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जांच एजेंसियों के रडार पर हैं 'महागठबंधन' के अधिकांश सहयोगी

Tue, 22 Jan 2019 08:23 PM IST
Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली Published by: Jitendra Bhardwaj Updated Tue, 22 Jan 2019 08:23 PM IST
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many associates of opposition grand alliance on radar of CBI and other investigative Agencies
डेमो - फोटो : डेमो

कोलकाता में हुई विपक्षी दलों के महागठबंधन की रैली के बाद तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। भाजपा खेमें की ओर से प्रतिक्रिया आई कि इस रैली में 'नकारात्मकता के नवाब' एकत्रित हुए हैं। दूसरी तरफ कहा गया है कि ममता बैनर्जी ने महागठबंधन की रैली में अपनी ताकत दिखाकर सहयोगी दलों, खासतौर से बसपा सुप्रीमों को यह बताया है कि पीएम के दावेदारों में उन्हें कम न आंका जाए।

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खैर जो भी हो, लेकिन इन सभी में एक सामान्य बात है। वो ये यह है कि कोलकाता रैली के मंच विराजमान रहे अधिकांश दलों के नेता जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। किसी के खिलाफ जांच हो चुकी है तो कोई अब लपेटे में आ रहा है। इन्हीं में कुछ ऐसे चेहरे भी हैं, जिनके यहां जांच एजेंसी कभी भी दस्तक दे सकती है।
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भाजपा नेता कई बार सार्वजनिक तौर से यह बात कह चुके हैं कि महागठबंधन में शामिल हुए कई दलों के ऐसे नेता जो किसी न किसी जांच एजेंसी के सवालों का सामना कर रहे हैं, वे एक मंच पर एकत्रित हुए हैं। कोलकाता रैली की संयोजक, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के खिलाफ भी पेंटिंग और चिट फंड मामले को लेकर सीबीआई जांच चल रही है। 
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हालांकि ममता बैनर्जी ने आंधप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तर्ज पर सीबीआई को अपने राज्य में दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिसमेंट एक्ट के तहत जांच करने की अनुमति देने वाली सहमति वापस ले ली है। अब सीबीआई के लिए पश्चिम बंगाल में कार्रवाई करना मुश्किल हो जाएगा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ भी कथित माइनिंग घोटाले में जांच एजेंसी किसी भी वक्त दस्तक दे सकती है। 

राजद नेता तेजस्वी यादव कोलकाता रैली में देरी से पहुंचे थे। वजह, उन्हें किसी मामले में कोर्ट जाना था।बता दें कि उनके पिता एवं राजद अध्यक्ष लालू यादव पहले से ही जेल में बंद हैं। अब तेजस्वी यादव और उनकी बहन मीसा भारती प्रवर्तन निदेशालय के रडार पर हैं। 

डीएमके नेता एमके स्टालिन भी कई विवादों में घिरे रहे हैं। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और एनसीपी प्रमुख शरद पवार के खिलाफ जांच एजेंसी अपने घोड़े दौड़ा चुकी हैं। उनकी पार्टी के छगन भुजबल और समीर भुजबल के खिलाफ ईडी की जांच चल रही है। धनंजय मुंडे भी टारगेट पर रहे हैं।

केजरीवाल और उनके मंत्रियों के घर-दफ़्तर में पहुंच गई थी सीबीआई

महागठबंधन की रैली में मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोलने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ही नहीं, बल्कि उनके मंत्रियों के घर-दफ़्तर तक को सीबीआई खंगाल चुकी है। आप संयोजक को इस बात की बहुत गहरी टीस है कि सीबीआई जब चाहती है उनके यहां छापा मार देती है। 

इससे पहले भी केजरीवाल दिल्ली पुलिस और सीबीआई को लेकर मोदी पर निशाना साध चुके हैं।यहां तक कि उनकी पार्टी ने अब मोदी पुलिस और मोदी सीबीआई कहना शुरु कर दिया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी पर भी कथित माइनिंग स्कैम के आरोप लगे थे। 

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन का नाम भी जमीन विवाद और ईसीआई के नियमों का उल्लंघन करने में सामने आ चुका है।असम से एआईडीयूएफ के प्रमुख और सांसद बदरुद्दीन अजमल भी कई मामलों में विवादित रहे हैं।

इन्होंने तो अपने राज्य में सीबीआई का प्रवेश ही रोक दिया है

चंद्रबाबू नायडू, जो कि महागठबंधन में एक बड़ा चेहरा माने जाते हैं, को सीबीआई पर सबसे ज्यादा गुस्सा है। उन्होंने तो अपने राज्य में जांच एजेंसी के प्रवेश पर ही रोक लगा दी है। उन्होंने सबसे पहले दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिसमेंट एक्ट का हवाला देकर केंद्रीय जांच एजेंसी को कार्रवाई करने की अनुमति देने वाली सहमति वापस ले ली है।

ममता बैनर्जी की रैली में अपना संदेश भिजवाने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के खिलाफ पहले ही ईडी जांच चल रही है। नेशनल हेराल्ड मामले में कथित तौर से इनकी भूमिका का पता लगाया जा रहा है। इसके अलावा राबर्ट वाड्रा के घर भी आए दिन ईडी आती जाती रहती है। 

बसपा सुप्रीमों मायावती का नाम भी जांच एजेंसियों द्वारा शुगर मिल केस में कथित तौर पर लिया जाता रहा है। बसपा के कई दूसरे नेता भी सीबीआई के निशाने पर हैं।

महागठबंधन के नेताओं की बातें गंभीरता से नहीं लेते लोग: जेटली

 केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने महागठबंधन के नेताओं पर हमला बोलते हुए कहा है कि इन सभी पार्टियों का एक मात्र मकसद पीएम मोदी की बुराई करना है। इन्हें कुछ और नहीं सूझ रहा है। जेटली ने महागठबंधन के नेताओं को 'नकारात्मकता के नवाब' भी कह दिया। ये सभी नेता नकारात्मकता के शिकार हैं। 

यही वजह है कि इनकी बातों को आम जनता गंभीरता से नहीं ले रही और न ही आगे लेगी। महागठबंधन में न तो वैचारिक समानता है, न ही उनके पास देश को आगे बढ़ाने के लिए कोई सांझा कार्यक्रम है। सबसे बड़ी बात, उनके पास कोई एक सर्वमान्य नेता भी नहीं है।
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