क्या राहुल, क्या सिंधिया? इमारतें ढह रही हैं, ईंटों की गिनती चालू है
लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा एक बार फिर प्रचंड बहुमत से पूरे धमक के साथ सत्ता में काबिज होने जा रही है। भाजपा की इस आंधी में बड़े-बड़े किले ढहते नजर आ रहे हैं।
इसी क्रम में बात करते हैं अमेठी की, जो कांग्रेस पार्टी परंपरागत सीट रही है और जहां पर गांधी परिवार का पीढ़ियों से कब्जा रहा है। लेकिन इस बार भाजपा की स्मृति ईरानी न केवल कड़ी टक्कर दे रही हैं बल्कि निर्णायक बढ़त की ओर अग्रसर हैं। ख़बर लिखे जाने तक स्मृति ईरानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से 24 हजार वोटों से आगे चल रही हैं।
अमेठी लोकसभा सीट के साथ कांग्रेस का सुनहरा अतीत 1967 से शुरू हुआ था, उस समय विद्याधर वाजपेयी ने जीत की नींव रखी थी। 1967-71 और 1971-77 तक विद्याधर वाजपेयी अमेठी के सांसद बने रहे। 1977-80 तक जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह अमेठी के सांसद बने रहे। अब अमेठी की बागडोर असली रूप से गांधी परिवार के हाथ आई जब 1980 में संजय गांधी कांग्रेस की ओर से सांसद चुने गए लेकिन दुर्भाग्यवश संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत हो गई। उसके बाद यह जिम्मा गांधी परिवार के ही राजीव गांधी को दिया गया।
राजीव गांधी के बाद अमेठी सीट की जिम्मेदारी कांग्रेस के सतीश शर्मा को दी गई जो 1998 तक सांसद रहे उसके बाद भाजपा के संजय सिन्हा ने उन्हें हराया और अमेठी सीट भाजपा के पास चली गयी, लेकिन जल्द ही यानि 1999 में सोनिया गांधी ने संजय सिन्हा को हराया और 2004 तक अमेठी की सांसद रहीं।
2004 से अब तक वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब तक अमेठी से सांसद बने हुए हैं, 2019 लोकसभा का अंतिम परिणाम बताएगा कि सीट उनके पास रहेगी या भाजपा की स्मृति ईरानी के पास चली जाएगी जो अभी तक बढ़त बनाई हुई हैं।
गुना से ज्योतिरादित्य पीछे
उधर मध्य प्रदेश में गुना और ग्वालियर लोकसभा क्षेत्रों की राजनीति सिंधिया राजवंश के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन यह लोकसभा चुनाव राजमाता विजया राजे सिंधिया उनके पुत्र माधवराव सिंधिया और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके केंद्र रहे हैं। ऐसा माना जाता रहा है कि सिंधिया परिवार को यहां चुनौती देना वाला कोई नहीं। सिंधिया घराने की राजनीतिक मैदान में उतर चुनाव लड़ने की शुरुआत भी गुना से ही हुई। राजमाता विजया राजे सिंधिया, माधवराव सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने जीवन का पहला चुनाव यहीं से लड़ा।
पिछले 4 चुनावों से इस सीट पर कांग्रेस के सिंधिया को ही जीत मिली है। लेकिन इस बार खेल उलटता नजर आ रहा है। मध्य प्रदेश की गुना सीट पर सिंधिया परिवार का 3 पीढ़ियों से कब्जा रहा है लेकिन इस बार भाजपा के कृष्ण पाल सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के पसीने छुड़ा दिए हैं। लगातार निर्णायक बढ़त बनाए हुए हैं। सीट ज्योतिरादित्य के हाथ से खिसकती नजर आ रही है।
तेजस्वी की हालत पस्त
उधर लालू यादव के राजनीतिक उत्तराधिकारी, उनके बेटे तेजस्वी यादव लालू की लालटेन थामे युवा पीढ़ी को रोशनी दिखाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मामला बन नहीं पाया और युवा पीढ़ी ने उन्हें पूरी तरह से नकार दिया। अब सवाल यह है कि अगर बिहार की जनता ने तेजस्वी को नकार दिया तो क्या यह राजनीति के लालू युग की समाप्ति है? या फिर तेजस्वी को राजनीति में और परिपक्व होने की जरूरत है।