शख्सियत: बंगाल की 'आयरन लेडी' ममता बनर्जी के लिए कोई नया नहीं है 2021 का चैलेंज
- किशोरावस्था से जुझारू ममता पर करीबियों को है भरोसा
- सोमनाथ दा को हराने वाली ममता के लिए महत्वपूर्ण है नंदीग्राम और 2021 का बंगाल
- 37 साल के संसदीय राजनीति में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा
- दो बार की मुख्यमंत्री, सात बार की सांसद के लिए कड़ा इम्तिहान
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विस्तार
66 साल की ममता बनर्जी 37 साल पहले 29 साल की उम्र में 1984 के लोकसभा चुनाव में सबसे युवा सांसद बनी थीं। ममता बनर्जी ने यह रिकार्ड माकपा के धाकड़ नेता सोमनाथ चटर्जी को जाधवपुर सीट से हराकर बनाया था। इससे पहले कॉलेज के दिनों में ममता ने कांग्रेस (आई) से जुड़ा छात्र परिषद यूनियन बनाया था और इसी के बैनर तले 1975 में कोलकाता में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का रास्ता रोका था। रास्ता ही नहीं रोका था, बल्कि उनकी कार के बोनट पर चढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सुर्खियां बटोरी थी। तब से ममता बनर्जी ने अपनी शर्तों पर राजनीति की। तमाम उतार-चढ़ाव आए, लेकिन राजनीतिक यात्रा नहीं रुकी।
ममता बनर्जी इस समय 2021 के विधानसभा चुनाव के लिए कड़ी चुनौती का सामना कर रही हैं। लेकिन उन्हें जानने वाले कहते हैं कि ममता ने जीवन में जिस जुझारूपन और चुनौती को जिया है, उसके सामने यह कुछ भी नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे सुधींद्र कुलकर्णी ममता बनर्जी पर बहुत भरोसा करते हैं। ममता सरकार में वित्त मंत्री रहे अमित मित्रा, पार्थ चटर्जी समेत सभी कहते हैं कि ममता के जुझारुपन में कोई संदेह नहीं है। सभी का मानना है कि ममता बनर्जी कहीं भी अनिर्णय का शिकार नहीं हैं और हमेशा नए तरीके से सोचकर बदलाव के लिए तैयार रहती हैं। तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि यही ममता बनर्जी की ताकत है। बताते हैं वह ममता के 90 के दशक से साथी हैं। ममता की नेतृत्व क्षमता देखकर ही कांग्रेस पार्टी को छोड़कर 1998 में तृणमूल कांग्रेस में आए थे। उन्होंने 1990 की उस ममता बनर्जी को भी बड़े करीब से देखा है, जब वाम दल के गुंडों ने बनर्जी पर हमला कर दिया था। सिर में 16 टांके लगे थे और ममता कुछ महीने तक अस्वस्थ थीं, लेकिन हौसला बना हुआ था।
मां, माटी, मानुष वाली ममता दायरे में नहीं बंधतीं
ममता बनर्जी की पार्टी का मुख्य लोगो 'मां, माटी और मानुष' है। लेकिन वह अपने लक्ष्य को सामने रखती हैं और उसे साधने में किसी तरह का परहेज नहीं करती। विरोधियों की परवाह करने की बजाय उनसे डटकर मुकाबला करने में विश्वास करती हैं। बताते हैं कि ममता बनर्जी ने 80 के दशक में ही वाम दलों के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई शुरू की थी। इसे उन्होंने पश्चिम बंगाल में वाम दलों की जड़ उखाड़ने तक जारी रखा। इस पड़ाव तक आने के लिए ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस बनाई, 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में शामिल हुईं, तृणमूल एनडीए का हिस्सा बनी और 2001 में तहलका प्रकरण के सामने आने के बाद जार्ज फर्नांडीज का इस्तीफा मांगते हुए एनडीए छोड़ दिया। वह पश्चिम बंगाल की राजनीति में वाम दलों की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए सक्रिय हो गईं। इस दौरान ममता बनर्जी ने वामदलों को सत्ता से बेदखल करने के लिए भाजपा से सहयोग लेने में कोई संकोच नहीं किया।
2009 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी फिर कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर यूपीए में लौट आईं। मनमोहन सिंह सरकार में रेल मंत्री रहीं और मई 2011 में पार्टी के पूर्ण बहुमत मिलने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं। अभी तक ममता राज्य की मुख्यमंत्री हैं। दूसरे चरण में भी उन्होंने जहां तक संभव हुआ वाम दलों को कमजोर करने के लिए कांग्रेस का सहयोग लिया। ममता के करीबी बताते हैं कि वह बहुत सरल हैं, लेकिन फिर भी उन्हें समझना बहुत आसान नहीं है। कारण साफ है। ममता बनर्जी लक्ष्य से समझौता नहीं करतीं और उसके लिए हर कुर्बानी देने के लिए तैयार रहती हैं। दीपांकर भट्टाचार्य एक संदर्भ बताते हैं। वह कहते हैं कि 1992 में ममता बनर्जी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सोमित्र दा के खिलाफ पर्चा भरा। सौमित्र दा का साथ अब्दुल गनी खान चौधरी जैसे नेताओं ने दिया। ममता चुनाव हार गईं, लेकिन ममता ने हार के बाद भी अपने अभियान को नहीं रोका। वह सौमित्र दा के खिलाफ भी बोलने से नहीं चूकीं। अब्दुल गनी खान तक पर निशाना साधती रहीं।
सिंगूर और नंद्रीग्राम ने दे दिया ममता के हाथ में बंगाल
शुभेंदु अधिकारी के पिता शिशिर अधिकारी भी ममता का जुझारूपन, समर्पण देखकर उनके साथ आए थे। शिशिर 60 के दशक से राजनीति में हैं। बंगाल की राजनीति के जानकारों का कहना है कि 1998 से वाम दलों को सत्ता से बाहर करने का तृणमूल का अभियान तेजी से शुरू हुआ, लेकिन असल तेजी तो 2007 के बाद आई। सिंगूर के बाद नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण का बुद्धदेव भट्टाचार्य का केरल आधारित फॉर्मूला ममता बनर्जी को संजीवनी दे गया। इससे पहले ममता बनर्जी ने तृणमूल के आधार में वामदलों की राजनीति, विचारधारा, कैडर सभी को अपने तरीके से बदलाव करके जगह दे दी। 2009 में ममता की राजनीतिक लड़ाई ने वामदलों की जड़ों को हिलाकर रख दिया। इस मुकाम तक पहुंचने से पहले ममता बनर्जी ने राजनीति में वाम दलों की सरकार के दमन, पुलिस की बर्बरता, स्थानीय स्तर के गुंडों का हमला तथा अपने कार्यकर्ताओं पर हमला, हत्या जैसे तमाम दंश झेले।
नंदीग्राम और बंगाल की लड़ाई थोड़ा अलग है
भाजपा और तृणमूल दोनों ही दलों के पश्चिम बंगाल के नेता मानते हैं कि ममता बनर्जी को भाजपा ने उन्हीं की स्टाइल में चुनौती दी है। ममता बनर्जी को अपनी ही पार्टी तृणमूल से भाजपा में चले गए नेताओं से जूझना पड़ रहा है। मुकुल राय, अर्जुन सिंह, जितेन्द्र तिवारी, शिशिर अधिकारी, शुभेंदु अधिकारी, दिव्येन्दु अधिकारी जैसे दर्जनों नाम हैं। तृणमूल के इन नेताओं के कहने पर तृणमूल से भाजपा में गए कुछ दर्जन नेताओं को भाजपा ने टिकट देकर मैदान में उतारा है। नंदीग्राम में चुनाव मैदान में उतरे शुभेंदु अधिकारी भी इसमें से एक हैं। भाजपा के एक उपाध्यक्ष तो यहां तक कहते हैं कि तृणमूल का पूरा कूड़ा साफ हो गया है।
नारदा-शारदा के सभी आरोपी भाजपा में आ गए हैं। यह राज्य के कुछ क्षेत्रों में भाजपा के लिए अच्छा है, लेकिन इससे गया संदेश कई क्षेत्रों में खराब असर डाल रहा है। भाजपा के नेता शुभेंदु अधिकारी के नंदीग्राम से मैदान में उतरने और उनकी चुनौती को ममता बनर्जी द्वारा उतारने को अहम मान रहे हैं। भाजपा के नेताओं का कहना है कि शुभेंदु का गढ़ है नंदीग्राम। यहां ममता की पराजय तय है। इसके जवाब में तृणमूल के नेता कहते हैं कि मतदान हो चुका है। अब कहने से क्या फायदा। दो मई का इंतजार कीजिए। तृणमूल के प्रवक्ता कहते हैं निश्चित रूप से नंदीग्राम और आसपास का क्षेत्र अधिकारी परिवार के परिवार वाला है, लेकिन उससे पहले यह तृणमूल के प्रभाव वाला है। तृणमूल ने इसे वामदलों से छीनकर अपना गढ़ बनाया। जनता इसे समझती है। इसलिए यहां शुभेंदु और भाजपा का खरा-खरा हिन्दुत्व का मॉडल, ध्रुवीकरण का प्रयास नहीं चलने वाला है। यह दोनों बंगाल के लोगों की सोच के अनुरुप नहीं है। इंतजार कीजिए।
ममता के लिए 2021 अच्छा भी है और बुरा भी
ममता की पार्टी के लिए सीटों के आकलन में लगे सांसद अभिषेक बनर्जी की टीम के सदस्य फिलहाल जीत को लेकर आशान्वित हैं। 'खेला होबे' का थीम सांग लिखने वाले देबांगशु भट्टाचार्य कहते हैं कि यह गाना तो पूरे बंगाल में लोगों की जुबान पर है। अब तो शादियों, समारोहों में बजने लगा है। यह ममता बनर्जी की राजनीतिक मजबूती का संकेत है। वहीं बंगाल में भाजपा की आईटी सेल के लिए काम कर रहे सूत्र का कहना है कि बहुत मुगालता पालना ठीक नहीं है। फुरफुरा शरीफ के पीरजादा का ममता को खुला समर्थन रहता था। इस बार उनकी पार्टी आईएसएफ कांग्रेस, वामदल के साथ तालमेल करके चुनाव लड़ रही है। उनकी क्षेत्र के अल्पसंख्यकों में पैठ है। हालांकि ममता के लिए अच्छी बात है कि फुराफुरा शरीफ के पीरजादा ने नंदीग्राम को बख्श दिया है। यह ममता बनर्जी के लिए अच्छी खबर है, लेकिन पूरे बंगाल में उनकी पार्टी का चुनाव लड़ना तो अच्छा संकेत नहीं है।
तृणमूल के नेता कहते हैं कि अभी नंदीग्राम पर चर्चा कर लीजिए। वहां 30 फीसदी अल्पसंख्यक वोट हैं और 30 फीसदी का 90 फीसदी से अधिक तृणमूल को मिलेगा। 70 फीसदी हिंदू वोटों में से मतदान होने वाले मतों का 45 फीसदी भी ममता बनर्जी को मिल गया तो जीत पक्की है। इसलिए मुख्यमंत्री के नंदीग्राम जीतने में कोई संदेह नहीं है। हार-जीत का अंतर पहले से कम हो सकता है। रहा सवाल मतदान प्रतिशत का तो 2016 में 86.7 फीसदी मतदान हुआ था। इस बार 80 फीसदी हुआ है। यह भी भाजपा के पक्ष में नहीं है। बाकी लोग गणित लगाते रहें।
ममता बनर्जी ने संघर्ष के सिवा देखा क्या है?
मालिनी चटर्जी की राजनीति में रुचि है। वह पिछले डेढ़ महीने से पश्चिम बंगाल में सक्रिय हैं। वह एक सर्वेक्षण एजेंसी के लिए काम कर रही हैं। बताती हैं कि ममता के खिलाफ लोगों की राय बनी है, लेकिन अभी यह ममता बनर्जी को सत्ता से उखाड़ फेंकने वाले स्तर तक नहीं पहुंची है। इसकी स्थिति अभी 2006 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव वाली लग रही है। खैर अभी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि भाजपा ने राजनीतिक लड़ाई में पूरी ताकत झोंक दी है। छह चरण मतदान भी बाकी है। हालांकि मालिनी का भी कहना है कि ममता की इमेज राज्य में जुझारू नेता की है। ममता को जानने वाले कहते हैं कि जब वह 17-18 साल की थीं, तभी उनके पिता की तबियत खराब होने के कारण मृत्यु हो गई थी। ममता ने तो पूरा जीवन अपने बल पर देखा है। खैर, दो बार की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और 1984,1991, 1996, 1998, 1999, 2004 व 2009 (सात बार) की सांसद ममता बनर्जी के लिए विधानसभा चुनाव 2021 एक कड़ा इम्तिहान है। देखना है हमेशा चुनौतियों से गुजरीं ममता नई चुनौती को किस अंदाज में पार करती हैं।