महाराष्ट्र: ईसी से बोले सीईओ- ईसीआईनेट साफ्टवेयर में बदलाव हो; भागवत बोले- धर्म का अर्थ केवल रीति-रिवाज नहीं
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) एस. चोकलिंगम ने निर्वाचन आयोग से ईसीआईनेट साफ्टवेयर में बदलाव करने की मांग की है, ताकि मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) सूची में गड़बड़ियों से जुड़े मामले में अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकें। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के वरिष्ठ अधिकारी चोकलिंगम ने निर्वाचन आयोग को 24 सितंबर को भेजे पत्र में यह अनुरोध किया है कि ऐसे मामलों में चुनाव पंजीकरण अधिकारियों को सुनवाई के बाद अंतिम फैसला लेने का अधिक अधिकार दिया जाए। एक अधिकारी ने बताया कि केंद्रीय चुनाव आयोग ने चोकलिंगम का अनुरोध स्वीकार कर लिया है। अधिकारी के मुताबिक सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अक्सर आयोग को अपने सुझाव भेजते रहते हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है। अधिकारी ने कहा कि सॉफ्टवेयर हमेंशा केंद्रीयकृत होता है और वहीं से नोटिस भेजे जाते हैं। चोकलिंगम ने अनुरोध किया था कि ईआरओ को किसी गड़बड़ी से जुड़े नोटिस पर फैसला लेने की शक्ति दी जाए। बता दें कि निर्वाचन आयोग ने महाराष्ट्र में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिय के दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाकर 12 अक्तूबर कर दी है।
धर्म का अर्थ केवल रीति-रिवाज, पूजा-पाठ या खान-पान की आदतें नहींः संघ प्रमुख भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने यवतमाल में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि धर्म का अर्थ केवल रीति-रिवाज, पूजा-पाठ या खान-पान की आदतें नहीं है। धर्म इससे कहीं बढ़कर है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश की सतत प्रगति धर्म के चार जरूरी स्तंभों सत्य, करुणा, तपस्या और पवित्रता (आंतरिक व बाहरी) पर आधारित होनी चाहिए। यही पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन में बताया गया है। आरएसएस प्रमुख ने बताया कि कैसे व्यक्तिगत त्याग से सबका भला होता है। उन्होंने जन-सेवा के प्रति उपाध्याय के निस्वार्थ समर्पण को याद किया। भागवत ने कहा, हमारा जीवन सिर्फ हमारे अपने लिए नहीं है। ...अगर हम अपने जीवन में कुछ चीजों का त्याग करते हैं ताकि सबकी जिंदगी बेहतर हो सके तो हमारा कुछ भी नुकसान नहीं होता। उन चीजों को पाने से जो खुशी मिलती, उससे कहीं ज्यादा खुशी उन्हें दूसरों के लिए त्यागने में मिलती है। जनसंघ नेता दिवंगत पं. उपाध्याय के दर्शन का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि वह अधिकतम लोगों के अधिकतम कल्याण की परिभाषा को स्वीकार नहीं करते थे, बल्कि उनका मानना था कि विकास ऐसा होना चाहिए जिससे सभी का कल्याण हो। संघ प्रमुख ने महात्मा गांधी के सिद्धांत को याद दिलाते हुए कहा कि कोई भी फैसला लेते समय समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का ध्यान रखा जाना चाहिए। संघ प्रमुख ने कहा कि प्रकृति की कीमत पर विकास नहीं होना चाहिए। विकास व पर्यावरण दोनों का संरक्षण होना चाहिए। उन्होंने जैविक खेती, मिश्रित खेती, पशुपालन पर जोर देते हुए बीज व खाद के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दिया। भागवत ने कहा कि यह लक्ष्य होना चाहिए कि किसान कर्ज के जाल में न फंसे और अधिक आत्मनिर्भर बने।