हादसे रोकने के लिए विमानों की तरह ट्रेनों में सेंसर नॉड का इस्तेमाल
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विमान के ब्लैक बॉक्स की तरह ही ट्रेनों में भी वायरलेस सेंसर नॉड लगाने पर विचार हो रहा है। इस यंत्र से रेलवे ट्रैक के नीचे से खिसक रही मिट्टी, ट्रैक फ्रैक्चर होने, कोच में तकनीकी खराबी की सूचना से दुर्घटना रोकने में मदद मिलेगी। कोच में खराबी की जांच में ज्यादा वक्त भी जाया नहीं होगा। पहले चरण में 7800 कोच में यह सेंसर लगेगा।
ट्रेन हादसे रोकने के लिए रेलवे ने आधुनिक तकनीक का सहारा लेने की योजना बनाई है। न्यूयार्क व यूके की ट्रेनों में इस प्रकार के सेंसर यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में भी वैसे ही सेंसर लगाने की कवायद हो रही है। यूके की पोचन कंपनी इसकी पहल कर रही है। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही इसका टेंडर जारी कर भारतीय रेल में भी सेंसर नॉड का इस्तेमाल किया जाएगा।
जीपीआरएस युक्त इस सेंसर से चार महीने पहले ही रेलवे ट्रैक में तकनीकी खामियों का पता चल जाएगा। इसे ट्रेन के पहिये में लगाया जाएगा। जो कोच में कमियों के साथ ही रेलवे ट्रैक में हो रही गड़बड़ी से भी रेलवे अधिकारियों को अवगत करा देगा।
एक सेंसर की उम्र बीस साल तक होगी
ट्रेन के कंपन से स्वत: रिचार्ज होगा यंत्र
रेलवे बोर्ड अधिकारी ने बताया कि फिलहाल इस सेंसर की कीमत तीस हजार रुपये होगी, लेकिन कंपनी से तकनीकी भी साझा करने का करार किया जाएगा। तकनीक मिलने से इसकी कीमत पंद्रह हजार रुपये होगी और भारत में ही सेंसर नॉड बन सकेगा।
एक सेंसर की उम्र बीस साल तक होगी। जिसकी खासियत यह भी होगी कि इसमें बैट्री का इस्तेमाल नहीं होगा। ट्रेन के कंपन से यह सेंसर ऑटोमेटिक रिचार्ज होगा। जीपीआरएस युक्त होने के कारण इसका पूरा डेटा लोकोमोटिव के पास होगा।
वायरलेस सेंसर नॉड
30 हजार रुपये होगी शुरुआती कीमत
20 साल तक होती है एक यंत्र की उम्र
15 हजार तक हो जाएगी कीमत तकनीक मिलने के बाद