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Meghalaya: पैतृक उपनाम वालों को नहीं मिलेगा आदिवासी प्रमाणपत्र, जिला परिषद ने उठाया मजबूद कदम
Wed, 12 Apr 2023 12:25 PM IST
श्वेता महतो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: श्वेता महतो
Updated Wed, 12 Apr 2023 12:25 PM IST
सार
यह निर्णय 15 मार्च को परिषद की एक कार्यकारी बैठक के दौरान लिया गया था। अगर पारंपरिक मुखिया राजनीति में शामिल हो जाते हैं, तो यह गांव, उनके कामकाज और विकास को प्रभावित कर सकता है।
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- फोटो : Social Media
विस्तार
मेघालय में एक स्वायत्त जिला परिषद ने मातृसत्तात्मक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक अहम कदम उठाया है। उन्होंने सभी पारंपरिक खासी ग्राम प्रधानों को केवल अपनी मां के उपनाम का उपयोग करने वालों को ही आदिवासी प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया है।
केएचएडीसी के कार्यकारी सदस्य जंबोर वार ने बताया- "हमने पारंपरिक ग्राम प्रधानों को खासी हिल्स स्वायत्त जिला खासी सोशल कस्टम ऑफ लाइनेज एक्ट, 1997 की धारा 3 और 12 के अनुसार आदिवासी प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया, जिसके अनुसार मां के उपनाम का उपयोग करने की हमारी प्रथा का पालन करने वालों को ही खासी के रूप में पहचाना जाएगा।"
उन्होंने कहा कि खासी द्वारा पालन की जाने वाली मातृसत्तात्मक व्यवस्था की रक्षा, संरक्षण और मजबूती के लिए यह आदेश जारी किया गया था। जो अपने पैतृक उपनामों का उपयोग कर रहे हैं, उन्हें खासी नहीं माना जाएगा। इसपर पारंपरिक प्रमुख ने उनके लिए आदिवासी प्रमाणपत्र जारी नहीं करने के आदेश दिए हैं। उन्होंने बताया कि परिषद ने पारंपरिक ग्राम प्रधानों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने या किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य बनने पर रोक लगाया हुआ है।
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यह निर्णय 15 मार्च को परिषद की एक कार्यकारी बैठक के दौरान लिया गया था। वार ने कहा कि यह आदेश नया नहीं है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह एक चेतावनी है। अगर पारंपरिक मुखिया राजनीति में शामिल हो जाते हैं, तो यह गांव, उनके कामकाज और विकास को प्रभावित कर सकता है।
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केएचएडीसी के कार्यकारी सदस्य जंबोर वार ने बताया- "हमने पारंपरिक ग्राम प्रधानों को खासी हिल्स स्वायत्त जिला खासी सोशल कस्टम ऑफ लाइनेज एक्ट, 1997 की धारा 3 और 12 के अनुसार आदिवासी प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया, जिसके अनुसार मां के उपनाम का उपयोग करने की हमारी प्रथा का पालन करने वालों को ही खासी के रूप में पहचाना जाएगा।"
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उन्होंने कहा कि खासी द्वारा पालन की जाने वाली मातृसत्तात्मक व्यवस्था की रक्षा, संरक्षण और मजबूती के लिए यह आदेश जारी किया गया था। जो अपने पैतृक उपनामों का उपयोग कर रहे हैं, उन्हें खासी नहीं माना जाएगा। इसपर पारंपरिक प्रमुख ने उनके लिए आदिवासी प्रमाणपत्र जारी नहीं करने के आदेश दिए हैं। उन्होंने बताया कि परिषद ने पारंपरिक ग्राम प्रधानों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने या किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य बनने पर रोक लगाया हुआ है।
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यह निर्णय 15 मार्च को परिषद की एक कार्यकारी बैठक के दौरान लिया गया था। वार ने कहा कि यह आदेश नया नहीं है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह एक चेतावनी है। अगर पारंपरिक मुखिया राजनीति में शामिल हो जाते हैं, तो यह गांव, उनके कामकाज और विकास को प्रभावित कर सकता है।