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Malegaon Blast: पांच जज, दो एजेंसियां और 17 साल का इंतजार; मालेगांव केस में कब-कहां और कैसे अटकता रहा मामला?

Thu, 31 Jul 2025 02:48 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Thu, 31 Jul 2025 02:48 PM IST
सार

मालेगांव धमाके मामले में कोर्ट ने 17 साल बाद फैसला सुनाया और सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। जांच के दौरान एटीएस और एनआईए जैसी दो एजेंसियां बदलीं और पांच जजों ने अलग-अलग चरणों में केस की सुनवाई की। बार-बार जज बदलने और रिकॉर्ड की जटिलता के चलते मामला लगातार लटकता रहा। कोर्ट ने सबूतों के अभाव में आरोपियों को दोषमुक्त किया।

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Malegaon Blast case Five judges two agencies know when, where and how did case stuck
साध्वी प्रज्ञा - फोटो : ANI

विस्तार

साल 2008 में हुए मालेगांव ब्लास्ट केस में आखिरकार 31 जुलाई 2025 को स्पेशल कोर्ट ने सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया। इनमें बीजेपी सांसद रहीं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस और विश्वसनीय सबूत नहीं है। यह मामला करीब 17 साल तक चला और इस दौरान जांच एजेंसियों और जजों में बार-बार बदलाव होते रहे। आइए जानते हैं कि आखिर कब-कैसे और कहां ये मामला अटकता रहा।
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इस केस की शुरुआत महाराष्ट्र एटीएस की जांच से हुई थी, जिसने 'अभिनव भारत' नाम के दक्षिणपंथी संगठन से जुड़े लोगों को दोषी बताया। बाद में केस एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को सौंपा गया जिसने साध्वी प्रज्ञा को क्लीन चिट दी, लेकिन कोर्ट ने इस पर सहमति नहीं जताई और ट्रायल जारी रखा। इस मामले की सुनवाई के दौरान पांच जज बदले, जिससे ट्रायल में देरी होती रही।
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हर नए जज को फिर से पढ़नी पड़ी पूरी फाइल
पीड़ितों और बचाव पक्ष दोनों ने स्वीकार किया कि बार-बार जज बदलने से मुकदमे में देरी हुई। पहले जज वाई.डी. शिंदे ने आरोपियों की रिमांड ली और मकोका कानून को हटाया, जिसे बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने दोबारा बहाल कर दिया। इसके बाद जज एसडी टेकाले, वीएस पडलकर, पी.आर. सितरे और अंत में एके लाहोटी ने सुनवाई की। हर बार नए जज को हजारों पन्नों की फाइल दोबारा पढ़नी पड़ी, जिससे ट्रायल की गति धीमी रही।
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ये भी पढ़ें- मालेगांव ब्लास्ट केस के सभी आरोपी बरी: प्रज्ञा ठाकुर, प्रसाद पुरोहित के साथ किस-किस पर था केस, क्या थे आरोप?


गवाहों की गवाही और कोविड से आई रुकावट
जज पडलकर के कार्यकाल में आरोप तय किए गए और गवाहों की गवाही शुरू हुई। लेकिन कोविड महामारी के कारण सुनवाई कुछ समय के लिए रुक गई। फिर जज सितरे ने एक साल में करीब 100 गवाहों से पूछताछ की। जब उनका तबादला हुआ, तो पीड़ितों ने हाईकोर्ट को पत्र लिखकर उनके ट्रांसफर को रोकने की मांग की।

ये भी पढ़ें- 'संदेह वास्तविक सबूत की जगह नहीं ले सकता, दोषसिद्धि के लिए कोई साक्ष्य नहीं', कोर्ट का फैसला

अंत में लाहोटी ने पूरा किया ट्रायल
2022 में जज लाहोटी ने केस की कमान संभाली और अप्रैल 2025 तक सुनवाई करते रहे। जब उनका भी तबादला तय हुआ, तो फिर से पीड़ितों ने हाईकोर्ट से दखल की अपील की। नतीजा यह रहा कि उनका कार्यकाल अगस्त 2025 तक बढ़ा दिया गया, जिससे वो ट्रायल पूरा कर सके। इस लंबे मुकदमे के अंत में कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया और एक ऐतिहासिक केस का फैसला सामने आया।
 
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