भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ा मोर्चा खोल ममता ने दिखाई ताकत, बनीं विपक्ष का मजबूत चेहरा
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पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव से लेकर छठे चरण के चुनाव तक बंपर वोटिंग हुई, लेकिन इस दौरान हिंसा की भी खूब घटनाएं हुईं। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और समर्थक खून-खराबे पर उतर आए। इन सब घटनाओं के बीच चुनाव प्रचार अभियान, रैलियों और जनसभाओं में जो सबसे कॉमन बात दिखी, वह यह कि बंगाल में ज्यादा से ज्यादा कमल खिलाने के उद्देश्य में लगी भाजपा, टीएमसी प्रमुख और सीएम ममता बनर्जी पर हमलावर रही, वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी भी पीएम मोदी और अमित शाह के जुबानी हमलों पर पलटवार करती रहीं।
छह चरणों के चुनाव के बाद अब जबकि सातवें और अंतिम चरण का चुनाव शेष रह गया है, तो ऐसे माहौल में ममता बनर्जी एक बार फिर विपक्ष के बीच सशक्त नेता के बतौर उभर कर सामने आ रही हैं। आम चुनाव की अधिसूचना से पहले 19 जनवरी को कोलकाता में हुई विपक्ष की महारैली को याद कीजिए, जब भाजपा के विरोध में ममता के बुलावे पर करीब 17 राजनीतिक दल एक मंच पर इकट्ठा हुए थे। पीएम मोदी और शाह से सीधे भिड़ने वाली ममता पिछले कुछ दिनों में और ज्यादा आक्रामक नजर आई हैं। साल 2012 में टाइम मैगजीन की ओर से दुनिया के 100 प्रभावशाली व्यक्तित्व में शामिल रहीं ममता बनर्जी सशक्त होतीं दिख रही हैं।
आयोग की कार्रवाई के बाद आक्रामक हुईं ममता
पश्चिम बंगाल में हिंसा की खबरें तो लगातार आती रहीं, लेकिन कोलकाता में मंगलवार को अमित शाह की रोड शो के दौरान हुई हिंसा ने सियासी आग को और हवा दे दी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य चुनाव आयोग पर ममता के इशारे पर काम करने का आरोप लगाते हुए ललकारा तो बुधवार की शाम तक चुनाव आयोग की बड़ी कार्रवाई सामने आई। आयोग ने बंगाल में चुनाव प्रचार की समय सीमा कम कर दी और गृह सचिव अत्रि भट्टाचार्य अधिकारियों को पद से हटा दिया।
इसके बाद ममता आक्रामक हुईं तो चुनाव आयोग को पीएम मोदी और शाह के इशारे पर काम करनेवाला बता दिया। ममता ने इस फैसले का विरोध किया तो पूरा विपक्ष उसके साथ खड़ा हो गया। बसपा प्रमुख मायावती, सपा प्रमुख अखिलेश, आप प्रमुख और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, टीडीपी प्रमुख और आंध्रप्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू ने ममता का समर्थन किया है।
यहां तक कि कांग्रेस और माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने भी इस मामले पर ममता के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।
ममता बनर्जी अचानक इतनी मजबूत नहीं हुई हैं। उनके सशक्तीकरण के पीछे उनका लंबा इतिहास रहा है। उनके बचपन से लेकर उनकी पढ़ाई-लिखाई और फिर राजनीति में पदार्पण से लेकर अपनी सियासी जमीन तैयार करने तक वह एक सशक्त नेता के तौर पर उभरी हैं।
संघर्षपूर्ण रहा बचपन, दूध भी बेचा, उच्च शिक्षा हासिल की, कानून भी पढ़ा
बचपन में ही ममता के सिर से पिता का साया उठ गया था। स्वतंत्रता सेनानी पिता की मृत्यु के बाद अपने छोटे भाई-बहनों के लालन-पालन के लिए मां अकेली पड़ गईं तो ममता को दूध बेचने का काम भी करना पड़ा था। कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज से ममता बनर्जी ने इतिहास में ग्रेजुएशन किया और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से इस्लामिक इतिहास में मास्टर डिग्री की। इसके बाद श्रीशिक्षायतन कॉलेज से बीएड और फिर कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की।
पढ़ाई के दौरान राजनीतिक इंट्री, पहली जीत के साथ बनी सबसे युवा सांसद
ममता बनर्जी अपनी पढ़ाई के दौरान से ही राजनीति से जुड़ी हुई हैं। 70 के दशक में जब वह कॉलेज में पढ़ रही थीं, तब उन्हें राज्य महिला कांग्रेस का महासचिव बनाया गया था। 1976 से 1980 तक वे महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं। 1984 में ममता ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराने के बाद वह देश की सबसे युवा सांसद बनीं।
1997 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ा और अपनी अलग पार्टी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। उनके नेतृत्व में बहुत कम समय में टीएमसी राज्य की वाम सरकार के विपक्ष में सशक्त होकर खड़ी हो गई। पश्चिम बंगाल से लेफ्ट को उखाड़ फेंकने वाली ये वही ममता बनर्जीं हैं, जो आज पीएम मोदी और शाह के बरक्स आ खड़ी हुई हैं। अब देखना यह होगा कि विपक्ष के जो सारे दल आज ममता के साथ खड़े दिख रहे हैं, उन्हें विपक्ष का नेतृत्व करने वाली नेता के तौर पर ममता कितना स्वीकार्य होंगीं!