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विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए मिलने वाली स्कॉलरशिप पर महाराष्ट्र के दलित सबसे आगे

Wed, 04 Jul 2018 10:17 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 04 Jul 2018 10:17 AM IST
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Maharashtra Dalit tops on scholarships for foreign universities

विदेशी विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए दी जाने वाली सरकारी स्कॉलरशिप पाने वाले दलित छात्रों की संख्या के मामले में महाराष्ट्र देश में अव्वल है। हाल के वर्षों में स्कॉलरशिप पाने वालों की पड़ताल में यह पता चला है कि महाराष्ट्र इस लिहाज से देश के अन्य राज्यों से बहुत आगे है। फरवरी 2018 तक अनुसूचित जाति के 72 छात्रों को नैशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप स्कीम का लाभ मिला था जिनमें 40 छात्र अकेले महाराष्ट्र के हैं।

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अन्य राज्य इस मामले में महाराष्ट्र से कितने पिछड़े हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दूसरा स्थान हासिल करने वाले कर्नाटक और उत्तर प्रदेश से महज छह-छह छात्र इस लिस्ट में शामिल हैं। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से महाराष्ट्र का लगातार शानदार प्रदर्शन कर रहा है। 2016-17 में कुल 108 फेलोशिप बांटे गए थे, जिनमें 53 पर महाराष्ट्र ने जबकि यूपी ने आठ और मध्य प्रदेश एवं तमिलनाडु ने पांच-पांच फेलोशिप हासिल किए थे। दूसरे राज्यों के हिस्से 0 से 4 फेलोशिप हाथ लगे थे।
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महाराष्ट्र पिछले तीन वर्षों से फेलोशिप पानेवाले छात्रों की संख्या के लिहाज से टॉप कर रहा है। अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए नैशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप (एनओएस) फंड का संचालन सामाजिक न्याय मंत्रालय करता है। इसके तहत छात्रों का चयन विदेशी यूनिवर्सिटियों में मास्टर लेवल और पीएचडी पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए किया जाता है। पहले फेलोशिप की 30 सीटें ही थीं जो बढ़कर 60 हो गईं और 2014 से यह संख्या बढ़ाकर 100 की जा चुकी है।
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अधिकारियों का कहना है कि एनओएस पर महाराष्ट्र के दबदबे का कारण वहां के छात्रों को बेहतर शैक्षिक वातावरण मिलना है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में एनओएस के प्रति ज्यादा जागरूकता है क्योंकि वहां की सरकार भी इसी तरह की योजना चलाती है। समाजशास्त्रियों की नजर में यह भीमराव आंबेडकर और शिक्षा पर उनका जोर होने के कारण संभव हो रहा है। एक विशेषज्ञ ने कहा कि महाराष्ट्र ने कई साल पहले अपनी विदेश छात्रवृत्ति योजना शुरू की थी, जिसे एक गुणवत्ता कार्यक्रम के रूप में देखा जाता है, जबकि उच्च दलित आबादी वाले अधिकांश बड़े राज्यों में ऐसा प्रावधान नहीं होता है।

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