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लोकसभा चुनाव 2019: अपने इकलौते बेटे का विवाह भी विधवा से कराया था

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता Updated Thu, 16 May 2019 02:59 AM IST
ईश्वरचंद्र विद्यासागर (फाइल फोटो)
ईश्वरचंद्र विद्यासागर (फाइल फोटो)
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कभी छत्रपति शिवाजी, कभी भीमराव आंबेडकर तो कभी सरदार पटेल... सियासी फायदे के लिए महापुरुषों का इस्तेमाल आम बात है। इसी कड़ी में नया नाम है ईश्वरचंद्र विद्यासागर का। प्रखर चिंतक, विचारक, सुधारक से लेकर लेखक तक... विद्यासागर ऐसी हस्ती हैं, जिनका बंगाल ही नहीं, पूरा देश नमन करता है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस व भाजपा की सियासी लड़ाई में उनकी प्रतिमा को भी नहीं छोड़ा गया। ईश्वरचंद्र की कोशिशों के कारण ही ब्रिटिश सरकार को 26 जुलाई 1856 को हिंदू विधवा पुनर्विवाह एक्ट-1856 पारित करना पड़ा। 
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यही नहीं, उन्होंने अपने इकलौते बेटे नारायण चंद्र बंद्योपाध्याय का विवाह भी एक विधवा से ही करवाया। सुधारक के रूप में उन्हें राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता है। विद्यासागर ने महिला शिक्षा को बढ़ावा देने का बीड़ा उठाया तो हर घर के दरवाजे पर खुद पहुंचे। मां-बाप के हाथ जोड़कर उनकी बेटियों को स्कूल तक ले आए। उन्होंने 35 स्कूल खुलवाए। 

27 हजार हस्ताक्षर लेकर अंग्रेजों को किया मजबूर
26 सितंबर, 1820 को कोलकाता में जन्मे ईश्वरचंद्र के समय बहुविवाह सामान्य बात थी। उनकी मौत के बाद विधवाओं की दुर्दशा देख वे बेहद विचलित थे। विधवाओं को दोबारा शादी की मनाही थी। वे इसका विरोध करते, तो समाज में उनका विरोध होता। तब वे 25 हजार लोगों के हस्ताक्षर लेकर ब्रिटिश सरकार के पास गए और विधवा पुनर्विवाह की मांग की। सरकार नहीं मानी तो 27 हजार हस्ताक्षरों के साथ फिर पहुंच गए। इसके बाद विधवा पुनर्विवाह का कानून पास करना ही पड़ा।

गरीबी और शोषण के खिलाफ शिक्षा ही हथियार
मुश्किलों में पढ़े विद्यासागर जानते थे कि गरीबी और शोषण के खिलाफ शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने एक के बाद एक स्कूल खोलकर हलचल मचा दी। बंगाल में 20 मॉडल स्कूल खोले, जिनमें 1300 छात्रों को प्रवेश मिला। लड़कियों के लिए अलग से 35 स्कूल खोलने का श्रेय भी उन्हें जाता है। तब लड़कियों की शिक्षा पर किसी का ध्यान नहीं था। बचपन में शादी कर देना और विधवा होने पर फिर शादी न करना आम था।

अंग्रेजों पर गुस्सा इतना, नाटक में मारी चप्पल
जिस समय बंगाल में नील की खेती होती थी, अंग्रेज अधिकारी स्थानीय किसानों पर जोर जबरदस्ती करते थे। कुछ जागरूकता फैली तो रंगमंच के कलाकारों ने एक नाटक किया। इसे देखने विद्यासागर भी पहुंचे। अंग्रेज अफसर बनने वाले युवक का शानदार अभिनय देख उन्होंने उसे चप्पल फेंककर मारी। अभिनेता युवक उनके चरणों में गिर पड़ा। कहा, आज मेरा अभिनय करना सार्थक हो गया।

इंग्लैंड में सफाई के लिए खुद उठाई झाड़ू
ईश्वरचंद्र इंग्लैंड में एक सभा के लिए पहुंचे तो लोग बाहर खड़े थे। पूछने पर पता चला कि सफाईकर्मी भवन साफ करेगा, तब अंदर जाएंगे। इस पर उन्होंने झाड़ू उठा ली और सफाई में जुट गए। उन्हें ऐसा करते देख बाकी लोग भी साथ हो लिए।­

विद्वता के दम पर बने विद्यासागर
विद्यासागर का पूरा नाम ईश्वरचंद्र बंद्योपाध्याय था। पैसे की तंगी से बचने के लिए उन्होंने पढ़ाई के साथ पढ़ाने का काम भी किया। 12 सालों तक कॉलेज में किताबों का दामन नहीं छोड़ा। संस्कृत ही नहीं कई-कई विषयों में महारत हासिल कर ली। 1841 में संस्कृत व्याकरण, साहित्य, अलंकार शास्त्र, वेदांत, स्मृति और खगोलशास्त्र की परीक्षाएं पास कर लीं। बाद में उन्हें विद्यासागर कहा जाने लगा।

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