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पीलीभीत छोड़कर करनाल से चुनाव क्यों लड़ना चाहती हैं इंदिरा गांधी की छोटी बहू 

Tue, 12 Mar 2019 09:59 PM IST
आसिम खान जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  Published by: आसिम खान Updated Tue, 12 Mar 2019 09:59 PM IST
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lok sabha elections 2019: Maneka Gandhi wants to contest election from Karnal in Haryana

इंदिरा गांधी की छोटी बहू यानी मेनका गांधी जो कि एनडीए-भाजपा सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं, वे इस बार यूपी की पीलीभीत लोकसभा सीट को छोड़कर हरियाणा के करनाल लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का संकेत दे रही हैं। हालांकि अभी यह खबर सूत्रों के हवाले से ही चल रही है। अब सवाल यह उठता है कि मेनका ने पूरे देश में केवल करनाल सीट का ही नाम क्यों लिया। करनाल, एक सॉफ़्ट सीट मानी जाती है। यहां पर किसी एक जाति का बाहुल्य नहीं है। वोटर कभी किसी के प्रति सख्त नहीं रहे। बाहरी उम्मीदवार को कभी पराया नहीं समझा गया। पूर्व मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा और भजनलाल के अलावा अरविंद शर्मा और अश्वनी चौपड़ा आदि ऐसे चेहरे रहे हैं जो दूसरी जगह से करनाल में आकर सांसद बन गए। खास बात है कि इस सीट पर अभी तक राष्ट्रीय दल ही जीत दर्ज कराते रहे हैं। 

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बता दें कि मेनका गांधी अभी तक उत्तर प्रदेश की पीलीभीत सीट से चुनाव लड़ती रही हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा इस बार मेनका गांधी को करनाल या कुरुक्षेत्र से टिकट दे सकती है। करनाल से भाजपा के मौजूदा सांसद अश्वनी कुमार हैं। चर्चा है कि वे अपने स्वास्थ्य कारणों से इस बार चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं। साथ ही मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के साथ उनके मतभेद भी किसी से छिपे नहीं हैं। करनाल सीट पर जीत दर्ज कराने वाले अधिकांश उम्मीदवार ब्राह्मण रहे हैं। जातिगत समीकरणों को देखें तो यहां किसी एक जाति की अधिकता नहीं है। जाट दो लाख, ब्राह्मण पौने दो लाख, पंजाबी पौने दो लाख, रोड एक लाख से ज्यादा, जाटव करीब डेढ़ लाख और राजपूत भी एक लाख के आसपास हैं। ब्राह्मण और पंजाबी वोटर, किसी उम्मीदवार की जीत में अहम फैक्टर माने जाते रहे हैं। 
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मेनका गांधी इसलिए करनाल सीट का चयन करने की सोच रही हैं

करनाल सीट पर 1952 से लेकर अब तक कांग्रेस पार्टी ने 11 बार विजय हासिल की है। तीन बार भाजपा, दो बार जनता पार्टी और एक बार जनसंघ के प्रत्याशी इस सीट पर जीत दर्ज करा चुके हैं।  पहली और दूसरी लोकसभा में कांग्रेस पार्टी और तीसरी लोकसभा में जनसंघ के उम्मीदवार स्वामी रामेश्वरानंद विजयी रहे। इस सीट की सबसे खास बात यह है कि बाहरी उम्मीदवार को यहां कभी निराशा हाथ नहीं लगी। बशर्ते वह किसी राष्ट्रीय पार्टी की टिकट पर चुनाव मैदान में उतरा हो। हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा को ही देखें। वे मूलत: रोहतक जिले के रहने वाले थे, लेकिन 1977-80 में जनता पार्टी की टिकट पर करनाल से सांसद बन गए। उनके बाद चिरंजीलाल शर्मा जो कि यहां से लगातार चार बार 1980 से लेकर 1996 तक सांसद रहे, वे भी रोहतक जिले के रहने वाले थे। उन्होंने करनाल में किस्मत आजमाई तो यहां के वोटरों ने उन्हें पूरा मान सम्मान दिया। 
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पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल जो हिसार से थे, लेकिन 1998-99 में वे भी करनाल सीट से चुनाव लड़ने पहुंचे और जीत गए। इनके बाद अरविंद शर्मा, जो कि सोनीपत से लोकसभा सांसद थे, वे 2004 में करनाल से सांसद बन गए। 2009 के चुनाव में भी शर्मा ने जीत हासिल की। 2014 में भाजपा ने अश्वनी कुमार चौपड़ा को यहां से उम्मीदवार बना दिया और मोदी लहर में वे भी जीत गए।  राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस बार मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी करनाल सीट से ही विधायक हैं, इसलिए भाजपा की इस लोकसभा क्षेत्र में खासी पैठ बन गई है। अगर मेनका गांधी यहां से चुनाव लड़ती हैं तो उन्हें ज्यादा मुश्किल नहीं होगी। हालांकि यह तभी संभव हो पाएगा, जब भाजपा के सभी नेता मेनका गांधी के नाम पर सहमत हों। 

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