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कभी वामपंथियों का गढ़ था बेगूसराय, कन्हैया कुमार के उतरने से दिलचस्प होगी जंग

Wed, 20 Feb 2019 02:19 PM IST
Prabudhh Jain चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Prabudhh Jain Updated Wed, 20 Feb 2019 02:19 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019: once the Left stronghold Begusarai politics and equations
बेगूसराय में फिर 'लाल' किला खड़ा कर पाएंगे कन्हैया कुमार? - फोटो : Amar Ujala

बिहार की बेगूसराय लोकसभा सीट इन दिनों चर्चा में है। वजह है जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रकरण के बाद रातों-रात लोगों की नजरों में चढ़ने वाले कन्हैया कुमार का यहां सक्रिय होना। अब तो ये खबर भी लगभग पक्की हो गई है कि वो यहीं से भाकपा के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। बेगूसराय कभी वामपंथियों का गढ़ हुआ करता था और यहां भूमिहारों की संख्या काफी ज्यादा है जो किंगमेकर साबित होती रही है।

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जातीय समीकरण

बेगूसराय लोकसभा सीट पर भूमिहारों का शुरू से ही दबदबा रहा है। कन्हैया कुमार भी इसी जाति से हैं। यहां भूमिहार के अलावा कोइरी, यादव, मुसलमान और अनुसूचित जाति के भी वोट हैं। ओबीसी में कोइरी की संख्या सबसे ज्यादा है। वहीं अनुसूचित जातियों की संख्या भी ठीक-ठाक है। भूमिहारों के दम पर यहां से वाम दलों के टिकट पर सांसद कम विधायक ज्यादा चुने गए हैं। मटिहानी, बेगूसराय और तेघरा विधानसभा सीट में भूमिहारों का आज भी वर्चस्व कायम है।

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बेगूसराय में वामपंथ

पहली बार 1967 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के टिकट पर वाई शर्मा बेगूसराय से सांसद चुने गए थे। इसके बाद यहां से आज तक कोई भी उम्मीदवार सीपीआई के टिकट से चुनाव नहीं जीत पाया है। हालांकि, उसके बाद कई भूमिहार सांसद यहां से कांग्रेस, भाजपा, जेडीयू के टिकट से जीतकर संसद में पहुंच चुके हैं। पहले बेगूसराय में वामदलों का प्रभाव इतना हावी था कि 1955 तक बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के सातों विधानसभा सीटों में से पांच पर वामपंथी पार्टी का कब्जा था। 

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ढह गया वामपंथ का किला

भूमिहारों की वजह से ही बेगूसराय वामपंथ का गढ़ बना था और उन्हीं के कारण वामपंथ का गढ़ भी ढह गया। दरअसल, 60 के दशक में शोषित भूमिहार किसानों ने सामंत भूमिहारों के खिलाफ हथियार उठा लिए थे। इसके बाद बेगूसराय खून से लथपथ हो गया था। वहीं 70 के दशक में कामदेव सिंह का दबदबा था और उसके आदमियों ने वामपंथी नेता सीताराम मिश्र की हत्या कर दी थी।

 

लालूराज में बेगूसराय

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिहार में सवर्णों के खिलाफ मुहिम चलाई थी। बिहार के कई हिस्सों में नरसंहार हुए थे जिसमें कई लोगों की जानें भी गई थीं और इस नरसंहार में रणवीर सेना भी शामिल थी। इससे तंग आकर कई भूमिहारों का वामपंथ से मोहभंग हो गया। 2000 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने सीपीआई और सीपीएम से गठबंधन कर लिया जिसके बाद से ही वामपंथ की वहां कमर टूट गई और वामपंथ का प्रभाव खत्म हो गया। 

2014 के हालात 

बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र में कुल 17,78,759 मतदाता हैं जिसमें महिला मतदाता 8,28,874 जबकि पुरुष मतदाताओं की संख्या 9,49,825 है। 2014 लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से भाजपा के भोला सिंह ने जीत दर्ज की थी, राजद के मो. तनवीर हसन दूसरे जबकि सीपीआई से राजेन्द्र प्रसाद सिंह वोटों के हिसाब से तीसरे नंबर पर रहे। अक्टूबर 2018 में भोला सिंह के निधन के बाद से यह सीट खाली है। 

वर्तमान स्थिति

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेगूसराय की चुनावी यात्रा की और यहां कई योजनाओं की आधारशिला रखी। भोला सिंह के निधन के बाद भाजपा में नए उम्मीदवार के नाम पर मंथन चल रहा है। उधर, भाजपा के खिलाफ कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी लगभग तय है। यानी यहां एक दिलचस्प जंग देखने को मिल सकती है। 
 

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