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Hindi News ›   India News ›   Lok sabha elections 2019: BJP sankalp patra and challenge from Garibi par vaar 72 hazar slogan

कानों देखी: चिदंबरम की 'बाजीगरी' से लेकर दिल्ली की 'सीटों का चक्कर' की कहानी

Mon, 08 Apr 2019 07:29 PM IST
अमित मंडल शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमित मंडल Updated Mon, 08 Apr 2019 07:29 PM IST
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Lok sabha elections 2019: BJP sankalp patra and challenge from Garibi par vaar 72 hazar slogan
भाजपा का घोषणापत्र जारी - फोटो : ANI

पी चिदंबरम की एक बाजीगरी ने कांग्रेस के भीतर जान फूंक दी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जहां इससे फूले नहीं समा रहे हैं, वहीं भाजपा नेताओं पर भी 'गरीबी पर वार, 72 हजार' का नारा असर दिखा रहा है। पार्टी मुख्यालय 6 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग में संकल्प पत्र जारी होना था। देर होने हो जाने और पीएम के सुरक्षा बंदोबस्त के कारण कुछ नेताओं को निराश होकर बालभवन की तरफ जाना पड़ा। 

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प्रधानमंत्री का भाषण सब लाइव मोबाइल पर देख रहे थे। संकल्प पत्र जारी हो गया, प्रधानमंत्री का भाषण भी पूरा हो गया और इसके बाद आधा दर्जन नेताओं के चेहरे पर गरीबी पर वार के नारे का असर साफ दिखा। ग्वालियर, चंबल, भिंड के ये नेता कुछ दिन से दिल्ली में डटे हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस पार्टी का यह नारा बड़ा खेल कर सकता है। 
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भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के एक सदस्य का भी मानना है कि भले ही यह कांग्रेस का झुनझुना हो, लेकिन असर डालेगा। संघ के विचारक और 90 के दशक में भाजपा की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सूत्र का भी मानना है कि पूरे भारत में इस नारे का कुछ असर हो सकता है। सूत्र का कहना है कि भाजपा को भी इसकी काट खोजनी चाहिए थी। 
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प्रियंका गांधी वाड्रा की रैली की मांग  

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की हर तरफ मांग है। तमिलनाडु से लेकर जम्मू-कश्मीर तक कांग्रेस का हर प्रत्याशी अपने चुनाव प्रचार में प्रियंका को चाहता है। कांग्रेस के मेरठ से प्रत्याशी हरेंद्र अग्रवाल की टीम के सदस्यों का कहना है कि प्रियंका मतदान से पहले दो घंटे के लिए आ गईं तो भाजपा के प्रत्याशी राजेन्द्र अग्रवाल को हारा हुआ मान लीजिए। जबकि मेरठ भाजपा की चुनाव जीतने के क्रम में सुरक्षित सीट है। 

प्रियंका की यह मांग जहां उत्तर प्रदेश के हर क्षेत्र में है, वहीं राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक समेत सभी राज्यों से लगातार आ रही है। कांग्रेस के नेता जहां प्रियंका के सत्रिय राजनीति में उतरने से उत्साहित हैं। लेकिन समस्या यही है कि प्रियंका का राजनीतिक दौरा उनकी अपनी टीम तय करती है। अभी यह टीम उत्तर प्रदेश और  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ उनके संयुक्त राजनीतिक अभियानों की रणनीति तैयार करने में ही व्यस्त है। 

क्या योगी जी गुस्से में हैं?

भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। क्या आदित्यनाथ गुस्से में हैं? योगी भाजपा के इकलौते मुख्यमंत्री हैं जिन्हें कई राज्यों के प्रत्याशी अपने यहां चुनाव प्रचार के लिए चाहते हैं। योगी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री भी हैं। लेकिन चर्चा है कि वह जिस तरह से पार्टी ने कुछ लोगों को टिकट दिया है और कुछ को देने की चर्चा है, उससे थोड़ा असहज हैं। 

योगी ही क्यों उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य को भी फूलपुर का प्रत्याशी हजम नहीं हो रहा है। योगी ने लोकसभा उपचुनाव में गोरखपुर संसदीय सीट पर भाजपा के शिकस्त खाने के बाद निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद को भाजपा ज्वाइन कराई और अब टिकट की घोषणा में वह कुछ अपनी चाहते हैं। 

संत कबीर नगर के सांसद शरद त्रिपाठी का टिकट कटना करीब-करीब तय है, लेकिन यहां भी योगी अपनी पसंद का उम्मीदवार चाहते हैं। साक्षी महाराज को टिकट मिलना योगी को मुंह चिढ़ाने जैसा ही है। हालांकि योगी के मनमाफिक कुछ उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन बताते हैं सबकुछ दुरुस्त नहीं है।  

सात सीट की दिल्ली, घुमाए सात चक्कर

दिल्ली में लोकसभा की सात सीटें हैं। सातों भाजपा के कब्जे में हैं। पार्टी का पूर्वांचल का चेहरा मनोज तिवारी हैं तो दलित चेहरा उदितराज। निरहुआ के भाजपा के टिकट पर आजमगढ़ से चुनाव लड़ने पर मनोज तिवारी के कान खड़े हैं। मीनाक्षी लेखी पार्टी की तेजतर्रार सांसद हैं। रमेश विधूड़ी निराले सांसद हैं। 

साहिब सिंह वर्मा के पुत्र जगप्रवेश वर्मा, महेश गिरी और डॉ. हर्षवर्धन भी हैं। जाने किसका टिकट कटेगा, किसको मिलेगा। महेश गिरी को चिंता नहीं है। कार्यालय खोल लिया है। दिल्ली से न मिला तो कहीं और से लड़ जाएंगे। उदित राज अभी दूसरों से सुराग ले रहे हैं। 

मीनाक्षी को अधिक चिंता नहीं है। डॉ. हर्षवर्धन का भाजपा के पास विकल्प नहीं है। मनोज तिवारी पार्टी के दिल्ली के अध्यक्ष और पूर्वांचल का चेहरा हैं। लेकिन सब कयासों पर पूरा कान दे रहे हैं। भाजपा को सात फेरे लगवा रहे हैं। यही हाल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का है। दोनों अभी गठबंधन ही नहीं तय कर पा रहे हैं। 

टीम केजरीवाल दिल्ली में आधी सीटों पर अपने उम्मीदवार चाहती है। अजय माकन को भी लग रहा है कि बिना आम आदमी पार्टी के खाता नहीं खुलेगा। पीसी चाको भी इसी पक्ष में हैं। जबकि शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश की तरह कांग्रेस को दिल्ली में ऊंट के बल बिठाना हो तो कर लो तालमेल। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी गोल-गोल घूम रहे हैं।  

टिकट के बाद भितरघात भी....

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से अच्छा इसे कौन समझ सकता है। पटना साहिब से उम्मीदवार रविशंकर प्रसाद और बलिया से वीरेन्द्र सिंह मस्त भी इसे समझ रहे हैं। रविशंकर प्रसाद की राह में सबसे बड़ा कांटा आरके सिन्हा की टीम है। आरके सिन्हा राज्यसभा सदस्य हैं। वह डॉ. मुरली मनोहर जोशी के कभी राजनीतिक सलाहकार थे। 

शत्रुघ्न सिन्हा से अच्छा रिश्ता रहा है, उन्हें इससे पहले चुनाव में मदद करते रहे हैं। पटना साहिब में पकड़ रखते हैं। शत्रुघ्न का टिकट कटने के बाद वह पुत्र के लिए जुबान खोल बैठे थे, लेकिन रविशंकर ने काम खराब कर दिया। बताते हैं अब उनके समर्थन पहला चुनाव लड़ रहे रविशंकर के लिए कांटा बो रहे हैं। 

बलिया में भरत सिंह भी वीरेन्द्र सिंह मस्त को प्रत्याशी बनाने, अपना टिकट कटने से खुश नहीं है। पार्टी के एक सांसद तो अपने समर्थकों के साथ भाजपा मुख्यालय पर ही धरने पर बैठ गए थे। चुनाव लड़ने बेगूसराय सीट पर गए गिरिराज सिंह को भी पार्टी के नेताओं का भरपूर समर्थन नहीं मिल पा रहा है। 

राजस्थान में सवाई माधो से राजघराने की दीयाकुमारी को टिकट तो मिल गया, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समर्थक ही खेल बिगाड़ सकते हैं। बताते हैं देवरिया से लेकर मध्य प्रदेश के इंदौर और कई राज्यों में भाजपा इन स्थितियों से दो-चार हो रही है।
 

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