दुनियाभर के देश जासूसी के लिए तरह-तरह के पैंतरे आजमाते हैं। कोई इसके लिए पहचान बदलकर किसी शख्स को संबंधित देश में भेजता है तो कोई तकनीक का सहारा लेता है। लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि जासूसी के लिए जानवरों का इस्तेमाल भी किया जाता है। ताकि जिस देश की जासूसी की जा रही है, उसे कोई शक ना हो, इसके लिए बकायदा उस जानवर को प्रशिक्षण तक दिया जाता है।
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नॉर्वे में एक व्हेल के मिलने के बाद ये मुद्दा एक बार फिर उठ गया है। यहां के विशेषज्ञों का मानना है कि देश के किनारे पर आई एक सफेद व्हेल रूसी जासूस हो सकती है। ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि व्हेल के शरीर पर एक खास तरह का पट्टा लगा हुआ था। इन विशेषज्ञों का मानना है कि ये संभव है कि व्हेल को रूसी नौसेना ने प्रशिक्षण दिया हो। इस व्हेल पर एक गोप्रो कैमरा होल्डर के साथ रूसी शहर और सेंट पीटर्सबर्ग की ओर इशारा करने वाला एक लेबल चस्पा था। इसी क्षेत्र में रूसी नौसेना का एक अड्डा भी है।
लेकिन जासूसी के लिए जानवरों का इस्तेमाल करना कोई नई बात नहीं है। ऐसा काफी लंबे समय से होता आया है-
सोनार डॉल्फिन
अमेरिका काफी लंबे समय से सोनार डॉल्फिन का जासूसी के लिए इस्तेमाल करते आया है। इनका इस्तेमाल पानी के नीचे छिपी खदानों की खोज के लिए भी किया जाता है, जो जहाजों के लिए खतरा होती हैं। इसके अलावा अमेरिका समुद्री तटों की चौकसी और सुरक्षा के लिए भी इनका इस्तेमाल कर रहा है।
इन डॉल्फिन का इस्तेमाल अमेरिका इसलिए करता है क्योंकि ये काफी बुद्धिमान होती हैं और कम समय में ही प्रशिक्षित हो जाती हैं। ये किसी बाहरी व्यक्ति का समुद्र में आसानी से पता भी लगा लेती हैं। जिससे नौसेना को वक्त रहते सूचना मिल जाती है।
सीगल और पनडुब्बी
ब्रिटेन की नौसेना इस बात को स्वीकार कर चुकी है कि प्रथम विश्व युद्ध के समय उसने जर्मनी की पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए सीगल पक्षियों का इस्तेमाल किया था। खाना जारी करने के लिए ब्रिटेन अपनी खुद की पनडुब्बियां भी भेजता था। ये पक्षी खाने का पता लगाकर पनडुब्बियों का पीछा करते थे।
कबूतर का मिसाइलों में इस्तेमाल
साल 1943 में अमेरिकी सेना ने नाजियों को निशाना बनाने के लिए कबूतर स्टीर मिसाइल के बनाने से पहले साइकोलॉजिस्ट बीएफ स्किनर को मंजूरी दी थी। ट्रायल के दौरान, इन कबूतरों को एयर टू ग्राउंड पेलिकन मिसाइल के केसिंग में रखा गया। इसमें एक तरह की खिड़की भी थी। इसमें कबूतरों को विभिन्न दिशाओं में अपना सिर हिलाने का प्रशिक्षण भी दिया गय। इस प्रोजेक्ट में काफी सफलता मिली लेकिन बाद में इसे इस्तेमाल नहीं किया गया।
टाइम बम में चमगादड़ का इस्तेमाल
दूसरे विश्व युद्ध के समय अमेरिकी सेना ने टाइम बम को ले जाने के लिए चमगादड़ का इस्तेमाल किया था। ताकि जपान में विभिन्न लक्ष्यों पर छोटा निशाना साधा जा सके। ट्रायल के दौरान चमगादड़ों को गिराया भी गया। वे लक्षित ठिकानों पर घूमते थे और फिर वापस चले जाते थे। हालांकि बादमें चमगादड़ बमों का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया।