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Dabholkar Murder Case: एक दशक पुराने दाभोलकर हत्याकांड में आया अदालत का फैसला, दो को उम्रकैद, तीन बरी

Fri, 10 May 2024 12:32 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पुणे
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पुणे Published by: काव्या मिश्रा Updated Fri, 10 May 2024 12:32 PM IST
सार

Narendra Dabholkar Murder Case: 20 अगस्त 2013 को पुणे में मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी थी। घटना के वक्त दाभोलकर सुबह की सैर के लिए घर से निकले थे। उनपर पांच गोलियां चलाई गईं थीं।

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Dabholkar Murder Case Judgement Today Pune Court Convicts Two Get Life in Prison, 3 Acquitted
नरेंद्र दाभोलकर। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। नरेंद्र दाभोलकर महाराष्ट्र में अंधविश्वास के खिलाफ आंदोलन चलाते थे, जिनकी 2013 में हत्या कर दी गई थी। पुणे की एक विशेष अदालत ने आज इस मामले में फैसला सुनाया। पांच आरोपी में से दो को दोषी करार दिया। वहीं, तीन को बरी कर दिया गया है। बता दें, हत्या के मामले को 2014 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया था। सीबीआई ने आरोपियों के खिलाफ 2016 में आरोप पत्र दायर किया था।

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डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के 11 साल बाद पुणे की एक विशेष यूएपीए अदालत ने दो आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जबकि तीन अन्य को बरी कर दिया। 

पांच लाख रुपये के जुर्माने की सजा
लोगों से खचाखच भरे अदालत कक्ष में आदेश को पढ़ते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष न्यायालय) पी.पी. जाधव ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर के खिलाफ हत्या तथा साजिश के आरोप साबित कर दिए हैं और उन्हें आजीवन कारावास तथा पांच लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।
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केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के मुताबिक अंदुरे और कालस्कर ने दाभोलकर पर गोली चलाई थी। अदालत ने सबूतों के अभाव में आरोपी कान-नाक-गला (ईएनटी) रोग सर्जन वीरेंद्र सिंह तावड़े, मुंबई के वकील संजीव पुनालेकर और उनके सहयोगी विक्रम भावे को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
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दो गवाहों से सवाल-जवाब किए
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 20 गवाहों जबकि बचाव पक्ष ने दो गवाहों से सवाल-जवाब किए। अभियोजन पक्ष ने अपनी अंतिम दलीलों में कहा था कि आरोपी अंधविश्वास के खिलाफ दाभोलकर के अभियान के विरोध में थे।

सनातन को बदनाम करने का षड़यत्र ध्वस्त हुआ
सनातन संस्था के राष्ट्रीय प्रवक्ता चेतन राजहंस ने कहा कि दाभोलकर हत्या प्रकरण में सनातन के साधकों का निर्दोषत्व सिद्ध हो गया है। इस मामले को लेकर सनातन को बदनाम करने का षड़यत्र चल रहा था, वो एक तरह से ध्वस्त हो चुका है। जिस दिन दाभोलकर की हत्या हुई थी, उसी दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने आरोप लगाए थे कि इसके पीछे हिदुत्वनिष्ठ है। उनके एक बयान के बाद हिंदू संस्थाओं और सनातन संस्थाओं की जांच होने लगी। हिदुत्वनिष्ठों को फंसाने की कोशिश की गई। आज अदालत के फैसले से सनातन संस्था का निर्दोषत्व सिद्ध हुआ है। 

नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कब हुई थी?
20 अगस्त 2013 को पुणे में मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी थी। घटना के वक्त दाभोलकर सुबह की सैर के लिए घर से निकले। ओमकारेश्वर (महर्षि विट्ठल रामजी शिंदे) पुल पर सुबह 7:15 बजे दाभोलकर पर हमला किया गया। दाभोलकर पर पांच गोलियां चलाई गईं। दो गोलियां मिसफायर हुईं, लेकिन दो गोलियां दाभोलकर के सिर में और एक छाती में लगीं। जब वे गिर पड़े, तो दोनों हमलावर पास में खड़ी एक मोटरसाइकिल से भाग निकले। दाभोलकर की मौके पर ही मौत हो गई। 

दो जाने-माने हिस्ट्रीशीटर दाभोलकर की हत्या में मुख्य संदिग्ध के रूप में नामित किए गए थे। आरोपियों को घटना के दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया। हिस्ट्रीशीटर के पास से हथियार और कारतूस बरामद हुए थे जो दाभोलकर के शरीर से बरामद गोलियों से मेल खाते थे। हालांकि, दोनों संदिग्धों पर कभी औपचारिक रूप से हत्या का आरोप नहीं लगाया गया और इसके तुरंत बाद उन्हें जमानत दे दी गई। इस मामले की जांच बाद में सीबीआई को सौंप दी गई।

मामले में किसकी-किसकी गिरफ्तारी हुई?
20 अगस्त 2013 को सुबह करीब 10 बजे हत्या के ठीक तीन घंटे बाद पहली गिरफ्तारी हुई। दो चर्चित हथियार डीलर और हिस्ट्रीशीटर मनीष नागोरी और विकास खंडेलवाल को ठाणे एंटी एक्सटॉर्शन सेल और मुंब्रा पुलिस ने कोपरखैराने, नवी मुंबई से एक असंबंधित कथित जबरन वसूली मामले में गिरफ्तार किया।
  
दोनों व्यक्तियों से बरामद हथियारों में एक 7.65 मिमी की देसी पिस्तौल, चार कारतूस और दो जिंदा गोलियां शामिल थीं। जब्त किए गए हथियारों को जांच के लिए फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) कलिना में जमा किया गया था। कुछ महीने बाद एफएसएल कलिना ने रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया कि पुलिस ने अपराध स्थल से दो जिंदा कारतूस सहित चार कारतूस बरामद किए थे, जो नागोरी और खंडेलवाल से बरामद एक ही 7.65 मिमी पिस्तौल से चलाए गए थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि दाभोलकर के शरीर में मिली गोली के निशान बरामद कारतूसों से मिलते-जुलते थे और हो सकता है कि नागोरी और खंडेलवाल से जब्त हथियार से चलाई गई हो। 

इसके बाद 20 जनवरी 2014 को पुलिस ने दाभोलकर की हत्या के लिए मनीष नागोरी और विकास खंडेलवाल को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया। खंडेलवाल ने पुलिस को दिए अपने बयान में स्वीकार किया कि उसके पास एक काले रंग की हीरो होंडा मोटरसाइकिल है। दोनों ने दावा किया कि हत्या के समय वे घर पर सो रहे थे और इस बात से इनकार किया कि उनके पास से बरामद हथियारों का इस्तेमाल दाभोलकर की हत्या में किया गया था।

द रेशनलिस्ट मर्डर्स किताब के अनुसार, पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य के बावजूद मामले में कोई आरोप पत्र दायर नहीं किया गया। गिरफ्तार किए गए दो व्यक्तियों नागोरी और खंडेलवाल को न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) एबी शेख की अदालत में पेश किया गया, जहां उन्होंने सनसनीखेज दावा किया कि उन्हें दाभोलकर की हत्या की बात स्वीकार करने के लिए मुंबई एटीएस प्रमुख राकेश मारिया द्वारा 25 लाख रुपये की पेशकश की गई थी और हिरासत में उन्हें प्रताड़ित किया गया था और नार्कोएनेलिसिस और लाई डिटेक्टर टेस्ट से गुजरना पड़ा था। हालांकि, न्यायाधीश ने उनके बयान को रिकॉर्ड पर नहीं लिया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया। बाद में नागोरी ने आरोप लगाने के लिए माफी मांगी और कहा कि यह भावनात्मक था।

मार्च 2014 में पहचान के लिए एक परेड आयोजित की गई थी। गवाह स्पष्ट रूप से लाइन-अप में नागोरी या खंडेलवाल को पहचान नहीं पाए। विनय केलकर, जिस गवाह की जानकारी पर हत्यारों के स्केच तैयार किए गए थे, परेड में मौजूद नहीं थे।

21 अप्रैल 2014 को पुणे पुलिस ने स्थानीय अदालत में एक हलफनामा दायर किया। इस हलफनामे में पुलिस ने कहा कि उनके पास नागोरी और खंडेलवाल के खिलाफ आरोप पत्र दायर करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं और दोनों को जमानत दे दी गई। अदालत ने जमानत देते हुए जांच में खामियों के लिए सह-सहायक आयुक्त राजेंद्र भामरे को कारण बताओ नोटिस जारी किया। नागोरी और खंडेलवाल अन्य आरोपों में जेल में बंद रहे।

घटना के 11 साल बाद फैसला आया
छह सितंबर 2019 को सीबीआई ने दाभोलकर हत्या मामले में सचिन अंदुरे और कलास्कर के खिलाफ पूरक आरोप-पत्र दाखिल किया था। 2019 के अंत में सीबीआई ने दावा किया कि विक्रम भावे मास्टरमाइंड थे।


सीबीआई ने इस मामले में वीरेंद्र सिंह तावड़े, सचिन आंदुरे और शरद कालस्कर को गिरफ्तार किया था। तावड़े कथित तौर पर सनातन संस्था से जुड़ा था। जबकि आंदुरे और कालस्कर कथित तौर पर शूटर थे। सीबीआई ने इन तीनों के अलावा वकील संजीव पुनालेकर और उनके सहायक विक्रम भावे के खिलाफ 2019 में आरोप पत्र दायर किया था। सीबीआई ने आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत भी आरोप लगाए थे। तावड़े, आंदुरे और कालस्कर जेल में थे। जबकि पुनालेकर और भावे जमानत पर बाहर था।

 पिछले महीने सुनवाई के दौरान अतिरिक्त विशेष सत्र न्यायाधीश ए ए जाधव ने मामले में फैसला सुनाने के लिए 10 मई की तारीख तय की थी। 

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