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नरेंद्र मोदी के खिलाफ नेताओं के महागठबंधन की इस तस्वीर में बहुत कुछ मिसिंग है
Mon, 17 Dec 2018 02:19 PM IST
अमित मंडल
अमित कुमार मंडल, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित कुमार मंडल, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमित मंडल
Updated Mon, 17 Dec 2018 02:19 PM IST
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राजस्थान में शपथ ग्रहण समारोह
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इसी साल मई 2018 में कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार में कुमारस्वाणी के शपथ ग्रहण समारोह में बेहद महत्वपूर्ण तस्वीर नजर आई थी। ये तस्वीर बता रही थी कि 2019 में महागठबंधन का आकार कैसा हो सकता है। तब यहां गैर भाजपा दलों का जमावड़ा लगा था। इसे 2019 आम चुनाव के लिए विपक्ष की एकता का सबसे बड़ा मंच बताया गया था। लेकिन सोमवार को राजस्थान में शपथ ग्रहण समारोह में जो जमावड़ा लगा उसमें कुछ प्रमुख चेहरे गायब थे। इसी ने अब कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
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जब ये दोनों नेता कर्नाटक पहुंच गए तो राजस्थान पहुंचने में भला क्या दिक्कत थी? तो क्या 2019 के महागठबंधन में दरार अभी से दिखने लगी है? राहुल गांधी और अखिलेश के बीच मतभेद तो पहले ही दिखने लगे थे। अखिलेश ने भाजपा के खिलाफ यूपी में बनने वाले गठबंधन में कांग्रेस को शामिल करने पर अब तक ठंडा रुख ही दिखाया है। इसके अलावा राफेल मुद्दे पर भी उनका रुख राहुल गांधी और कांग्रेस के रुख से मेल नहीं खाता है। वह सुप्रीम कोर्ट को फैसले को मानने की बात कह चुके हैं। जबकि राहुल का कहना है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गलत जानकारी दी है।
उधर, मायावती ने भी शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाकर बता दिया कि महागठबंधन की राह आसान नहीं। राजस्थान में बसपा ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था। लेकिन खास सफलता हाथ नहीं लगी। कर्नाटक में कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में मायवती जरूर पहुंची थीं। उस वक्त जो तस्वीर उभरकर सामने आई थी उससे अंदाजा लग रहा था कि 2019 का चुनाव भाजपा के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती होगा। लेकिन आज की तस्वीर बता रही है कि एक मजबूत महागठबंधन का आकार ले पाना इतना आसान भी नहीं होगा।
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अखिलेश-मायावती रहे नदारद
सोमवार को अशोक गहलोत ने सीएम पद और सचिन पायलट ने डिप्टी सीएम पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह में तमाम विपक्षी दल के नेता नजर आए। लेकिन इस बार सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती नदारद रहीं। दोनों नेताओं की गैरमौजूदगी कई तरह के संदेश दे गई। उस वक्त खुद अखिलेश ने वो तस्वीर ट्वीट की थी जिसमें वह नेताओं से गर्मजोशी से मिलते नजर आ रहे थे।
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An important day for us all. At the oath-taking of the Chief Minister Shri HD Kumaraswamyji and his deputy, Shri G Parmeshwaranji. pic.twitter.com/VjdFm4bQVE
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) May 23, 2018
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जब ये दोनों नेता कर्नाटक पहुंच गए तो राजस्थान पहुंचने में भला क्या दिक्कत थी? तो क्या 2019 के महागठबंधन में दरार अभी से दिखने लगी है? राहुल गांधी और अखिलेश के बीच मतभेद तो पहले ही दिखने लगे थे। अखिलेश ने भाजपा के खिलाफ यूपी में बनने वाले गठबंधन में कांग्रेस को शामिल करने पर अब तक ठंडा रुख ही दिखाया है। इसके अलावा राफेल मुद्दे पर भी उनका रुख राहुल गांधी और कांग्रेस के रुख से मेल नहीं खाता है। वह सुप्रीम कोर्ट को फैसले को मानने की बात कह चुके हैं। जबकि राहुल का कहना है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गलत जानकारी दी है।
उधर, मायावती ने भी शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाकर बता दिया कि महागठबंधन की राह आसान नहीं। राजस्थान में बसपा ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था। लेकिन खास सफलता हाथ नहीं लगी। कर्नाटक में कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में मायवती जरूर पहुंची थीं। उस वक्त जो तस्वीर उभरकर सामने आई थी उससे अंदाजा लग रहा था कि 2019 का चुनाव भाजपा के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती होगा। लेकिन आज की तस्वीर बता रही है कि एक मजबूत महागठबंधन का आकार ले पाना इतना आसान भी नहीं होगा।
क्यों दूर रहे दोनों क्षत्रप?
लेकिन सवाल है कि इन 6-7 महीनों में ऐसा क्या हो गया कि अखिलेश-मायावती ने विपक्षी एकता वाले मंच से दूर रहने का फैसला ले लिया। क्या राहुल गांधी के उभार ने इन दोनों क्षत्रपों को चिंता में डाल दिया है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बेदखल किया तो इसका सबसे ज्यादा श्रेय राहुल को मिला है। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद यह उनकी सबसे बड़ी जीत है। हर तरफ उनकी ही जय जयकार है। उन्हें 2019 में नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी करार दिया जा रहा है।
राहुल का उभार उत्तर प्रदेश में कांग्रेस में फिर से जान फूंक सकता है। ऐसे में संभव है कि अखिलेश और मायावती को राहुल बड़े प्रतिद्वंदी के रूप में देख रहे हों। 2019 में सत्ता का दरवाजा उत्तर प्रदेश से ही खुलेगा। भाजपा ने सहयोगियों के साथ 73 सीटों पर कब्जा जमाया था। अगर कांग्रेस अकेले लड़ी और अपनी सीटों की संख्या दहाई तक पहुंचा दी तो 2019 में केंद्र की सरकार में अहम भूमिका निभाने की हसरत पाले अखिलेश-मायावती के मंसूबों पर पानी फिर सकता है।