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लोन मोरेटोरियम: सुप्रीम कोर्ट में शाम तक के लिए टली सुनवाई, सरकार ने कहा था- ज्यादा राहत संभव नहीं

Tue, 13 Oct 2020 02:10 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Sneha Baluni Updated Tue, 13 Oct 2020 02:10 PM IST
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loan moratorium SC reschedule hearing on petitions seeking relief beyond six months or waiver of interest
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : social media

उच्चतम न्यायालय ने लोन मोरेटोरियम (ब्याज पर ब्याज में छूट) पर सुनवाई को मंगलवार शाम तक के लिए टाल दिया है। अदालत में 12 बजे सुनवाई शुरू होने के बाद उसने कहा कि अब इसपर शाम को सुनवाई होगी। सुनवाई में यह फैसला लिया जा सकता है कि कर्ज लेने वालों को ब्याज पर ब्याज में छूट मिलेगी या नहीं। 

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इससे पहले पिछले हफ्ते अदालत ने आठ दिन के लिए सुनवाई को टाल दिया था। इसके अलावा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने को कहा था। सरकार ने पिछले हफ्ते इस मामले में हलफनामा दाखिल किया था। जिसमें कहा गया था कि कोरोना महामारी में विभिन्न क्षेत्रों को ज्यादा राहत देना संभव नहीं है।
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यह भी पढ़ें- लोन मोरेटोरियम मामला: RBI ने दायर किया हलफनामा, कहा- और राहत देना संभव नहीं
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सरकार ने जोर देकर कहा था कि अदालतों को राजकोषीय नीति (फिस्कल पॉलिसी) में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। शीर्ष अदालत को सरकार ने बताया था कि विभिन्न क्षेत्रों को पर्याप्त राहत पैकेज दिया गया है। मौजूदा महामारी के बीच सरकार के लिए इन क्षेत्रों को और ज्यादा राहत देना संभव नहीं है।


दो करोड़ तक के कर्ज पर माफ हुआ चक्रवृद्धि ब्याज
सर्वोच्च न्यायालय में दिए गए हलफनामे में सरकार ने कहा था कि दो करोड़ रुपये तक के कर्ज के लिए चक्रवृद्धि ब्याज माफ करने के अलावा कोई और राहत राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और बैंकिंग क्षेत्र के लिए हानिकारक है। अदालत ने कहा था कि ब्याज पर जो राहत देने की बात की गई है, उसके लिए केंद्रीय बैंक द्वारा किसी तरह का दिशा निर्देश जारी नहीं किया गया है।

हलफनामे में आरबीआई ने कहा था कि छह महीने से अधिक समय के लिए लोन मोरेटोरियम की सुविधा प्रदान करने से समग्र ऋण अनुशासन समाप्त हो सकता है, जिसका अर्थव्यवस्था में ऋण निर्माण की प्रक्रिया पर दुर्बल प्रभाव पड़ेगा। आरबीआई ने आगे कहा था कि यह कदम निर्धारित भुगतानों को फिर से शुरू करने में देरी के जोखिमों को बढ़ा सकता है और उधारकर्ताओं के लिए पुनर्भुगतान के लिए दबाव बढ़ेगा।

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