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नौकरी जाने की चिंता से देश में बढ़े घरेलू हिंसा के मामले, बचने के लिए विशेषज्ञ ने बताए ये उपाय

Sat, 18 Apr 2020 06:02 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 18 Apr 2020 06:02 PM IST
सार

  • लॉकडाउन से घरों में बंद लोग, बढ़ रहे आपसी तनाव के मामले
  • दिल्ली महिला आयोग के मुताबिक, लॉकडाउन में घरेलू हिंसा के प्रतिदिन आ रहे 1300 से 1400 कॉल, अपहरण और दुष्कर्म के मामले घटे
  • महिला हेल्पलाइन 181 लगातार चालू, महिलाएं घरेलू हिंसा के मामले में ले सकती हैं मदद

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loosen of job increasing the cases of domestic violence in india during lockdown
domestic violence - फोटो : For Refernce Only

विस्तार

लॉकडाउन के कारण घरों में कैद हुए पति-पत्नी के रिश्तों में दरार आ रही है। इस दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन में अनेक क्षेत्रों की नौकरियों पर संकट मंडरा रहा है। नौकरियों को खोने की चिंता से लोगों में तनाव बढ़ा है और इसकी वजह से घरेलू हिंसा के मामले बढ़ गए हैं। 
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राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक 23 मार्च से 16 अप्रैल के बीच घरेलू हिंसा के मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान उसे घरेलू हिंसा की 587 शिकायतें मिली हैं, जबकि इसकी तुलना में 27 फरवरी से 22 मार्च के बीच केवल 396 मामले ही उसके सामने आए थे।

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आयोग ने एक व्हाट्सअप नंबर (72177135372) जारी कर महिलाओं को घरेलू हिसा के मामलों में मदद देने की अपील भी की थी। हालांकि, इसी बीच दिल्ली महिला आयोग ने अपने यहां घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आने की जानकारी दी है।

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दिल्ली में मामले घटे

पूरी दुनिया में जहां महिलाओं पर होने वाली हिंसा के मामले बढ़े हैं, वहीं राजधानी दिल्ली की महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा है कि राजधानी में महिलाओं पर होने वाली हिंसा में कमी आई है।


दिल्ली महिला आयोग की हेल्पलाइन 181 पर घरेलू हिंसा की औसतन 1500 से 1800 के लगभग कॉल रोज आती हैं। लॉकडाउन की शुरुआत में यानी 26 मार्च से 31 मार्च के बीच जहां 27 मार्च को 4341, 28 मार्च को 5522, 29 और 30 मार्च को तीन-तीन हजार कॉल्स मिलीं।

लेकिन एक अप्रैल के बाद हर रोज आने वाली कॉल्स में काफी गिरावट आई है। अब प्रतिदिन 1300 से 1400 के लगभग कॉल आ रही हैं, जो सामान्य औसत से काफी कम है। दुष्कर्म के मामलों में भी 71 फीसदी की गिरावट देखी गई है। अपहरण के मामले 90 फीसदी से भी कम हो गए हैं।

मालीवाल के मुताबिक शुरुआती दौर में ज्यादा कॉल आने पर महिलाओं में भ्रम की स्थिति देखी गई थी और वे लॉकडाउन को लेकर काफी सशंकित थीं, जबकि बाद के अनुभव बता रहे हैं कि अब लोगों ने स्थितियों को समझ लिया है और वे इसमें सहयोग कर रहे हैं।

हालांकि, वे यह भी स्वीकार करती हैं कि यह इस वजह से भी हो सकता है कि महिलाएं घर में ही रह रहे पुरुषों के सामने शिकायत दर्ज कराने में स्वयं को असहज पा रही हों।

नौकरी की चिंता बढ़ा रही तनाव

मेरा हक फाउंडेशन की चेयरपर्सन फरहत नकवी कहती हैं कि उनके पास भी घरेलू हिंसा के कई मामले आये हैं, लेकिन उनकी कोशिश आपसी बातचीत से समस्या को सुलझाने की रही है और यह काफी कारगर साबित हो रही है।

उन्होंने कहा कि पुरुषों को अपने रोजगार की चिंता सता रही है और मध्यम वर्ग के पास आय का कोई साधन नहीं बचा है। शर्मिंदगी के कारण वे किसी से मदद लेने में भी संकोच कर रहे हैं। यही कारण है कि यह तनाव घरेलू हिंसा के रुप में सामने आ रहा है।

परिवार के अन्य सदस्य भी कर रहे हिंसा

महिला अधिकारों के लिए काम कर रही अंबर जैदी कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि केवल पति या पत्नी ही एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा कर रहे हैं। उनके सामने ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें परिवार के अन्य सदस्य जैसे जेठ, ससुर या बड़ा भाई अपने परिवार के छोटे सदस्यों और महिलाओं पर हिंसा कर रहे हैं। इससे बचने की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने भी जताई चिंता

संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने इसी माह कई बार ट्वीट कर महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा की तरफ लोगों का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि शांति का मतलब केवल युद्ध के न होने की स्थिति नहीं है, यह घरेलू वातावरण में महिलाओं और बच्चों के प्रति हिंसा न होने से भी है।

उन्होंने दुनिया की विभिन्न सरकारों से अपील कर महिलाओं और बच्चों को घरेलू हिंसा से बचाने की अपील की।

क्या कहते हैं मनोचिकित्सक

सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉक्टर राजीव मेहता कहते हैं कि सामान्य तौर पर मनुष्य का स्वभाव खुद को दूसरों के मुताबिक ढालने की बजाय दूसरों को अपने मुताबिक बदलने की कोशिश होती है।



जब घर में पति-पत्नी लगातार एक-दूसरे के सामने हैं, तो ऐसे में छोटी-छोटी कमियां बड़ी दिखने लगती हैं। ऐसे में घर का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। नौकरियों पर संकट ने तनाव बढ़ाने का काम किया है जो तरह-तरह की हिंसा को बढ़ावा दे रहा है।

डॉक्टर राजीव मेहता के मुताबिक इससे बचने का सबसे बेहतर रास्ता यही हो सकता है कि हम दूसरे की कमी को देखने की बजाय अपने कामकाज में खुद को व्यस्त रखें।

अगर आपको लगता है कि आपका साथी कोई काम बेहतर ढंग से नहीं कर पा रहा है, तो इसके लिए उसे दोष देने की बजाय उसे खुद करने की कोशिश करें।

ध्यान रखें कि शिकायत करने और ताने देने की बजाय प्रशंसा कर काम लेने की तकनीकी हमेशा ज्यादा कारगर होती है।    

 

 

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