सोमवार को देश में व्याप्त ‘डर के माहौल’ की निंदा की और जोर देकर कहा कि वह ‘अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस की स्वतंत्रता’ के लिए लड़ रही हैं।
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मीरा कुमार ने गोहत्या या बीफ के सेवन के संदेह में लोगों की पीट-पीटकर हत्या किए जाने की घटनाओं को ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ करार देते हुए डर के माहौल को खत्म करने के लिए आम सहमति बनाने पर जोर दिया।
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राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपने पक्ष में समर्थन जुटाने यहां आईं कुमार ने कहा, ‘लोग क्या खाएं इस बारे में काफी खौफ है। इस बात को लेकर डर है कि क्या बोलें। मैं अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए भी लड़ रही हूं।’ 
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उन्होंने कहा, ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। पीट-पीटकर हत्या किए जाने की इन घटनाओं से मुझे दुख होता है और हम सबको पीड़ा होती है। हमें यह समझ बनानी है और आम सहमति पर पहुंचना है, क्योंकि यह माहौल नहीं चल सकता।’

कुमार ने कहा कि वह इस लड़ाई में ‘अकेली’ नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘जिसके लिए हम खड़े हैं उसे न सिर्फ पार्टियों बल्कि बड़ी संख्या में देशवासियों और महिलाओं का भी समर्थन है। मेरा मानना है कि मैं बेहद ठोस आधार पर खड़ी हूं।’ कुमार ने कहा कि उन्होंने सभी मतदाताओं को पत्र लिखा है और उनसे अपनी ‘अंतरात्मा’ के अनुसार मतदान करने को कहा है।

Meira Kumar regrets the atmosphere of fear in the country
पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार

कुमार का मुकाबला राजग प्रत्याशी रामनाथ कोविंद से है। दोनों दलित समुदाय से आते हैं। उन्होंने कहा कि वह वैचारिक लड़ाई लड़ रही हैं और इसे ‘दलित बनाम दलित’ की लड़ाई के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने दलितों और गरीबों को उचित सम्मान दिए जाने की वकालत की।

उन्होंने कहा कि देश ने विभिन्न क्षेत्रों में शानदार प्रगति की है, लेकिन वंचित तबके के लिए चिंता बुनियादी मुद्द बना हुआ है। उन्होंने कहा, ‘इससे मतलब नहीं है कि हमने कितनी प्रगति की है, लेकिन मुद्दा है कि दलितों का हम कितना सम्मान करते हैं। बुनियादी मुद्दा है कि हम गरीबों के अधिकारों के लिए कितना करते हैं।’ 

कुमार ने कहा, ‘यह 2017 है, जिसमें हम रह रहे हैं। सर्वोच्च पद के लिए अगर हम अब भी दलित बनाम दलित की चर्चा कर रहे हैं, तो हमें अपने भीतर झांकना चाहिए और इस बात का फैसला करना चाहिए कि हमारी सोच किस तरह की है।’ उन्होंने कहा, ‘क्या हमारी सोच आधुनिक समय से मेल खाती है।

​ क्या यह उस प्रगति से मेल खाती है जिसकी परिकल्पना हम अपने देश के लिए करते हैं।’ उन्होंने कहा कि यद्यपि चुनाव को शुरुआत में दो दलित प्रत्याशियों के बीच लड़ाई के तौर पर पेश किया गया। प्रचार अभियान शुरू होने के बाद से उसमें बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि वह इस चुनाव में  वैचारिक लड़ाई लड़ रही हैं।

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