महाराष्ट्र चुनाव : अब पिछड़ों और हाशिये पर रहनेवालों को लुभाने में लगे उद्धव ठाकरे
- पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पिछड़ा वर्ग की जातियों के प्रधिनिधियों से मुलाकात की
- बड़े पैमाने पर हिंदू वोट खोने के बाद राज्य में नई जमीन की तलाश में शिवसेना
- जातीय समीकरणों को भी देखना अब शिवसेना की नई मजबूरी
- भाजपा से गठबंधन में 24 साल में शिवसेना के वोट सिर्फ तीन फीसदी बढ़े
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भाजपा की राष्ट्रवादी राजनीति के हाथों महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर हिंदू वोट खोने के बाद शिवसेना राज्य में नई जमीन की तलाश में लग गई है। अब उसने पिछड़े वर्ग और हाशिये पर रह रहीं जातियों को न्याय दिलाने के वादे के साथ आकर्षित करना शुरू किया है। कभी मराठी भाषा और अस्मिता के मुद्दों पर लड़ने वाली शिवसेना इस चुनाव में विभिन्न जातियों के वोट बटोरने के प्रयास में है।
इसी के तहत शनिवार की शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पिछड़ा वर्ग, धनगर, घुमंतु, कुनबी, बंजारा, तेली, माली और अन्य जातियों के प्रधिनिधियों से मुलाकात की। बाद में इन्हें साथ लेकर मीडिया से बातचीत की। उद्धव ने इन जातियों के प्रतिनिधियों की समस्याएं सुनी और विश्वास दिलाया कि भाजपा के साथ सरकार में आने पर उनकी हर समस्या सुलझाएंगे।
उन्होंने कहा कि जो सरकार न्याय नहीं दिला सकती, उसका क्या काम। उन्होंने कहा कि शिवसेना ने कमजोरों को न्याय दिलाने में सदा सकारात्मक भूमिका निभाई है और समाज के हर वर्ग के विकास के लिए कटिबद्ध है। उद्धव से पहले मंगलवार को शिवसेना नेता, उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने धनगर, कुनबी, बंजारा, माली, तेली, कोली तथा अन्य ओबीसी नेताओं से मुलाकात की थी।
यह अचानक परिवर्तन क्यों?
कभी तमिल, गुजरती, बिहारी को मुंबई और महाराष्ट्र में बाहरी बता कर वोट बटोरने वाली शिवसेना के सूत्र कहते हैं कि पार्टी समय के साथ खुद को बदल रही है। क्षेत्रीयता अब मुद्दा नहीं रही। यह समय की मांग भी है।
फिर आदित्य के रूप में पहली बार ठाकरे परिवार का कोई सदस्य चुनाव मैदान में उतर रहा है। यानि तीसरी पीढ़ी तक रिमोट कंट्रोल से पार्टी या सरकार चलाने का दौर भी खत्म हो गया। जानकार मानते हैं कि शिवेसना द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों के खत्म होने से उसकी स्थिति कमजोर हुई है।
24 साल में शिवसेना के सिर्फ तीन फीसदी वोट बढ़े
भाजपा ने विकास और राष्ट्रीयता की राजनीति से उसका विकल्प भी पेश कर दिया है। ऐसे में शिवसेना को बड़े दायरे में राजनीति करनी होगी। जातीय समीकरणों को भी देखना अब उसकी नई मजबूरी है। आंकड़े बताते हैं कि हिंदू और मराठा माणुस की राजनीति के साथ भाजपा से गठबंधन में 24 साल में शिवसेना के वोट सिर्फ तीन फीसदी बढ़े हैं। जबकि इस दौरान भाजपा के 16.38 फीसदी वोट बढे। 2019 चुनाव में अब भाजपा सीधे बिग ब्रदर के रोल में हैं। ऐसे में शिवसेना के पास पुराने वोट बैंक को बचाने के साथ नए वोटर जोड़ने की चुनौती है।