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2019 चुनाव के लिए वरुण और उनकी मां मेनका गांधी ने अपनी सीटें क्यों बदलीं?

Fri, 29 Mar 2019 08:53 PM IST
अमित मंडल बीबीसी, नई दिल्ली
बीबीसी, नई दिल्ली Published by: अमित मंडल Updated Fri, 29 Mar 2019 08:53 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019: Why did Varun and Maneka Gandhi exchange Pilibhit and Sultanpur seats
मेनका गांधी-वरुण गांधी - फोटो : PTI

2019 चुनाव के लिए वरुण गांधी और उनकी मां मेनका गांधी ने अपनी सीटें क्यों बदलीं, इसे लेकर चर्चाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। माना यह जा रहा है कि वरुण को सुल्तानपुर से अपना राजनीतिक गढ़ पीलीभीत शिफ्ट करने के पीछे मां की अपने बेटे को सुरक्षित सीट देने की भावना हो सकती है। दोनों ने ही अपने चुनाव क्षेत्रों की अच्छी देखभाल की है और दोनों ही अपने क्षेत्रों से काफी जुड़े हुए हैं। 

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मेनका ने पीलीभीत से छह चुनाव और पड़ोस की आंवला सीट से एक चुनाव जीता। फिर जब उन्होंने सुल्तानपुर से लड़ने का तय किया तो यह भी उन्होंने बेटे वरुण के फायदे के लिए ही किया। 2009 के चुनावों में यह साफ हो गया था कि जोखिम मां ने उठाया। जाहिर है, वह नहीं चाहती होंगी उनका बेटा यह जोखिम उठाए।
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सांसद के तौर पर सात बार चुनी गईं मेनका के लिए यह पहला मौका था जब वह 8000 से भी कम वोटों से जीतीं। पीलीभीत से उन्होंने जितने भी चुनाव लड़े, जीत का मार्जन सवा लाख से ढाई वोटों के बीच रहा था। 
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बेटे वरुण ने पीलीभीत से पहला चुनाव लड़ते हुए 4 लाख 19 हजार 539 वोटों से जीत हासिल की। उनके करीबी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी वी एम सिंह थे जो उनकी मां के चेचेरे भाई हैं। उन्हें सिर्फ 1 लाख 38 हजार 38 वोट मिले।

संजय गांधी की राजनीतिक नर्सरी थी सुल्तानपुर

2014 तक वरुण ने खुद को बीजेपी के फायरब्रैंड लीडर के तौर पर स्थापित करने में कामयाबी हासिल कर ली थी जो कि कड़ी चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार थे। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने सुल्तापुर से लड़ने की इच्छा भी जताई थी। सुल्तानपुर एक समय उनके पिता संजय गांधी की राजनीतिक नर्सरी रही थी। उन्होंने अमेठी से पहला चुनाव लड़ा था जो उस समय सुल्तानपुर जिले का हिस्सा था।

मजेदार बात यह है कि वरुण के चचेरे भाई बहन राहुल और प्रियंका ने कभी उन्हें परेशान नहीं किया। भले ही वे बगल की अमेठी और रायबरेली सीटों पर प्रचार करते रहे। वरुण ने भी खुद को दूर ही रखा और कभी अपने भाई-बहनों का रास्ता नहीं काटा।

वह सुल्तानपुर से जीते और अपने करीबी प्रतिद्वंद्वी बीएसपी के पवन पांडे को 1 लाख 80 हजार वोटों के अंतर से हराया। हालांकि इस बार कांग्रेस के मजबूत प्रत्याशी संजय सिंह हैं जो न सिर्फ 2009 में यहां से जीते थे बल्कि अमेठी के पूर्व राज परिवार से भी आते हैं। 2014 में तो फिर भी मोदी लहर थी। ऐसे में इस बार इन सब बातों ने सुल्तानपुर से फिर से लड़ने का वरुण का विचार बदला होगा।

मेनका की इच्छा राजनीतिक विरासत संभालें वरुण

ऐसे में राजनीतिक समझ यही बनती है कि मां ने बेटे का ख्याल रखते हुए उसके हित में इस बार सीट बदल ली। मेनका चाहती हैं कि बेटा पीलीभीत में उनकी विरासत संभाले, जिसकी वह 1989 से लेकर बच्चे की तरह देखभाल करती आई हैं, जबसे उन्होंने पहला चुनाव जीता था।

पहले एक बार यहां से सांसद रह चुके वरुण भी इस इलाके को अच्छी तरह से समझते हैं। अहम बात यह है कि मां को पूरा विश्वास है कि पीलीभीत से जीतना बेटे के लिए आसान रहेगा। सुल्तानपुर में संभावित चुनौतियों से जूझने के लिए खुद वह सुल्तानपुर शिफ्ट हो गईं।

मेनका गांधी के समर्थकों के मुताबिक उनके अंदर कांग्रेस के प्रत्याशी संजय सिंह से लड़ने की हिम्मत है। संजय सिंह शुरुआती दिनों में मेनका के पति संजय गांधी के करीबी थे।

बहुत से लोगों को हैरानी इस बात की है कि वरुण अपनी सीट बदलने के लिए तैयार कैसे हो गए? उनके पार्टी के नेतृत्व से रिश्ते कैसे हैं, यह बात छिपी नहीं है। और इसकी वजह भी यह मानी जाती है कि उन्हें मन में जो आए, वह कहने की आदत है और वह किसी का आदेश नहीं सुनते।

उनके करीबी सहयोगी, जिन्होंने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि वरुण गांधी जिसके हकदार हैं, वह उन्हें कभी बीजेपी से नहीं मिला। इसलिए क्योंकि वह गांधी हैं। सोचिए, योग्य वरुण गांधी के नाम पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए विचार नहीं किया गया और यह पद भगवाधारी योगी आदित्यनाथ को चला गया।
 

भड़काऊ भाषण से लेकर काम करने वाले नेता की छवि

इसकी संभावनाएं कम ही हैं कि पार्टी के नेतृत्व ने उन्हें पीलीभीत जाने के लिए कहा होगा। पीलीभीत में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने को लेकर उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था। हालांकि बाद में कोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया था। मगर इसके बाद वरुण ने सुल्तानपुर में अच्छे काम करके वाहवाही भी बटोरी है।

उन्होंने सुल्तानपुर में गरीबों के लिए अपने निजी पैसों से 300 घर बनाए हैं और 700 घर क्राउड फंडिंग के माध्यम से बनाए हैं। वह खुद मानते हैं कि यह अनोखा काम था।

कुछ महीने पहले एक बैठक में उन्होंने कहा था कि अपने चुनाव क्षेत्र में गरीब और जरूरतमंदों के लिए इतना तो मैं कर ही सकता हूं। सड़कों के नए जाल से इतर मुझे जिस बात पर गर्व होता है, वह है नया जिला अस्पताल जिसमें आधुनिकतम सुविधाएं हैं। यह उत्तर प्रदेश में इस तरह का पहला अस्पताल है।

सरकार के इतर वह निजी संगठनों को भी लाए, जैसे कि टाटा ट्रस्ट ने अस्पताल के लिए फंड दिया। यह उदाहरण है कि सांसद किस तरह से योगदान कर सकते हैं। जाहिर है, वरुण को उनकी कर्मभूमि से उनकी मातृभूमि (मां के क्षेत्र) जाने के लिए अन्य चीजों से ज्यादा उनकी मां की इच्छा ने ही प्रेरित किया होगा।

 
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