Lok Sabha Elections: केजरीवाल से गठबंधन को कितना हुआ नुकसान, कांग्रेस कर रही आकलन, वोटरों के वापस आने का भरोसा
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विस्तार
लोकसभा चुनाव परिणामों से उत्साहित कांग्रेस अब अपने गठबंधनों से हुए नफा-नुकसान की समीक्षा कर रही है। पार्टी इस बात पर विचार कर रही है कि किसी दल के साथ गठबंधन के बाद उसे किन राज्यों में लाभ हुआ और किन राज्यों में उसे इसका लाभ नहीं मिला। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि दिल्ली में भी पार्टी को अरविंद केजरीवाल से समझौता नहीं करना चाहिए था। यदि समझौता न होता, तो पंजाब की तरह दिल्ली में कांग्रेस को ज्यादा लाभ मिल सकता था। सफलता न मिलने की स्थिति में भी पूरी राजधानी में उसका कैडर तैयार होता, जो भविष्य की राजनीति के लिए उसे मजबूत बनाता।
लोकसभा चुनाव परिणामों की समीक्षा में यह तथ्य सामने आया है कि उत्तर प्रदेश सहित देश के ज्यादातर इलाकों में कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक (ओबीसी, दलित और मुसलमान) उसके पास वापस आया है। इस वोट बैंक के बूते ही पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनावों में 52 सीटों की तुलना में इस बार 99 सीटों तक का सफर तय किया है। पार्टी का अनुमान है कि अपने एजेंडे पर पूरी तरह टिके रहने के बाद उसका परंपरागत वोट बैंक और ज्यादा मजबूती के साथ उसके पास वापस आएगा और राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में उसकी स्थिति मजबूत हो सकेगी।
गठबंधन को लेकर दिखी थी बड़ी असहमति
पार्टी को भरोसा है कि यदि वह अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी, तब देश की तरह दिल्ली में भी उसका परंपरागत वोट बैंक उसके पास आएगा। 2012-13 में अरविंद केजरीवाल के उभार के बाद कांग्रेस का वोट बैंक खिसक कर आम आदमी पार्टी के पास चला गया था, जिसका कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ और वह दिल्ली में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई। यही कारण है कि जब पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का एलान किया, पार्टी के कुछ नेताओं ने इससे घोर असहमति जताई और कुछ ने पार्टी को अलविदा तक कह दिया।
नौ-दस जून को होगी बैठक
चार जून को चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पांच जून को दिल्ली इकाई के नेताओं के साथ बैठक की थी। इसमें चुनाव परिणामों की समीक्षा की गई थी। नौ-दस जून को कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई गई है। इस बैठक में दिल्ली में हुए गठबंधन की पूरी समीक्षा की जाएगी। इसके अनुसार दिल्ली विधानसभा चुनावों में उतरने की रणनीति तैयार की जाएगी।
पिछले तीन लोकसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) में कांग्रेस दिल्ली में अपना खाता भी नहीं खोल पाई। 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में भी उसे कोई सफलता नहीं मिली थी। लेकिन अब कांग्रेस को पूरा विश्वास है कि अब वह अपनी जीत का सूखा खत्म कर दिल्ली की राजनीति में वापसी कर सकेगी।
चुनाव परिणामों और आगे की रणनीति पर विचार
दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने अमर उजाला से कहा कि वे लोकसभा चुनाव परिणामों की समीक्षा कर रहे हैं। अगले दो दिनों के बीच केंद्रीय नेतृत्व के साथ इस मुद्दे पर एक बैठक है और उसमें चुनाव परिणामों और आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा। बैठक में गठबंधन के असर की भी समीक्षा की जाएगी। पार्टी के जो नेता गठबंधन से असहमति जताते रहे थे, उनसे भी उनकी राय पूछी जाएगी।
देवेंद्र यादव ने कहा कि विधानसभा चुनाव में वे समय रहते वे हर क्षेत्र में योग्य उम्मीदवारों की पहचान करेंगे। उन्हें विधानसभा चुनाव के लिए तैयार कर चुनावी मैदान में उतारेंगे। इसके लिए पार्टी के सभी नेताओं-कार्यकर्ताओं की राय ली जाएगी। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव में जाने से पहले संगठन में कुछ बड़े बदलाव किए जाएंगे, जिससे पार्टी को निचले स्तर पर मजबूत बनाया जा सके।