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High Court: आत्मसमर्पण याचिकाओं के निपटारे को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने जारी किए निर्देश, जानें क्या कहा

Fri, 08 Mar 2024 06:40 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Fri, 08 Mar 2024 06:40 PM IST
सार

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार द्वारा दाखिल याचिका पर फैसला सुनाते हुए निर्देश जारी किए। तमिल सरकार की याचिका में न्यायिक मजिस्ट्रेट, सत्यमंगलम के एक आदेश को चुनौती दी गई थी। सत्यमंगलम ने उस आदेश में हत्या के चार आरोपियों के आत्मसमर्पण को स्वीकार करते हुए उन्हें सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।  

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Madras High Court issues directions to deal with surrender petitions
मद्रास हाईकोर्ट

विस्तार

मद्रास हाईकोर्ट ने आत्मसमर्पण याचिकाओं से निपटने के लिए दिशा निर्देश जारी किए हैं। मद्रास हाई कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि किसी मामले की सुनवाई का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करने वाले आरोपियों द्वारा दायर आत्मसमर्पण याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं हैं। यह फैसला न्यायमूर्ति एन आनंद वेंकटेश ने सुनाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी कई ऐसे फैसले दे चुका है। इन फैसलों के संदर्भ में ऐसी याचिकाओं पर सीआरपीसी की धारा 167 (2) के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा रिमांड का कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने याचिका पर फैसला देते हुए यह भी कहा कि इन निर्देशों का तमिलनाडु और पुडुचेरी के सभी मजिस्ट्रेटों द्वारा ईमानदारी से पालन किया जाएगा।

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मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार द्वारा दाखिल याचिका पर फैसला सुनाते हुए यह निर्देश जारी किए। तमिल सरकार की याचिका में न्यायिक मजिस्ट्रेट, सत्यमंगलम के एक आदेश को चुनौती दी गई थी। सत्यमंगलम ने उस आदेश में हत्या के चार आरोपियों के आत्मसमर्पण को स्वीकार करते हुए उन्हें सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।  
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तमिल सरकार की याचिका का निस्तारण करते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि कोई आरोपी व्यक्ति जिसे सीआरपीसी की धारा 167 (1) के तहत भेजा नहीं भेजा गया हो और जो स्वेच्छा से मजिस्ट्रेट के समक्ष आत्मसमर्पण याचिका दायर करता है, उस पर सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है। अदालत ने आगे कहा कि ऐसे में धारा 167(2) के प्रावधानों के तहत कार्रवाई के लिए, 15 दिनों की पुलिस हिरासत या 60 या 90 दिनों की हिरासत की अवधि केवल उस तारीख से शुरू होगी जिस दिन वह पुलिस द्वारा सीआरपीसी की धारा 167(1) के तहत न्यायालय की हिरासत में आता है। 
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उन्होंने यह भी साफ किया ये निर्देश केवल  भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज किए गए अपराधों से संबधित मामलों के संदर्भ में हैं। यह निर्देश सीमा शुल्क अधिनियम, 1962, फेमा, 1999 जैसे विशेष अधिनियमों के तहत आर्थिक अपराधों के संबंध में नहीं हैं। 


अदालत ने कहा कि यदि कोई आरोपी स्वेच्छा से मजिस्ट्रेट के सामने पेश होता है, जिसके पास मामले की सुनवाई का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है तो मजिस्ट्रेट यह निर्देश दे सकता है कि वह अपने  निकटतम पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस अधिकारी को आरोपी को हिरासत में लेने और  पुलिस स्थायी आदेश के खंड (3) से (5) में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उससे निपटने का निर्देश दे सकता है।

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