जाति की जादूगरी : आरक्षण और आंबेडकरवाद
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डॉ. आंबेडकर आखिर चाहते क्या थे? उनकी हमसे अपेक्षाएं क्या थीं? यह सब जाने और समझे बिना ही हर कोई आंबेडकरवादी होने की ताल ठोक रहा है। डॉ. आंबेडकर के चार प्रसिद्ध शब्द “स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व” भारतीय संविधान का आधार बने। उन्होंने अनेकों पुस्तकें लिखीं जिनमें ‘सामाजिक समानता’ का पक्ष ही प्रबल है। संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आंबेडकर, संविधान में सभी नागरिकों के लिए सबसे पहले “समानता” का अधिकार ही सुनिश्चित करते हैं, बावजूद इसके डॉ. आंबेडकर के समानता और जाति उन्मूलन संबंधी प्रश्न आज भी ज्यों के त्यों खड़े हैं और असमानता और जातिवाद जस का तस है।
संविधान सभा की अंतिम बहस को समाप्त करते हुए डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि “26 जनवरी 1950 को हम अंतर-विरोधों के जीवन में प्रवेश करेंगे, राजनीति में तो समानता होगी, परंतु सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी।” संविधान निर्माण में मुख्य भूमिका निभाने के बावजूद संविधान के दुरुपयोग की स्थिति में वे खुद संविधान जलाने तक की बात कह जाते हैं। बतौर डॉ. आंबेडकर “जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वह आपके लिए बेमानी है।” डॉ. आंबेडकर के कथनों में शोषितों, पीड़ितों और वंचितों के नागरिक अधिकारों तथा समतामूलक, लोकतांत्रिक भारत बनाने के प्रति बेचैनी और चिंता साफ दिखती है।
जाति एक विभाजनकारी संघटना है इसलिए जाति कभी भी किसी परिवर्तनकारी संघर्ष का आधार नहीं बन सकती। जाति किसी अंकुश या लालच के तहत एकता का भ्रम तो पैदा कर सकती है, लेकिन अंकुश ढीला होते ही जातीय एकजुटता बिखर जाती है। जाति की पहचान छोटे-मोटे व्यक्तिगत हितों को तो पूरा कर सकती है, लेकिन जाति कभी भी किसी क्रांतिकारी परिवर्तन के संघर्ष में मददगार नहीं हो सकती। बावजूद इसके दलितों में जाति का उभार, जातीय पहचान का सार्वजनिक प्रदर्शन और जाति के गौरव का महिमामंडन चरम पर करना कहीं न कहीं मनुवाद को ही मजबूत करता है। जातिवाद और आंबेडकरवाद साथ-साथ नहीं चल सकते।
जातीय पहचान के एवज में कुछ मिलने की आशा में खुद को शिक्षित और सक्षम मानने वाले तथाकथित आंबेडकरवादियों ने मनुवाद और आंबेडकरवाद में घाल-मेल कर समूचे आंबेडकरवादी विमर्श को ही धोखे में डाल दिया है। अपने नाम के आगे-पीछे जातियों की तख्तियां लटकाए तथाकथित आंबेडकरवादी जाति के प्रदर्शन में सबसे आगे दिखाई देते हैं। सवर्णों से समानता और जाति उन्मूलन की अपेक्षा करने वाले और दिनरात मनुवाद व ब्राह्मणवाद को कोसने वाले आत्ममुग्ध आंबेडकरवादी, अनुसूचित जातियों/जनजातियों में ही जाति का उन्मूलन और समानता स्थापित नहीं कर पाए तो दूसरों से अपेक्षा करना एक बहाना मात्र है।
आत्ममुग्ध आंबेडकरवादियों को एहसास तक नहीं है कि अगड़ी जातियां, पिछड़ी जातियों को साथ लेकर गम और खुशी तथा खान-पान में एक साथ होती हैं। पिछड़ी जातियां, जो संख्या बल में सबसे अधिक हैं वे भी गम और खुशी तथा खान-पान में एक साथ होती हैं। शादी ब्याह का मसला हो तो उसे भी मिल बैठकर निपटा लेते हैं और दूसरी ओर दलित जातियां हैं, जो खान-पान और शादी ब्याह तो दूर की बात, गम और खुशी में भी एक साथ नहीं होती। ब्राह्मणवाद की अपेक्षा दलितों में पनप रहा नव-ब्राह्मणवाद दलित एकता और सामाजिक न्याय के लिए घातक हैं। तथाकथित आंबेडकरवादी, ब्राह्मण के सिर तो बैठना चाहते हैं और अपने ही अनुसूचित जाति/जनजाति के भाइयों को अपनी बगल तक में बिठाने को तैयार नहीं हैं।
जब कोई व्यक्ति तथाकथित आंबेडकरवादियों से अनुसूचित जाति/जनजाति की विभिन्न जातियों में समानता और दलितों में जाति उन्मूलन की बात करता है तो ये उसी की जाति को संशय के घेरे में रख कर प्रश्न खड़े करते हैं कि निश्चित रूप से ये हम से भी नीची जाति का होगा, और हमारे समकक्ष आने का प्रयास कर रहा होगा। क्योंकि आरक्षण के लाभ से संपन्न जातियों में ऊंच-नीच का दंभ साफ दिखाई देता है। इन्हीं तथाकथित आंबेडकरवादियों ने डॉ. आंबेडकर के जाति उन्मूलन के मुद्दे को न केवल छोड़ दिया है बल्कि जाति उन्मूलन के मुद्दे का ही उन्मूलन कर दिया है। आंबेडकरवाद और बहुजनों के नाम पर बने राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में जाति उन्मूलन का न होना पूरे दलित विमर्श और उनके आंबेडकरवाद पर प्रश्न चिह्न लगाता है।
देश के सभी राजनैतिक दलों ने शुरू से ही कुछ चुनिंदा दलित जातियों को संरक्षण दिया और आगे बढ़ाया। जिसके कारण कुछ ही दलित जातियों और उनके परिवारों का संसद और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व करते रहे तो दूसरी ओर आजादी के सत्तर साल बाद भी कई अनुसूचित जातिया/जंनजातिया संसद और विधान सभाओं में अपने प्रतिनिधित्व को तरस रही हैं। राजनैतिक दलों द्वारा लगातार किए जा रहे इस जाति आधारित भेद भाव को भी अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत देखा जाना चाहिए।
सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष के राजनेता, दलितों की जमीनी हकीकत से अंजान हैं, क्योंकि दलितों में भी जाति-क्रम है, ऊंच –नीच है और छुआ-छूत है। दलितों में सफाई पेशा जातियां, दलितों के ही जाति आधारित भेदभाव, ऊंच –नींच और और छुआ-छूत का दंश झेल रही हैं। आरक्षण से संपन्न दलित जातियों का व्यवहार अन्य दलित जातियों, विशेषकर सफाई पेशा जातियों के साथ सवर्ण जातियों जैसा ही है। मैला ढोने वाला समुदाय, दलितों के अछूतपन का दंश जीते-जी ही नहीं मरने के बाद भी झेलता है। इनके मुर्दे और चिताएं तक भेद भाव का शिकार हैं। ग्रामीण भारत में सफाई पेशा समुदाय मुर्दों के लिए भी आरक्षण के लाभार्थी दलितों के श्मशानों में ले जाने की इजाजत नही है। तिरस्कार और भेद भाव के मारे सफाई पेशा समुदाय का दर्द कौन महसूस करेगा?
सवर्णो द्वारा दलितों पर किए जाने वाले शोषण और अत्याचार के विरुद्ध तो अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कारवाई की प्रावधान है किन्तु दलित मनुवादियों द्वारा दलितों पर किए जाने वाले जातीय भेद, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध कारवाई का कोई प्रावधान अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में नहीं है। इस अधिनियम को मनुवादी दलितों के विरुद्ध प्रभावी बनाए बगैर यह अधिनियम न केवल अधूरा है बल्कि संविधान सम्मत समानता और न्याय की अवधारणा के भी विरुद्ध है। अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत उन दलितों को भी शामिल किया जाए जो अन्य दलित जातियों विशेषकर सफाई पेशा जातियों के साथ जातीय भेदभाव, शोषण और अत्याचार करते हैं।
आरक्षण के लाभ का हकदार होने के बावजूद भारत में सफाई पेशा समुदाय आज भी श्रम के बदले रोटी और जूठन तथा रोजगार के नाम पर मल–मूत्र ढोने और गटर में जान देता है। तो आखिर आरक्षण का लाभ किस दिशा में जा रहा है? भारत सरकार ने मैला ढोने के काम को नागरिक समाज में एक अपराध और अमानवीय प्रथा करार देते हुए इसके खात्मे के लिए 1993 में एक कानून पारित किया था और इसे भी अत्याचार और शोषण के श्रेणी में रखा था, बावजूद इसके आज भी हजारों दलित व दलित महिलाएं मैला ढोने जैसे अमानवीय कार्य करने को मजबूर हैं। डॉ. आंबेडकर के नाम पर दलितों की राजनीति करने वाले तथाकथित अंबेडकरवादियों ने इनके हक और अधिकारों की आवाज संसद या सड़क पर नहीं उठाई। सामाजिक न्याय का पैमाना सफाई पेशा जातियां ही हैं। मैला ढोना और गटर में उतरना, मानवता की सारी हदें पार कर जाता है। संसद में सामाजिक न्याय के पैरोकार और संविधान की दुहाई देने वालों ने इन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।
सत्ता की लालसा में अंधे और दलित बहुजन ब्राह्मणवाद और मनुवाद कोसते जरूर हैं, लेकिन इन्हीं के सहयोग और आशीर्वाद से सत्ता-सुख भोगने, मंत्री, मुख्यमंत्री बनने और सत्ता के लिए दलितों के अधिकारों से खिलवाड़ करने से भी गुरेज नहीं करते। सत्ता-सुख के लिए विचारधारा इनके लिए कोई मायने नहीं रखती। जिन महापुरुषों के चित्र इनके बैनर और पोस्टरों पर दिखाई देते हैं यह एक छलावा मात्र है। भारत में जाति आधारित भेदभाव जीवित है तो इसके लिए जिम्मेदार तथाकथित दलित नेता और राजनीतिक आरक्षण पर काबिज जातियां ही हैं। जिन्होंने राजनीतिक सत्ता के लिए नागरिक अधिकारों को बलि चढ़ा दिया। इन्हीं के नकारापन की बदौलत 21वीं सदी में और आजादी के 70 साल बाद भी रोजगार के नाम पर दलित मल–मूत्र ढोने और गटर में मरने के लिए विवश हैं।
दलित बहुजन आंदोलन के नाम पर ब्राह्मणवाद, मनुवाद को कोसने वालों ने सवर्ण और अवर्ण के बीच सामाजिक घृणा की खाई को और गहरा करने का काम किया है। जिसके चलते दलितों पर अत्याचारों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। जाति का संक्रमण दलितों में बहुत गहरा है। सच तो ये है कि दलित स्वयं ही जाति व्यवस्था में बने रहना चाहते हैं, सिर्फ दिखावे के लिए जाति को कोसते हैं। प्रश्न यह उठता है कि जाति मे ऊंच-नीच है, असमानता है, शोषण और अत्याचार है तो दलितों को अपनी जाति छोड़ने से किसने रोका है?
आंबेडकरवाद और बौद्ध धर्म में जाति के लिए कोई स्थान नहीं है बावजूद इसके ये अपने आपको आंबेडकरवादी और बौद्धिष्ट भी कहाते हैं। इस बीच, आरक्षण के लाभ हेतु जाति के जूस से रिसती बूंद- बूंद के लिए अपनी अनुसूचित जाति/जनजाति में भी बने रहते हैं। ये कभी धर्मांतरण नहीं करते, ये केवल नामांतरण करते हैं बावजूद इसके धर्म से मिलने वाले लाभ पाने की कला इन्हें खूब आती है। हद तो तब हो जाती है जब कई चीवरधारी बौद्धिष्ट होने के बावजूद भी अपनी जाति में बने हैं और जाति व धर्म दोनों से लाभान्वित होते रहते हैं। ऐसे तथाकथित आंबेडकरवादी और तथाकथित बुद्धवादी, मनुवाद और ब्राह्मणवाद के प्रछन्न सहयोगी और समर्थक हैं।
संविधान द्वारा दलितों को लोकसभा, विधान सभाओं और स्थानीय निकायों में प्रदत्त आरक्षण का उपयोग न्यायसंगत तरीके से न किए जाने के कारण दलितों में ही असंतोष पैदा हो रहा है। अनुसूचित जातियों/जनजातियों की एक लंबी सूची है। बावजूद इसके कुछ चुनिंदा दलित जातियां और उनके परिवार ही पूरे राजनीतिक आरक्षण पर लंबे समय से काबिज हैं। इस कारण राजनीतिक आरक्षण का लाभ सभी अनुसूचित जातियों/जनजातियों को समान रूप से नहीं मिल पाया है। इसी कारण कई दलित जातियां राजनीति के हाशिए पर चली गई हैं। इसलिए समय आ चला है कि राजनीतिक आरक्षण का न्यायोचित लाभ अनुसूचित जातियों/जनजातियों को समान रूप से मुहैया कराने के लिए “कास्ट रोटेशन पॉलिसी” अर्थात “जाति फेर-बदल नीति” की आवश्यकता है।
“कास्ट रोटेशन पॉलिसी” के अंतर्गत, आरक्षित सीटों पर, हर चुनाव में जाति फेर-बदल जरूरी है। किसी भी आरक्षित सीट पर किसी भी जाति की पुनरावृति तब तक न हो जब तक राज्य या केंद्र की अनुसूचित जाति/जनजाति की सूची में उल्लेखित समस्त जातियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित न हो जाए। अर्थात लोक सभा एवं विधान सभाओं की आरक्षित सीटों पर, हर बार, जाति का फेर-बदल करके सभी दलित जातियों का बारी-बारी से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। जाति आधारित आरक्षण होने का अर्थ ही यह है कि सभी आरक्षित जातियों को इसका लाभ मिल सके।
संविधान में राजनैतिक आरक्षण हेतु समानुपातिक प्रतिनिधित्व की बात की गई है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में तो आरक्षण अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए नहीं बल्कि “व्यक्ति विशेष”, “जाति विशेष” या “परिवार विशेष” के लिए ही होकर रह गया है। ऐसा लगता है कि आरक्षित सीटें “व्यक्ति विशेष”, “जाति विशेष” या “परिवार विशेष” को आवंटित ही कर दी गई हैं। बारंबार एक ही व्यक्ति, एक ही जाति या एक ही परिवार का व्यक्ति संसद या विधान सभा में चुन कर जाता है। चुनिंदा दलित जातियों या परिवारों को राजनीतिक दलों का संरक्षण प्राप्त है। यहां तक कि तथाकथित अंबेडकरवादियों द्वारा दलितों के नाम पर बनाए गए राजनीतिक दलों में भी चुनिंदा जातियों का ही दबदबा है। यह लोकतंत्र लिए घातक है और सामाजिक न्याय के मूल सिदांतों के भी विरुद्ध है। इसलिए राजनीतिक आरक्षण में “कास्ट रोटेशन पॉलिसी” के तहत लोक सभा व विधान सभाओं आदि में आरक्षित सीटों पर सभी अनुसूचित जातियों/जनजातियों को बारी-बारी से मौका दिया जाना समय की मांग है राजनीतिक आरक्षण में “कास्ट रोटेशन पॉलिसी” सामाजिक न्याय में एक मील का पत्थर साबित होगी।
कोई तो हो जो सफाई पेशा समुदाय को भी आजादी का एहसास करा सके। तथाकथित आंबेडकरवादियों ने बाबा साहेब के विचारों की बारीकियों को भुलाकर बस जय भीम बोलने, नाम के आगे-पीछे आंबेडकर, बौद्ध व गौतम लिखने तथा मनुवाद और ब्राह्मणवाद को गाली देने को ही आंबेडकरवाद तथा डॉ. आंबेडकर को आरक्षण का पर्याय मान लिया है। यह बताता चलूं कि आंबेडकरवाद कोई खाला का घर नहीं, “ ये आग का दरिया है और डूब कर जाना है”।
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