Manmohan Singh: मनमोहन सिंह ने मंत्रियों के गलत कामों से क्यों मूंद ली थीं आंखें? काली भेड़ों से थे वाकिफ
डॉ. मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में सरकार पर कई तरह के आरोप लगे थे। दिल्ली में 2012 के दौरान निर्भया कांड भी हुआ। इन सबके होते भी डॉ. मनमोहन सिंह अपनी राह से विचलित नहीं हुए।
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डॉ. मनमोहन सिंह यह बात जानते थे कि उनकी सरकार में कुछ लोग गलत काम कर रहे हैं। वे काली भेड़ों से अवगत थे। इसके बावजूद उन्होंने खुलकर बोलने से परहेज किया। हालांकि उन्होंने इसके लिए खुद को जिम्मेदार नहीं ठहराया। उन्हें मालूम था कि वे राजनीतिक अधिकारी नहीं हैं। इससे यह संदेश भी गया कि सत्ता का केंद्र कहीं दूसरी ओर भी है। मंत्रिमंडल में कांग्रेस पार्टी के अलावा सहयोगी दलों के नेता भी शामिल थे। ऐसे में डॉ. सिंह की यह सोच रही कि कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व ही गलत काम करने वालों का इलाज करेगा। उन्हें सहयोगियों से भी यही उम्मीद थी कि वे भी अपनी काली भेड़ों से निपटेंगे। पीएम रहते हुए डॉ. सिंह ने यह सुनिश्चित किया था कि परिवार या करीबियों में कोई भी व्यक्ति गलत काम न करे।
बता दें कि डॉ. मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में सरकार पर कई तरह के आरोप लगे थे। इनमें भ्रष्टाचार का आरोप सबसे बड़ा था। सरकार के आखिरी के दो वर्षों में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने लोकपाल आंदोलन शुरु कर दिया था। कोयला ब्लॉक आवंटन में भ्रष्टाचार का आरोप, कॉमनवेल्थ और टूजी जैसे कथित घोटालों को लेकर विपक्षी दल उबाल पर थे। दिल्ली में 2012 के दौरान निर्भया कांड भी हुआ। इन सबके होते भी डॉ. मनमोहन सिंह अपनी राह से विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपना काम ईमानदारी से जारी रखा। प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी पुस्तक 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर: द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह' में यह बात कही है। किताब में लिखा है कि डॉ. सिंह, अपने सहयोगियों या अधीनस्थों के गलत कामों के बारे में जानते थे, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक तौर पर उनके खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया।
खास बात ये रही कि इसके लिए उन्होंने खुद को भी जिम्मेदार नहीं माना। वे जानते थे कि इन लोगों को नियुक्ति देने वाला तो कोई ओर है। वे लोग खुद राजनीतिक अधिकारी नहीं थे। हर कोई किसी खास वजह से सरकार में था। बारू ने लिखा है, व्यवहार में इसका मतलब हुआ कि डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रियों के गलत कामों पर आंखें मूंद ली थीं। वे यह सोचते थे कि गलत काम करने वालों को कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व देखेगा। इसी तरह वे अपनी सरकार में शामिल सहयोगियों से उम्मीद करते थे कि वे भी अपनी काली भेड़ों से निपटेंगे। डॉ. सिंह का मानना था कि सभी लोगों को अपनी अंतरात्मा से निपटना चाहिए। लोग अपने आचरण में साफ रहें।
पीएम रहते जब उन्होंने अपनी आखिरी प्रेसवार्ता की तो उस वक्त भी यह मुद्दा उठा था। डॉ. सिंह से पूछा गया कि क्या वे अपने मंत्रियों पर अंकुश नहीं लगा पाए। क्या आपकी बात नहीं मानी गई। आप मौन क्यों रहते थे। तब मनमोहन सिंह ने कहा था, 'मैं मानता हूं कि अभी की मीडिया की तुलना में इतिहास मेरे प्रति दयालु होगा। मैं सारी बात बता नहीं सकता कि कैबिनेट में क्या-क्या बातें होती हैं। मनमोहन सिंह ने कहा, गठबंधन सरकार की अपनी मजबूरियां होती हैं।
डॉ. सिंह के कम बोलने पर, विपक्ष हमेशा उन्हें अपने निशाने पर रखता था। हालांकि कई अवसरों पर वे बोले, मगर शायराना अंदाज में। संसद सत्र के दौरान जब नेता विपक्ष, सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यह कहते हुए कटाक्ष किया था कि 'तू इधर उधर की न बात कर, ये बता के कारवां क्यों लुटा, मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है। इसका जवाब डॉ. सिंह ने शायराना अंदाज में दिया। 'माना के तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतजार तो देख।' संसद भवन के बाहर उन्होंने कहा, हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी है।