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जासूसी और युद्ध में होता आया है चमगादड़, बिल्ली और पक्षियों का इस्तेमाल

Sun, 05 May 2019 02:30 PM IST
Shilpa Thakur न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Sun, 05 May 2019 02:30 PM IST
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Many countries uses animals, mammals for war and Spying
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media

दुनियाभर के देश जासूसी के लिए तरह-तरह के पैंतरे आजमाते हैं। कोई इसके लिए पहचान बदलकर किसी शख्स को संबंधित देश में भेजता है तो कोई तकनीक का सहारा लेता है। लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि जासूसी के लिए जानवरों का इस्तेमाल भी किया जाता है। ताकि जिस देश की जासूसी की जा रही है, उसे कोई शक ना हो, इसके लिए बकायदा उस जानवर को प्रशिक्षण तक दिया जाता है।

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नॉर्वे में एक व्हेल के मिलने के बाद ये मुद्दा एक बार फिर उठ गया है। यहां के विशेषज्ञों का मानना है कि देश के किनारे पर आई एक सफेद व्हेल रूसी जासूस हो सकती है। ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि व्हेल के शरीर पर एक खास तरह का पट्टा लगा हुआ था। इन विशेषज्ञों का मानना है कि ये संभव है कि व्हेल को रूसी नौसेना ने प्रशिक्षण दिया हो। इस व्हेल पर एक गोप्रो कैमरा होल्डर के साथ रूसी शहर और सेंट पीटर्सबर्ग की ओर इशारा करने वाला एक लेबल चस्पा था। इसी क्षेत्र में रूसी नौसेना का एक अड्डा भी है।

लेकिन जासूसी के लिए जानवरों का इस्तेमाल करना कोई नई बात नहीं है। ऐसा काफी लंबे समय से होता आया है-

Many countries uses animals, mammals for war and Spying
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo

सोनार डॉल्फिन

अमेरिका काफी लंबे समय से सोनार डॉल्फिन का जासूसी के लिए इस्तेमाल करते आया है। इनका इस्तेमाल पानी के नीचे छिपी खदानों की खोज के लिए भी किया जाता है, जो जहाजों के लिए खतरा होती हैं। इसके अलावा अमेरिका समुद्री तटों की चौकसी और सुरक्षा के लिए भी इनका इस्तेमाल कर रहा है।

इन डॉल्फिन का इस्तेमाल अमेरिका इसलिए करता है क्योंकि ये काफी बुद्धिमान होती हैं और कम समय में ही प्रशिक्षित हो जाती हैं। ये किसी बाहरी व्यक्ति का समुद्र में आसानी से पता भी लगा लेती हैं। जिससे नौसेना को वक्त रहते सूचना मिल जाती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pexels.com

सीगल और पनडुब्बी

ब्रिटेन की नौसेना इस बात को स्वीकार कर चुकी है कि प्रथम विश्व युद्ध के समय उसने जर्मनी की पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए सीगल पक्षियों का इस्तेमाल किया था। खाना जारी करने के लिए ब्रिटेन अपनी खुद की पनडुब्बियां भी भेजता था। ये पक्षी खाने का पता लगाकर पनडुब्बियों का पीछा करते थे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File photo

कबूतर का मिसाइलों में इस्तेमाल

साल 1943 में अमेरिकी सेना ने नाजियों को निशाना बनाने के लिए कबूतर स्टीर मिसाइल के बनाने से पहले साइकोलॉजिस्ट बीएफ स्किनर को मंजूरी दी थी। ट्रायल के दौरान, इन कबूतरों को एयर टू ग्राउंड पेलिकन मिसाइल के केसिंग में रखा गया। इसमें एक तरह की खिड़की भी थी। इसमें कबूतरों को विभिन्न दिशाओं में अपना सिर हिलाने का प्रशिक्षण भी दिया गय। इस प्रोजेक्ट में काफी सफलता मिली लेकिन बाद में इसे इस्तेमाल नहीं किया गया।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo

टाइम बम में चमगादड़ का इस्तेमाल

दूसरे विश्व युद्ध के समय अमेरिकी सेना ने टाइम बम को ले जाने के लिए चमगादड़ का इस्तेमाल किया था। ताकि जपान में विभिन्न लक्ष्यों पर छोटा निशाना साधा जा सके। ट्रायल के दौरान चमगादड़ों को गिराया भी गया। वे लक्षित ठिकानों पर घूमते थे और फिर वापस चले जाते थे। हालांकि बादमें चमगादड़ बमों का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया।
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