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बापू की गोद में बड़े हुए साबरमती आश्रम के मुस्लिम प्रमुख का दाह संस्कार

Sun, 09 Oct 2016 04:33 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 09 Oct 2016 04:33 PM IST
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Mahatma Gandhi's ashram's Muslim head dead; chooses cremation
बापू की गोद में अब्दुल हामिद कुरैशी - फोटो : google
राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने कहा था, 'मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।' बापू के सच्चे भक्त और साबरमती आश्रम के चेयरमैन 89 वर्षीय अब्दुल हामिद कुरैशी ने अपनी मौत के साथ बापू का पैगाम भी जोड़ दिया। पेशे से वकील रहे कुरैशी चाहते थे कि उन्हें दफनाया न जाए बल्कि दाह संस्कार किया जाए। 
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नवरंगपुरा की स्वास्तिक सोसायटी में अपने नाश्ते की टेबल पर कुरैशी ने आखिरी सांसें ली। साबरमती आश्रम अंग्रेजों के खिलाफ बापू के स्वतंत्रता आंदोलन का उद्गम रहा है। 
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कुरैशी को जब अंतिम संस्कार के लिए मुक्ति धाम ले जाया गया, तो उनका पूरा परिवार भी वहां पहुंचा। दुख की घड़ी में परिवार के साथ वहां देश की न्याय व्यवस्था से जुड़े कई वरिष्ठ भी नजर आए। कुरैशी इमाम साहब अब्दुल कादिर बावाजिर के पोते थे, जो दक्षिण अफ्रीका में बापू के निकट मित्र थे। बापू इमाम बावाजिर को 'सहोदर' कहा करते थे, जिसका अर्थ होता है एक ही मां से पैदा हुआ भाई। 
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कुरैशी के भाई वाहिद कुरैशी के दामाद भरत नाइक ने कहा, 'कुरैशी साहब ने इच्छा जताई थी कि उनका दाह संस्कार किया जाए क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि उन्हें दफनाकर जमीन का टुकड़ा बर्बाद किया जाए। वास्तव में परिवार के अन्य सदस्यों की उपस्थिति में उन्होंने मुझे अपने निर्णय का गवाह बनाया था।' पिछले चार सालों से वह अपने बेटे जस्टिस अकील कुरैशी और नाइक को लगातार इसकी याद दिला रहे थे कि उनका दाह संस्कार ही किया जाना चाहिए। 

उन्होंने जोर देकर कहा था कि अगर कोई इस पर सवाल उठाता है, तो इसे आखिरी इच्छा कहा जाए। शाम 7 बजे कुरैशी का दाह संस्कार हुआ। 

 

बापू के लंच से टमाटर खाया करते थे कुरैशी

Mahatma Gandhi's ashram's Muslim head dead; chooses cremation
... अपने आखिरी सफर पर अब्दुल हामिद कुरैशी - फोटो : Google
कुरैशी का जन्म अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में ही हुआ था, 1915 में इमाम बावाजिर बापू के साथ साबरमती आश्रम में रहने लगे थे। 1927 में जन्मे कुरैशी बापू की गोद में खेलकर बड़े हुए थे। कुरैशी उन छोटे बच्चों में से थे जो बापू के लंच से टमाटर के स्लाइस उठाकर खाया करते थे। बापू ने युवा कुरैशी को कई खत भी लिखे थे, जिन्हें बाद में नेशनल आर्काइव ऑफ इंडिया को दान कर दिया गया। 

साबरमती आश्रम के डायरेक्टर त्रिदीप सुहरूद ने कहा, 'कुरैशी के पिता, गुलाम रसूल दांडी मार्च यात्रा में 'अरूण टुकड़ी' का हिस्सा थे, जो सबसे आगे चलते थे। 'अरूण टुकड़ी' का काम बैठकों और विश्राम की व्यवस्था को देखना था। 

आश्रम के सचिव अमरूत मोदी ने बताया, 'दांडी मार्च के दौरान गुलाम रसूल और उनकी पत्नी के गिरफ्तार होने के बाद अब्दुल हामिद, उनके भाई वाहिद और बहन सुल्ताना की देखरेख और लालन-पालन का जिम्मा अनसुइया साराभाई ने संभाला।' उन्होंने कहा कि साराभाई एक गांधीवादी महिला थी और उन्होंने भारत में महिला मजदूर आंदोलन की नींव रखी। अहमदाबाद में रहने वाले इतिहासकार रिजवान कादरी ने कहा कि सितंबर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देतरोज में कुरैशी की गिरफ्तारी हुई।

कुरैशी को तीन साल पहले साबरमती आश्रम का चेयरमैन बनाया गया। समाज में शांति और सद्भाव के लिए काम करने वाले कुरैशी ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पुल के रूप में काम किया। 1969 में गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा भड़कने के बाद कुरैशी ने 'अग्निपरीक्षा' नाम से किताब भी लिखी। 
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