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बिन पानी सब सून: अवैध अदालत के सहारे पाकिस्तान 10 साल से मांग रहा सिंधु जल; 2026 में भारत ने फिर दिखाया आईना

Sun, 17 May 2026 02:25 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Sun, 17 May 2026 02:25 AM IST
सार

बिन पानी सब सून... ये कथन पाकिस्तान से जुड़े इस मामले में चरितार्थ होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि पड़ोसी देश साल 2016 से ही बिलबिला रहा  है। आलम ये है कि पाकिस्तान एक अवैध ट्रिब्यूनल के सहारे सिंधु नदी का जल मांग रहा है। भारत ने  पाकिस्तान को एक बार फिर आईना दिखाया है। क्या है पूरा विवाद, विदेश मंत्रालय ने ताजा बयान में क्या कुछ कहा? इस खबर में जानिए सबकुछ

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Pakistan Demanding Indus Waters since 10 Years India says Arbitration not legal MEA shows Mirror again in 2026
सिंधु जल संधि पर भारत ने पाकिस्तान को फिर आईना दिखाया - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भारत ने सिंधु जल समझौते पर अपना सख्त रूख बरकरार रखा है। पाकिस्तान एक ऐसे रास्ते से इस नदी का पानी हासिल करने की ताक में है, जिसे भारत ने मान्यता ही नहीं दी है। दरअसल, जिस न्यायाधिकरण (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) में 19 अगस्त 2016 से सिंधु नदी के जल को लेकर जिरह हो रही है, यहां भारत ने अपने प्रतिनिधि ही नहीं भेजे हैं।

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पाकिस्तान एड़ियां रगड़ता रहे, सिंधु जल...
भारत ने साफ कर दिया है कि ऐसी कवायद का कोई अर्थ नहीं क्योंकि ऐसी अदालतों का गठन ही गैरकानूनी है। 2016 में शुरू इस कार्यवाही को 10 साल होने वाले हैं। लेकिन, भारत ने साफ कर दिया है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता अदालत) जैसे रास्तों पर भले ही पाकिस्तान एड़ियां रगड़ता रहे, सिंधु जल हासिल करने की ऐसी जुगत का कोई फायदा नहीं होने वाला। परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद 2016 में शुरू हुए तथाकथित मध्यस्थता के मामले का ब्योरा इस प्रकार है
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आतंकी हमले के बाद भारत ने दिखाई सख्ती
बता दें कि पाकिस्तान ने पाकिस्तान ने 1960 की सिंधु जल संधि (अप्रैल, 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद निलंबित) के अनुच्छेद 2(ख) के तहत मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू करने की गुहार लगाई थी। भारत के खिलाफ की गई इस अपील को पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार कोई तवज्जो नहीं देती। खास तौर पर विदेश मंत्रालय ने बीते एक साल में कई बार साफ किया है कि जल संधि निलंबित होने के कारण ऐसी मध्यस्थता का कोई कानूनी वजूद ही नहीं।
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भारत की दो-टूक- सिंधु जल संधि पर गठित मध्यस्थता अदालत गैरकानूनी
मध्यस्थता की कार्यवाही के माध्यम से सिंधु नदी का पानी हासिल करने की जुगत में लगे पाकिस्तान को लेकर भारत ने एक बार फिर कड़े फैसले से पूरी दुनिया को अवगत करा दिया है। विदेश मंत्रालय ने 15 मई को पारित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता अदालत) के फैसले को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह मध्यस्थता अदालत पूरी तरह से गैरकानूनी है।

विदेश मंत्रालय ने फैसले को किस आधार पर ठुकराया?
भारत ने साफ कर दिया है कि सिंधु जल समझौते पर जो रोक उसने लगाई थी, वह आगे भी जारी रहेगी। यह फैसला देश की सुरक्षा और संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, इस अवैध अदालत ने पानी जमा करने (पॉन्डेज) को लेकर एक फैसला सुनाया था। इसे भारत ने सिरे से नकार दिया है। भारत ने कभी भी इस अदालत के गठन को मान्यता नहीं दी है। इसलिए, इस अदालत द्वारा की गई कोई भी कार्रवाई या सुनाया गया कोई भी फैसला भारत के लिए शून्य और अमान्य है। भारत ऐसे किसी भी आदेश को मानने के लिए बिल्कुल बाध्य नहीं है।

भारत ने पिछले साल जून में भी इस अदालत को अवैध बताया था
भारत का शुरू से ही यह स्पष्ट रुख रहा है कि इस तथाकथित मध्यस्थता अदालत का बनाया जाना ही अपने आप में सिंधु जल समझौते का बहुत बड़ा उल्लंघन है। पिछले साल जून में भी भारत ने एक बयान जारी कर कहा था कि वह कानूनी रूप से इस अदालत के अस्तित्व को बिल्कुल नहीं मानता है। जब अदालत ही अवैध है, तो उसके सामने होने वाली किसी भी तरह की सुनवाई और उसका कोई भी फैसला पूरी तरह से गैरकानूनी माना जाएगा।

भारत ने सिंधु जल समझौते पर रोक क्यों लगाई थी?
भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए इस समझौते पर रोक लगाई है। पहलगाम में हुए भयानक आतंकी हमले के बाद भारत ने यह कड़ा कदम उठाया था। भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को पूरी तरह और हमेशा के लिए बंद नहीं कर देता, तब तक यह समझौता ऐसे ही निलंबित (रोक पर) रहेगा। भारत अब आतंकवाद के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करेगा।

ये भी पढ़ें- बूंद-बूंद पानी को तरस रहा PAK: सिंधु जल संधि पर भारत का रुख सख्त, तथाकथित न्यायाधिकरण के निर्णय को किया खारिज

क्या कोई अदालत भारत के इस फैसले की जांच कर सकती है?
विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि जब तक यह समझौता निलंबित है, तब तक भारत इस समझौते के तहत अपनी किसी भी जिम्मेदारी को निभाने के लिए मजबूर नहीं है। दुनिया की कोई भी अदालत, खासकर यह गैरकानूनी मध्यस्थता अदालत, भारत के इस फैसले की कानूनी जांच नहीं कर सकती है। भारत एक स्वतंत्र देश है और आतंकवाद के खिलाफ अपनी सुरक्षा के लिए फैसले लेने का उसे पूरा अधिकार है।

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