फिर पवार के हाथ में महाराष्ट्र की पावर, पलटेंगे सियासी बाजी या करेंगे नई डील
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महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन की सियासी बाजी एक बार फिर से उलझ कर रह गई है। अपनी पार्टी एनसीपी के 90 फीसदी विधायकों को साधने के साथ ही अजित पवार को विधायक दल का नेता पद से हटा कर नई सरकार के गठन की चाबी फिर से शरद पवार ने अपने हाथों में ले ली है।
राज्य का जनादेश ऐसा है कि भाजपा को सरकार बनाने के लिए किसी एक दल या एक दल के दो तिहाई विधायकों का साथ हासिल करना ही होगा। ऐसे में सवाल है कि क्या पवार शिवसेना-कांग्रेस के साथ सरकार बना भाजपा की सियासी बाजी पलटेंगे या भाजपा से नई डील कर एक बार फिर सबको चौंकाएंगे।
भाजपा के एक धड़े का मानना है कि अपनी राजनीतिक विरासत को भतीजे अजित पवार या सांसद पुत्री सुप्रिया सुले में से किसी एक को सौंपने के सवाल पर पवार खुद ऊहापोह में थे। पवार भाजपा के इतर शिवसेना-कांग्रेस के साथ भी सरकार बनाने की मुहिम से जुड़े थे तो उनके कई निर्णय से यह साफ संदेश गया था कि उनका भाजपा के प्रति भी एक सॉफ्ट कॉर्नर है।
इसी बीच जब अजित पवार की अगुवाई में एनसीपी का एक धड़ा भाजपा के साथ गया तो यह शरद पवार के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब शरद पवार भाजपा की जीती सियासी बाजी पलट देंगे या फिर जल्द ही भाजपा ने नई सियासी डील करेंगे। जाहिर तौर पर अगर नई सियासी डील हुई तो खुद के सियासी विरासत की जंग में सुप्रिया की राह का रोड़ा बन रहे अजित पवार का कांटा पवार निकाल चुके होंगे।
सबके लिए उलझन वाला जनादेश
महाराष्ट्र विधानसभा का जनादेश सभी दलों को उलझाने वाला है। सरकार बनाने केलिए या तो एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना को साथ आना होगा या फिर भाजपा को इनमें से किसी एक दल का साथ या इन दलों के दो तिहाई विधायकों का समर्थन हासिल करना होगा। चूंकि विधायक दल की बैठक के जरिये पवार ने अपने नब्बे फीसदी विधायकों को साधने का साफ संदेश दे दिया है, इससे सियासी बाजी फिर से उलझती दिख रही है।
पीएम से अब तक नहीं हुई चूक
पीएम ने जिस प्रकार सबसे पहले फडणवीस और अजित पवार को बधाई दी है उसमें भी कई संकेत छिपे हैं। पीएम ने अब तक स्थिति पूरी तरह साफ नहीं होने पर किसी सीएम या सरकार को बधाई नहीं दी है। मसलन कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जब बीएस येदियुरप्पा की अगुवाई में सरकार बनी तो पीएम न तो शपथ में शामिल हुए और न ही कोई बधाई संदेश भेजा।
जबकि इसी सूबे में जब कांग्रेस-जेडीएस के विधायकों के टूटने के बाद येदियुरप्पा सरकार बनी तो बधाई देने वालों में पीएम सबसे आगे थे। ठीक इसी तरह मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत से मामूली अंतर से चूकी भाजपा का जब सरकार बनाने की कोशिश की चर्चा हो रही थी, तब अचानक पीएम ने कांग्रेस के नेतृत्व में बनने वाली नई सरकार को बधाई दे दी थी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि पीएम का फडणवीस को बधाई संदेश बिना पुख्ता तैयारियों के नहीं दिया गया है।
बहुमत कुछ सुप्रीम कोर्ट के रुख से होगा तय
मामले की सुनवाई रविवार को सुप्रीम कोर्ट में होगी। शीर्ष अदालत के रुख से सूबे की राजनीति में नई हलचल पैदा हो सकती है। माना जा रहा है कि बहुत राहत देने के बाद भी शीर्ष अदालत नई सरकार को बहुमत साबित करने के लिए ज्यादा समय नहीं देगा। जाहिर तौर पर अगर फडणवीस सरकार को कम समय मिला तो भाजपा को सियासी बिसात सजाने में मुश्किल होगी।