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Manipur Violence: मणिपुर में बार-बार क्यों हो रही हिंसा, ये कब और कैसे रुकेगी? समझें सबकुछ

Fri, 16 Jun 2023 03:42 PM IST
हिमांशु मिश्रा स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Fri, 16 Jun 2023 03:42 PM IST
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सार
आइए जानते हैं इस हिंसा के पीछे की पूरी कहानी क्या है? आखिर तमाम कोशिशों के बावजूद यहां बार-बार हिंसा क्यों भड़क रही है? इस हिंसा में म्यांमार की कितनी भूमिका? कब और कैसे हिंसा पर रोक लग सकती है...?  
 
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Manipur Violence Explained: Why Violence in Manipur Again Reason Know When And How Will It Stop All Details
मणिपुर में हिंसा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है। गुरुवार की रात एक बार फिर से हिंसात्मक घटना सामने आई है। इस बार उपद्रवियों ने केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री आरके रंजन सिंह के कोंगबा स्थित आवास को आग के हवाले कर दिया। गनीमत रही कि केंद्रीय मंत्री घटना के समय घर पर नहीं थे। इससे पहले कुछ उपद्रवियों ने बुधवार को इंफाल पश्चिम के लाम्फेल क्षेत्र में मंत्री नेमचा किपजेन के घर में आग लगा दी थी। किपजेन 2017 से कांगपोकपी निर्वाचन क्षेत्र से मणिपुर विधानसभा की सदस्य हैं।


 हिंसा का असर देखें तो कुकी और मैतेई समुदाय के बीच 42 दिनों से जारी इस हिंसा में अब तक 107 लोग मारे जा चुके हैं। 400 से ज्यादा घायल बताए जा रहे हैं। जगह-जगह आगजनी की घटनाएं सामने आ रहीं हैं। 80 हजार से ज्यादा लोग अपने घरों को छोड़कर कैंप में रहने को मजबूर हैं। 


आइए जानते हैं इस हिंसा के पीछे की पूरी कहानी क्या है? आखिर तमाम कोशिशों के बावजूद यहां बार-बार हिंसा क्यों भड़क रही है? इस हिंसा में म्यांमार की कितनी भूमिका? कब और कैसे हिंसा पर रोक लग सकती है...?  
 

पहले जानिए विवाद के पीछे की कहानी क्या है? 
मणिपुर की राजधानी इम्फाल बिल्कुल बीच में है। ये पूरे प्रदेश का 10% हिस्सा है, जिसमें प्रदेश की 57% आबादी रहती है। बाकी चारों तरफ 90% हिस्से में पहाड़ी इलाके हैं, जहां प्रदेश की 42% आबादी रहती है। इम्फाल घाटी वाले इलाके में मैतेई समुदाय की आबादी ज्यादा है। ये ज्यादातर हिंदू होते हैं। मणिपुर की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 53% है। आंकड़ें देखें तो सूबे के कुल 60 विधायकों में से 40 विधायक मैतेई समुदाय से हैं।

वहीं, दूसरी ओर पहाड़ी इलाकों में 33 मान्यता प्राप्त जनजातियां रहती हैं। इनमें प्रमुख रूप से नागा और कुकी जनजाति हैं। ये दोनों जनजातियां मुख्य रूप से ईसाई हैं। इसके अलावा मणिपुर में आठ-आठ प्रतिशत आबादी मुस्लिम और सनमही समुदाय की है। 

भारतीय संविधान के आर्टिकल 371C के तहत मणिपुर की पहाड़ी जनजातियों को विशेष दर्जा और सुविधाएं मिली हुए हैं, जो मैतेई समुदाय को नहीं मिलती। 'लैंड रिफॉर्म एक्ट' की वजह से मैतेई समुदाय पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदकर बस नहीं हो सकता। जबकि जनजातियों पर पहाड़ी इलाके से घाटी में आकर बसने पर कोई रोक नहीं है। इससे दोनों समुदायों में मतभेद बढ़ गए। 
 

अब हिंसा भड़कने के पीछे तीन अहम बातें भी जान लीजिए

1. मैतेई समुदाय के एसटी दर्जे का विरोध: मैतेई ट्राइब यूनियन पिछले कई सालों से मैतेई समुदाय को आदिवासी दर्जा देने की मांग कर रही है। मामला मणिपुर हाईकोर्ट पहुंचा। इस पर सुनवाई करते हुए मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से 19 अप्रैल को 10 साल पुरानी केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय की सिफारिश प्रस्तुत करने के लिए कहा था। इस सिफारिश में मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने के लिए कहा गया है।

 कोर्ट ने मैतेई समुदाय को आदिवासी दर्जा देने का आदेश दे दिया। अब हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच केस की सुनवाई कर रही है।

बेंच ने कहा कि वह हाईकोर्ट में लंबित रिजर्वेशन के मुद्दे में नहीं जाएंगे। कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है। कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने पूछा है कि हिंसा के बाद क्या सुरक्षा मुहैया कराई गई? क्या सहायता दी गई है? पुनर्वास के बारे में क्या प्लान है? 
 

2. सरकार की अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई: ये मणिपुर में हिंसा फैलने का दूसरा बड़ा कारण है। मणिपुर सरकार ने जंगलों और वन अभयारण्य में गैरकानूनी तरीके से कब्जा किए लोगों को हटाने के लिए अभियान शुरू किया है। 

मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की सरकार का कहना है कि आदिवासी समुदाय के लोग संरक्षित जंगलों और वन अभयारण्य में गैरकानूनी कब्जा करके अफीम की खेती कर रहे हैं। ये कब्जे हटाने के लिए सरकार मणिपुर फॉरेस्ट रूल 2021 के तहत फॉरेस्ट लैंड पर किसी तरह के अतिक्रमण को हटाने के लिए एक अभियान चला रही है।

वहीं, आदिवासियों का कहना है कि ये उनकी पैतृक जमीन है। उन्होंने अतिक्रमण नहीं किया, बल्कि सालों से वहां रहते आ रहे हैं। सरकार के इस अभियान को आदिवासियों ने अपनी पैतृक जमीन से हटाने की तरह पेश किया। जिससे आक्रोश फैला। विरोध तेज हुआ तो सरकार ने इन इलाकों पर धारा-144 लागू कर दी। प्रदर्शन पर रोक लगा दी, लेकिन इसके उलट विरोध प्रदर्शन ने उग्र रूप धारण कर दिया।  
 

3. कुकी विद्रोही संगठनों ने सरकार से हुए समझौते को तोड़ दिया: सूबे में एक साथ कई चीजें होने लगीं। एक तरफ मैतेई आरक्षण का विरोध, दूसरी तरफ सरकार का अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई को लेकर आदिवासी और सरकार आमने-सामने थे। 

इस बीच, कुकी विद्रोही संगठनों ने भी 2008 में हुए केंद्र सरकार के साथ समझौते को तोड़ दिया। दरअसल, कुकी जनजाति के कई संगठन 2005 तक सैन्य विद्रोह में शामिल रहे हैं। मनमोहन सिंह सरकार के समय, 2008 में तकरीबन सभी कुकी विद्रोही संगठनों से केंद्र सरकार ने उनके खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन यानी SoS एग्रीमेंट किया।

इसका मकसद राजनीतिक बातचीत को बढ़ावा देना था। तब समय-समय पर इस समझौते का कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा, लेकिन इसी साल 10 मार्च को मणिपुर सरकार कुकी समुदाय के दो संगठनों के लिए इस समझौते से पीछे हट गई। ये संगठन हैं जोमी रेवुलुशनरी आर्मी और कुकी नेशनल आर्मी। ये दोनों संगठन हथियारबंद हैं। हथियारबंद इन संगठनो के लोग भी मणिपुर की हिंसा में शामिल हो गए और सेना और पुलिस पर हमले करने लगे। 
 

फिर ऐसे शुरू हुई हिंसा
तनाव की शुरुआत चुराचंदपुर जिले से हुई। ये राजधानी इम्फाल के दक्षिण में करीब 63 किलोमीटर की दूरी पर है। इस जिले में कुकी आदिवासी ज्यादा हैं। गवर्नमेंट लैंड सर्वे के विरोध में 28 अप्रैल को द इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने चुराचंदपुर में आठ घंटे बंद का ऐलान किया था। देखते ही देखते इस बंद ने हिंसक रूप ले लिया। उसी रात तुइबोंग एरिया में उपद्रवियों ने वन विभाग के ऑफिस को आग के हवाले कर दिया। 27-28 अप्रैल की हिंसा में मुख्य तौर पर पुलिस और कुकी आदिवासी आमने-सामने थे।  

इसके ठीक पांचवें दिन यानी तीन मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर ने 'आदिवासी एकता मार्च' निकाला। ये मैतेई समुदाय को एसटी का दर्जा देने के विरोध में था। यहीं से स्थिति काफी बिगड़ गई। आदिवासियों के इस प्रदर्शन के विरोध में मैतेई समुदाय के लोग खड़े हो गए। लड़ाई के तीन पक्ष हो गए।  

एक तरफ मैतेई समुदाय के लोग थे तो दूसरी ओर कुकी और नागा समुदाय के लोग। देखते ही देखते पूरा प्रदेश इस हिंसा की आग में जलने लगा। चार मई को चुराचंदपुर में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की एक रैली होने वाली थी। पूरी तैयारी हो गई थी, लेकिन रात में ही उपद्रवियों ने टेंट और कार्यक्रम स्थल पर आग लगा दी। सीएम का कार्यक्रम स्थगित हो गया। 
 

अब तक क्या-क्या एक्शन हुआ?
  • हिंसा भड़कने के बाद केंद्र सरकार ने कानून व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया। गृहमंत्री अमित शाह ने खुद पांच दिनों तक मणिपुर में रहे।  
  • पूरे सूबे में केंद्र सरकार ने सेना और अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया है। कई जिलों में कर्फ्यू लगा दिया गया, जो अब तक जारी है।  
  • पूरे राज्य में इंटरनेट को भी बैन कर दिया गया है। अब तक 60 हजार से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं।
  • मुख्यमंत्री वीरेन सिंह ने बताया कि अब तक 40 उग्रवादियों को मुठभेड़ में मारा जा चुका है। 
  • पुलिस, सेना और अद्धसैनिक बलों को भी साफ संदेश है कि अगर कोई हिंसा भड़काने या हिंसा करने की कोशिश करता है तो उसपर सख्त कार्रवाई की जाए। 
  • म्यांमार बॉर्डर पर निगरानी बढ़ा दी गई है। यहां से बड़े पैमाने पर हथियार उग्रवादियों तक पहुंचते हैं।

कब और कैसे रुकेगी हिंसा? 
डिफेंस एक्सपर्ट कर्नल (रिटायर्ड) आशीष मोरे कहते हैं, 'जातिगत और समुदाय को लेकर भड़कने वाली हिंसा का आमतौर पर कोई सीधा अंत नहीं होता है। हां, इसे ठंडा जरूर किया जा सकता है। मणिपुर में भी इस वक्त कुकी और मैतेई समुदाय के बीच जो हो रहा है, वो इसी का नतीजा है। ऐसे मामलों में प्रशासन को सख्ती के साथ-साथ बातचीत का रास्ता भी निकालना चाहिए। बगैर बातचीत के ये विद्रोह और हिंसा रूकने वाली नहीं है। पहले भी पूर्वोत्तर के राज्यों में इस तरह के उद्रवादी संगठनों को रोकने के लिए सरकार ने बातचीत का प्लेटफॉर्म तैयाार किया था। अभी जो जरूरत है, वो ये कि दोनों पक्षों के लीडर्स को एक टेबल पर बैठाया जाए और उनसे मसले के हल को लेकर बातचीत की जाए। ये तभी संभव होगा जब उग्रवादी संगठनों और सरकार के बीच जरूरी कम्युनिकेशन हो।'

आशीष आगे कहते हैं, 'दोनों पक्षों के पुराने और बड़े चेहरों को ही कम से कम आमने-सामने बैठाना चाहिए। उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया जाना चाहिए कि बातचीत से ही ये विवाद शांत हो सकता है। इसके अलावा बॉर्डर पर भी निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। उग्रवादियों को म्यांमार के रास्ते गोला-बारूद और अत्याधुनिक राइफल्स मिल रहीं हैं। इसपर भी रोक लगाने की जरूरत है। इसके लिए पैरामिलिट्री फोर्स और स्थानीय पुलिस को साथ मिलकर काम करना होगा।'
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