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क्या महाराष्ट्र के सियासी समीकरणों ने कम कर दिया है मोदी-शाह का राजनीतिक दबाव?

Sat, 30 Nov 2019 01:16 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 30 Nov 2019 01:16 PM IST
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Maharashtra episode milded the pressure of Narendra Modi and Amit Shah Press Politics
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह - फोटो : PTI (सांकेतिक)

महाराष्ट्र में शिवसेना 'मातोश्री' की किंगमेकर वाली छवि से बाहर निकलकर अब सत्ता के प्रत्यक्ष केंद्र यानी मुख्यमंत्री कार्यालय में जा पहुंची है। उनके साथ ही प्रदेश में हाशिये पर जा चुकी कांग्रेस पार्टी ने सभी तरह की राजनीतिक मजबूरियों को किनारे रख कर शिवसेना की ताजपोशी में अपना हिस्सा भी डाल दिया। एनसीपी नेता शरद पवार ने मोदी-शाह की जोड़ी को जवाब देने के लिए ऐसा चक्रव्यूह रचा, जिससे एक नई चर्चा सामने आई।

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राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या महाराष्ट्र के सियासी समीकरणों ने मोदी-शाह के राजनीतिक दबाव को कुछ कम कर दिया है। शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत तो गोवा को लेकर यह बात पहले ही कह चुके हैं कि अब देखते रहिए आगे क्या-क्या होता है। जांच एजेंसियों का डर राजनीतिक दलों के दिमाग से अब निकलता जा रहा है।

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चुनावों से पहले नेताओं पर कसा था शिकंजा

आपको ध्यान होगा कि लोकसभा चुनाव से पहले कई राजनीतिक दलों के नेताओं पर जांच एजेंसियों ने शिकंजा कसने का प्रयास किया था। उस वक्त अधिकांश विपक्षी दलों ने यह कह कर मोदी सरकार को घेरने की योजना बनाई कि जांच एजेंसियों की मदद से विरोधी पार्टियों को निशाना बनाया जा रहा है। उस दौरान राबर्ट वाड्रा के जरिए गांधी परिवार और उस दौरान कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार पर निशान साध कर ममता बनर्जी को घेरने की कोशिश की गई। यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव का नाम भी खनन घोटाले की एफआईआर में लिखा गया। बसपा सुप्रीमो मायावती को भी पुराने मामलों की जांच की आड़ में डराने का प्रयास हुआ।

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वहीं चुनावों के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम और डी. शिवकुमार को भी जेल भेजा गया। विभिन्न दलों के अन्य नेताओं के खिलाफ भी कोई न कोई मामला सामने आता रहा। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा को महाराष्ट्र में ऐसी उम्मीद नहीं थी कि शिवसेना एक नया गठबंधन बना कर उससे दूर हो जाएगी। इसके बाद एनसीपी नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री रहे अजित पवार, जिनके खिलाफ ईडी के मामले चल रहे हैं, वे भी भाजपा को गच्चा देकर अपने पाले में वापस आ गए।

शिवसेना का संकेत, नहीं चलेगी दबाव की राजनीति

शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत का कहना है कि अब मोदी-शाह का राजनीतिक दबाव नहीं झेलेंगे। विपक्ष भी इस बात को धीरे-धीरे समझने लगा है। जांच एजेंसियों की मदद से किसी पार्टी या नेता को कितने दिन तक दबा कर रख सकते हैं। अब कोई किसी का दबाव नहीं मानेगा। शिवसेना विपक्ष को मजबूत करेगी। इसका परिणाम आप केवल महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों में भी देखेंगे।

सामना में पीएम को उद्धव का बड़ा भाई बताया 

एक तरफ संजय राउत बयान देते हैं कि अब गोवा का नंबर है। हो सकता है कि वहां भी विपक्षी दलों की एकता से भाजपा को बड़ा झटका मिले। दूसरी ओर, शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उद्धव का बड़ा भाई बताया है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि संघर्ष और लड़ाई तो जीवन का हिस्सा है। प्रधानमंत्री पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे देश का होता है। दिल्ली देश की राजधानी है, लेकिन महाराष्ट्र दिल्ली वालों का गुलाम नहीं। महाराष्ट्र का तेवर और सरकार का सीना तना रहेगा। यह राज्य दिल्ली को सबसे ज्यादा पैसा देता है। सामना में इस बात का भी उल्लेख किया गया कि देश की अर्थव्यवस्था मुंबई के भरोसे चल रही है। 

 

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