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लोकसभा चुनाव 2019: वजूद की लड़ाई में उलझे वाम दल, गठबंधन में भी नहीं मिली जगह

Sat, 06 Apr 2019 03:36 AM IST
गौरव द्विवेदी हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव द्विवेदी Updated Sat, 06 Apr 2019 03:36 AM IST
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Loksabha Election 2019: Left party in battle of existence, donot accept in coalition
सांकेतिक तस्वीर

आजादी के बाद से ही अपनी विचारधारा से देश की राजनीति को झकझोरने वाले वाम दल इस आम चुनाव में वजूद बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वाम दलों को तीन राज्यों केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा का किला ढह चुका है तो विपक्षी गठबंधन में तमिलनाडु को छोड़ कर उसे किसी राज्य में जगह नहीं मिली है। अस्तित्व के संकट के बावजूद वाम दल की अगुवाई करने वाली माकपा पार्टी केरल और पश्चिम बंगाल धड़े में बुरी तरह बंटी हुई है।  

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नई सदी के पहले आमचुनाव में वाम दल अपने शबाब पर थे। तब इसमें शामिल चार मुख्य दलों के सीटों की संख्या 59 पहुंच चुकी थी। वर्ष 2004 में यूपीए की पहली सरकार वाम दलों का वर्चस्व दुनिया ने देखा। वाम दलों के दबाव में ही देश में सूचना का अधिकार, खाद्य सुरक्षा कानून और दुनिया को हैरत में डालने वाला मनरेगा लागू हुआ। मगर अमेरिका से परमाणु समझौते के विरोध में यूपीए से किनारा करने के साथ ही वाम दल राष्ट्रीय राजनीति के हाशिये पर चले गए। वर्ष 2009 के चुनाव में वाम दलों के सीटों की संख्या 59 से घट कर 20 पहुंची तो बीते चुनाव में यह संख्या घट कर 10 पहुंच गई। इसके दो सहयोगी आरएसपी और फारवर्ड ब्लॉक खाता  नहीं खोल पाई तो इसी दौरान इसके तीन राज्यों का मजबूत किला भी ढह गया।
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इस बार पार्टी के लिए मुश्किल यह है कि केरल में कांग्रेस ने जहां अपनी मजबूत जमीन नहीं खोई है। वहीं पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में पार्टी हाशिये पर है। एकबारगी पश्चिम बंगाल में वाम दलों और कांग्रेस के बीच गठबंधन की संभावना बनी थी, मगर केरल धड़े के विरोध से बातचीत पटरी से उतर गई। बिहार और उत्तर प्रदेश के महागठबंधन में भी वाम दलों को जगह नहीं मिली है। पार्टी के लिए मुश्किल यह है कि इस बार केरल में कांग्रेस की जमीन कमजोर नहीं हुई है, जबकि पश्चिम बंगाल में पार्टी फिलहाल परिदृश्य से ही गायब दिखती है। बीते चुनाव में भी माकपा को राज्य में महज दो सीटों  वह भी बेहद कम अंतर से जीती थी। त्रिपुरा में भाजपा ने इन्हें सत्ता से बेदखल कर रखा है।
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मंडल कमीशन के बाद हिंदी पट्टी में खोया आधार

2004 के चुनाव में अचानक बेहद ताकतवर हो कर उभरे वाम दलों की हिंदी पट़टी के राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली उपस्थिति रही। हालांकि बीती सदी के नब्बे के दशक में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद इन राज्यों के चरित्र में बड़ा बदलाव हुआ। कांग्रेस की जगह इन राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली। इसके बाद धीरे-धीरे वाम दलों का हिंदी पट्टी से भी सफाया हो गया।

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