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मराठा आंदोलन : मराठी और दलित आमने-सामने, सकते में फडणवीस सरकार

Tue, 27 Sep 2016 10:09 PM IST
सरेंद्र मिश्र/ अमर उजाला, मुंबई
सरेंद्र मिश्र/ अमर उजाला, मुंबई Updated Tue, 27 Sep 2016 10:09 PM IST
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Maratha movement : Maratha and Dalit face to face, Fadnavis government in trouble
- फोटो : PTI

महाराष्ट्र में सामाजिक तानाबाना टूट रहा है। मराठा समाज के मौन मोर्चे से यह स्थिति पैदा हुई है। अहमदनगर जिले के कोपर्डी में हुए निर्भया कांड के बाद विरोध स्वरूप सूबे का यह ताकतवर समाज सड़कों पर उतर पड़ा है। इस आंदोलन के जरिए जहां मराठा समाज एकजुट हो रहा है वहीं, दलितों में भी चेतना जागृत हो उठी है। जिससे मराठा और दलित समाज आमने-सामने आ गए हैं।

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मराठा समाज की मौन रैलियां मराठा क्रांति मोर्चा के बैनर तले नौ अगस्त को सबसे पहले ओरंगाबाद में शुरू हुई थीं। उसके बाद जल्द ही पूरे राज्य में फैल गई। बीते रविवार को पुणे में मराठा समाज की विशाल रैली में एनसीपी सुप्रीमों शरद पवार से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज सांसद उदयनराजे भोसले, पूर्व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार सहित कई दिग्गज मराठा नेता शामिल हुए।
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हालांकि यह रैली पूरी तरह से राजनीतिक है और हर पार्टी के शक्तिशाली मराठा नेताओं का समर्थन है लेकिन प्रमुख चेहरा दिखाई नहीं देता। रैली के आयोजकों ने नेताओं को भले दूर रखा है लेकिन उन्हें रैली में हिस्सा लेने की इजाजत है। अब तक करीब एक दर्जन रैलियों हो चुकी हैं जिसमें लाखों लोग शामिल हो रहे हैं। यही फडणवीस सरकार के लिए सबसे बड़ी अड़चन है।

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मराठा आंदोलन के पीछे छुपे हैं राजनीतिक चेहरे

Maratha movement : Maratha and Dalit face to face, Fadnavis government in trouble

बीते 16 जुलाई को अहमदनगर जिले के कोपर्डी गांव में एक नाबालिग किशोरी के साथ हुए गैंगरेप और हत्या के विरोध में नौ अगस्त को औरंगाबाद में पहली रैली हुई उसके बाद मराठा आंदोलन शुरू हो गया। दरअसल, जिस किशोरी का बलात्कार कर निर्ममता से हत्या कर दी गई वह मराठा समाज से थी जबकि आरोपी दलित समाज से हैं।

इसके विरोध में शुरू हुए आंदोलन में अब कई मांगे जुड़ गई है। मराठा समाज की मांग है कि दोषियों को मृत्यु दंड मिले, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 में संशोधन हो और अन्य पिछड़े वर्ग में मराठा समुदाय को आरक्षण दिया जाए।


मराठा आंदोलन के पीछे सियासी चेहरे छुपे हुए हैं। हालांकि इसमें मराठा समाज के कुछ सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों की टीम भी सक्रिय है लेकिन उसमें भी पूर्व आईएएस निर्मल देशमुख के अलावा दूसरे किसी के नाम की चर्चा नहीं होती है।

इस आंदोलन में सबसे बड़ी भूमिका मराठा क्षत्रप शरद पवार और संत भय्यूजी महाराज (उदयराव सिंह देशमुख) की है। भय्यूजी महाराज महाराष्ट्र से हैं लेकिन वे इंदौर में रहते हैं। विलासराव देशमुख के मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी तूती बोलती थी। अन्ना हजारे के आंदोलन को खत्म कराने में उनकी भूमिका रही है। उसके बाद वे सुर्खियों में आए थे।

मराठा आंदोलन के हैं सियासी मायने

Maratha movement : Maratha and Dalit face to face, Fadnavis government in trouble

दलितों में संताप
मराठा मोर्चे को लेकर दलित नेताओं में संताप देखा जा रहा है। पूर्व राज्यसभा सांसद  कांग्रेस के दलित नेता भालचंद्र मुणगेकर ने मंगलवार को कहा कि यदि मराठा समाज को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाता है तो समाज का हर तबका जिसमें ब्राह्मण भी शामिल हैं उन्हें भी आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए।

उन्होंने एट्रासिटी कानून रद्द करने की मांग का कड़ा विरोध करते हुए फडणवीस सरकार से मांग की कि एट्रासिटी कानून के दुरुपयोग का एक भी मामला है तो उसका सबूत दें। वहीं, मुणगेकर ने यह भी चेतावनी दी कि मराठा आंदोलन में यदि किसी प्रकार की घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी।

महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन के सियासी मायने हैं। आजादी से लेकर अब तक सूबे में मराठाओं का राजनीतिक बर्चस्व रहा है। राज्य में राजनीति से लेकर शिक्षण संस्थानों, चीनी मिलों और सहकारिता क्षेत्र में सबसे ज्यादा मराठाओं का ही दबदबा है। राज्य में 35 प्रतिशत जनसंख्या मराठों की है।

जो एक बड़ा वोट बैंक है। इसलिए समाज की एकजुटता के बहाने मराठा नेताओं ने सरकार के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है। दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य में ब्राह्मण लॉबी सक्रिय हो गई है और मराठा समुदाय को ये कतई रास नहीं आ रहा है।

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