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मायावती का बड़ा एलान: अब सत्ता के साथ जाने की तैयारी में बसपा, जानें क्या हैं इस घोषणा के सियासी मायने?
Sun, 30 Jul 2023 02:20 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Sun, 30 Jul 2023 02:20 PM IST
सार
आज हम आपको बताएंगे कि आखिर मायावती क्या करने की कोशिश कर रहीं हैं? उनके नए एलान के सियासी मायने क्या हैं? लोकसभा चुनाव के लिए बसपा की क्या रणनीति है?
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मायावती
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बहुजन समाज पार्टी के लगातार घटते जनाधार के बीच पार्टी ने नई रणनीति पर काम शुरू किया है। पार्टी प्रमुख मायावती ने एलान किया है कि उनकी पार्टी राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद सरकारों में शामिल होने पर विचार करेगी। उनका कहना है कि इसके जरिए उनकी पार्टी सत्ता संतुलन और हाशिये पर रह रहे लोगों का उत्थान सुनिश्चित करेगी।
कहा जा रहा है कि इसके जरिए मायावती पार्टी बचाने के साथ-साथ पार्टी को विस्तारित करने का भी काम करेंगी। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि आखिर मायावती क्या करने की कोशिश कर रहीं हैं? उनके इस एलान के सियासी मायने क्या हैं? लोकसभा चुनाव के लिए बसपा की क्या रणनीति है?
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कहा जा रहा है कि इसके जरिए मायावती पार्टी बचाने के साथ-साथ पार्टी को विस्तारित करने का भी काम करेंगी। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि आखिर मायावती क्या करने की कोशिश कर रहीं हैं? उनके इस एलान के सियासी मायने क्या हैं? लोकसभा चुनाव के लिए बसपा की क्या रणनीति है?
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पहले जानिए मायावती ने क्या एलान किया है?
बसपा प्रमुख मायावती ने मंगलवार को कई राज्यों में काम करने वाले अपने पार्टी के नेताओं के साथ बैठक की। इस बैठक के बाद उन्होंने प्रेस नोट जारी किया। इसमे कहा गया कि कई राज्यों में सत्ता संतुलन बनने के बावजूद जातिवादी तत्व द्वारा साम, दाम, दंड, भेद आदि अनेकों घिनौने हथकंडे अपना कर बसपा के विधायकों को तोड़ लेते हैं। इससे जनता के साथ विश्वासघात करके घोर स्वार्थी जनविरोधी तत्व सत्ता पर काबिज हो जाते हैं। आगे विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता संतुलन बनने पर लोगों की चाहत के हिसाब से, सरकार में शामिल होने पर विचार संभव है। बता दें कि साल के अंत में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और मिजोरम शामिल हैं।
बसपा प्रमुख मायावती ने मंगलवार को कई राज्यों में काम करने वाले अपने पार्टी के नेताओं के साथ बैठक की। इस बैठक के बाद उन्होंने प्रेस नोट जारी किया। इसमे कहा गया कि कई राज्यों में सत्ता संतुलन बनने के बावजूद जातिवादी तत्व द्वारा साम, दाम, दंड, भेद आदि अनेकों घिनौने हथकंडे अपना कर बसपा के विधायकों को तोड़ लेते हैं। इससे जनता के साथ विश्वासघात करके घोर स्वार्थी जनविरोधी तत्व सत्ता पर काबिज हो जाते हैं। आगे विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता संतुलन बनने पर लोगों की चाहत के हिसाब से, सरकार में शामिल होने पर विचार संभव है। बता दें कि साल के अंत में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और मिजोरम शामिल हैं।
क्या करने की कोशिश कर रहीं हैं मायावती?
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'बसपा लंबे समय से सत्ता से दूर है। पार्टी का जनाधार लगातार घट रहा है। उत्तर प्रदेश के साथ ही राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी बसपा का वोट बैंक रहा है। लेकिन, उत्तर प्रदेश को छोड़कर किसी भी अन्य राज्य में बसपा अपने बल पर सरकार बना पाने के स्थिति में नहीं है। इसके चलते बसपा को विपक्ष में रहना पड़ता है। इस वजह से कई बार विधायक और नेता पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी में शामिल हो जाते हैं। इसका नुकसान बसपा को उठाना पड़ता है। इसे रोकने के लिए मायावती ने आगे से राज्य की सरकारों के साथ गठबंधन करने का एलान किया है। मतलब वह एक संदेश देना चाहती हैं कि अगर उनकी पार्टी के नेता चुनावी राज्यों में जीत हासिल करते हैं तो वह भी सरकार का हिस्सा रहेंगे।'
प्रमोद के अनुसार, 'सरकार के साथ पार्टी के विधायकों के रहने से बसपा को दो तरह का फायदा दिख रहा है। पहला ये कि उनका विधायक और नेता पार्टी छोड़कर दूसरी जगह नहीं जाएगा और दूसरा ये कि उसके जरिए पार्टी की स्थिति भी मजबूत होगी।'
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'बसपा लंबे समय से सत्ता से दूर है। पार्टी का जनाधार लगातार घट रहा है। उत्तर प्रदेश के साथ ही राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी बसपा का वोट बैंक रहा है। लेकिन, उत्तर प्रदेश को छोड़कर किसी भी अन्य राज्य में बसपा अपने बल पर सरकार बना पाने के स्थिति में नहीं है। इसके चलते बसपा को विपक्ष में रहना पड़ता है। इस वजह से कई बार विधायक और नेता पार्टी छोड़कर सत्ताधारी पार्टी में शामिल हो जाते हैं। इसका नुकसान बसपा को उठाना पड़ता है। इसे रोकने के लिए मायावती ने आगे से राज्य की सरकारों के साथ गठबंधन करने का एलान किया है। मतलब वह एक संदेश देना चाहती हैं कि अगर उनकी पार्टी के नेता चुनावी राज्यों में जीत हासिल करते हैं तो वह भी सरकार का हिस्सा रहेंगे।'
प्रमोद के अनुसार, 'सरकार के साथ पार्टी के विधायकों के रहने से बसपा को दो तरह का फायदा दिख रहा है। पहला ये कि उनका विधायक और नेता पार्टी छोड़कर दूसरी जगह नहीं जाएगा और दूसरा ये कि उसके जरिए पार्टी की स्थिति भी मजबूत होगी।'
पिछले कुछ चुनावों में कैसा रहा है बसपा का प्रदर्शन?
- 2012 के बाद से बसपा का प्रदर्शन यूपी समेत कई राज्यों में गिरता जा रहा है। अभी लोकसभा में बसपा के नौ सदस्य हैं। राज्यसभा में अब सिर्फ एक सीट बची है। अलग-अलग राज्यों के विधानसभा और विधानपरिषद में भी बसपा के केवल सात सदस्य हैं।
- 2022 में हुए यूपी चुनाव में बसपा को केवल एक ही सीट मिली थी।
- मध्य प्रदेश में 2018 में हुए चुनाव में पार्टी ने दो सीट पर जीत सकी थी।
- राजस्थान में 2018 में हुए चुनाव में बसपा के छह उम्मीदवार चुनाव जीते थे, हालांकि बाद में सभी ने दल बदलकर कांग्रेस में चले गए।
- छत्तीसगढ़ में 2018 में हुए चुनाव में बसपा के दो उम्मीदवार चुने गए थे।
- 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा के एक उम्मीदवार की जीत हुई थी।
- दिल्ली, हरियाणा, झारखंड, हिमाचल प्रदेश के चुनावों में पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया।