फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Kurukshetra : Government is trying to save lives as well as society as social economic challenges are no less than corona infection

कुरुक्षेत्र : कोरोना संकट में 'जान' के साथ 'जहान' भी बचाने में जुटी है सरकार

Mon, 13 Apr 2020 09:56 PM IST
गौरव पाण्डेय विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Mon, 13 Apr 2020 09:56 PM IST
सार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार की सुबह दस बजे जब देश को संबोधित करेंगे तो उनके भाषण से लॉकडाउन की भावी तस्वीर सामने आएगी। जैसी की संभावना है कि अप्रैल के आखिर तक कुछ ढील के साथ लॉकडाउन जारी रहेगा, लेकिन केंद्र सरकार की सबसे बड़ी चिंता है कि लॉकडाउन में ढील के बाद जो आर्थिक और सामाजिक संकट सामने आ सकता उससे कैसे निपटा जाए। सूरत और पटियाला जैसी घटनाओं ने बता दिया है कि लॉकडाउन की वजह से जो देशबंदी हुई है उससे करोड़ों लोगों के सामने जिंदगी बचाने की चुनौती आ खड़ी हुई है, उसका समाधान अगर समय रहते सही तरीके से नहीं किया गया तो स्थिति खासी विस्फोटक हो सकती है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस मामले में अपने मंत्रियों और सलाहकारों के साथ गहन माथापच्ची करने के बाद ही यह फैसला लेंगे कि लॉकडाउन का भावी स्वरूप क्या हो।

विज्ञापन
Kurukshetra : Government is trying to save lives as well as society as social economic challenges are no less than corona infection
नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

यूं तो कई कारणों से देश की अर्थव्यवस्था की चाल पहले से ही सुस्त थी, फिर भी देश के उद्योग जगत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और दूरदर्शिता पर पूरा भरोसा था कि आखिरकार गाड़ी पटरी पर आ जाएगी। लेकिन एकाएक कोरोना संकट ने सबकुछ ठप कर दिया। 21 दिन के लॉकडाउन में एक तरफ सरकार कोरोना संक्रमण पर काबू पाने के लिए चिकित्सा तंत्र को चुस्त दुरुस्त करने की चुनौती से जूझ रही है तो दूसरी तरफ उद्योग-व्यापार-कारोबार सब ठप हो जाने से भारी संख्या में कामगारों, दिहाड़ी मजदूरों के पलायन और उनके सामने रोजी-रोटी के आसन्न संकट व मझोले और लघु उद्यमियों, व्यापारियों, दुकानदारों के धंधे बंद होने से उत्पन्न आर्थिक संकट ने जगह-जगह सामाजिक आर्थिक असंतोष की चिंगारी भड़कानी शुरू कर दी है। 

विज्ञापन


सूरत में जिस तरह मजदूरों ने सड़कों पर निकल कर आगजनी की, मथुरा जिले के गोवर्धन इलाके में दुकानदारों ने बंदी के बावजूद दुकानें खोलीं और बंद कराने पहुंची पुलिस पर हमला किया, पटियाला में निहंगों ने लॉकडाउन तोड़ा और रोकने पर पुलिस पर हमला कर दिया... ऐसी घटनाएं उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में सामने आईं। यहां तक पुलिस कर्मियों के साथ-साथ डॉक्टरों और चिकित्साकर्मियों पर भी हमले हुए।
विज्ञापन


संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से भारत में करीब 40 करोड़ कामगारों (संगठित और असंगठित) के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है। राष्ट्रीय दलित आदिवासी संगठनों के महासंघ (नैकडोर) के प्रमुख अशोक भारती के मुताबिक लॉकडाउन की आर्थिक मार सबसे  ज्यादा दलित आदिवासी पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और वंचितों पर पड़ी है, क्योंकि बड़ी संख्या में जिन मजदूरों, रिक्शा-ठेले वालों, रोज कमाने-खाने वालों ने दिल्ली मुंबई, अहमदाबाद, बंगलूरू आदि बड़े शहरों से अपने गांवों की तरफ पलायन किया है, उनमें बहुसंख्यक तादाद दलितों, पिछ़ड़ों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों की है। इनके गांव में पहुंचने से वहां की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ आ गया है क्योंकि लॉकडाउन खुलने के बाद इनमें से कितने वापस आएंगे यह बता पाना मुश्किल है। दूसरी ओर शहरों में इनकी कमी होने से निर्माण उद्योग और तमाम छोटे कारखानों और व्यापार पर भी असर पड़ेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन


सरकार को मिली खुफिया जानकारियों में भी लॉकडाउन की वजह से आने वाले दिनों में सामाजिक आर्थिक संकट को एक बड़ी चुनौती बताया गया है। इन जानकारियों के मुताबिक अभी तो बड़ा संकट भूख का है, लेकिन लॉकडाउन खुलने के बाद काम का संकट भी सामने आएगा। इसके अलावा बड़े उद्योगों की बंदी, यातायात और सार्वजनिक परिवहन बसों, ट्रकों, रेलों, हवाई सेवाओं पर लगी रोक ने पेट्रोलियम कंपनियों के सामने मांग और उत्पादन, दोनों का संकट पैदा कर दिया है। पेट्रोलियम और गैस क्षेत्र के एक विशेषज्ञ के मुताबिक लॉकडाउन की वजह से लगभग 80 से 90 फीसदी मांग घट गई है। दूसरी तरफ रिफाइनरियों को कच्चा तेल नहीं मिल पा रहा है। वहीं, उत्पादित तेल खर्च न होने से नया उत्पादन भी नहीं हो रहा है। इससे पूरे पेट्रोलियम उद्योग के सामने गंभीर संकट पैदा हो गया है जो पूरी अर्थव्यवस्था की एक जीवन रेखा है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सारी स्थिति से अवगत हैं और इसीलिए उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ लंबा विचार विमर्श करके लॉकडाउन के दूसरे चरण में कुछ जरूरी ढील देने का मन बनाया है। इसीलिए मुख्यमंत्रियों के साथ अपनी वीडियो कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री ने अपने पहले सूत्र वाक्य 'जान है तो जहान है' को बदलकर कहा 'जान भी जहान भी है'। सूत्रों के मुताबिक अंतिम तस्वीर तो मंगलवार की सुबह दस बजे प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद ही साफ होगी, लेकिन फिर भी संभावना है कि कुछ क्षेत्रों में सीमित तरीके से आर्थिक और उत्पादक गतिविधियों की छूट दी जाएगी। 

इनमें ऑप्टिक फाइबर केबल, कंप्रेसर एंड कंडेसर इकाइयां, इस्पात एवं फेरस एलाय मिल, पावरलूम, पल्प और कागज इकाइयां, उवर्रक, पेंट, प्लास्टिक, वाहन इकाइयां, रत्न एवं आभूषण तथा सेज एवं निर्यात से जुड़ी कंपनियों को काम करने की कुछ छूट दी जा सकती है। इसके अलावा ट्रांसफार्मर एवं सर्किट व्हीकल, टेलीकॉम संबंधी यंत्र और पुर्जे, खाद्य एवं प्रसंस्करण, पेय पदार्थों से जुड़े उद्योग और पेट्रोलियम एवं गैस क्षेत्र को भी सीमित कामकाज की छूट मिल सकती है। जिन उद्योगों में काम शुरु करने की छूट मिलेगी उन्हें न्यूनतम कर्मचारियों के साथ एक शिफ्ट में काम करने की इजाजत दी जाएगी और उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग और कोरोना संक्रमण की रोकथाम के सभी इंतजाम सुनिश्चित करने होंगे। 

निर्माण उद्योग जहां असंगठित क्षेत्र के मजदूर सबसे ज्यादा काम करते हैं, उसे भी कुछ शर्तो के साथ काम करने की छूट मिल सकती है। सीमेंट उद्योग में पूरे सुरक्षा मानकों के साथ न्यूनतम कर्मचारियों से तीनों शिफ्टों में काम करने की अनुमति मिल सकती है और गलियों में ठेले लगाने वालों फेरी वालों को घर-घर फल सब्जी दूध और जरूरी सामान की आपूर्ति के लिए सुरक्षा उपायों के साथ आने जाने की अनुमति दी जा सकती है।


सरकारी सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री अपने संबोधन में एक मोटा-मोटा खाका देश के सामने रखेंगे, बाकी राज्य सरकारें अपने-अपने राज्य की स्थिति के हिसाब से फैसले लेंगी। साथ ही जिन राज्यों में हॉटस्पाट चिह्नित किए गए हैं, वहां लॉकडाउन का पालन सख्ती से कराया जाता रहेगा। जो भी छूट मिल सकती है वह उन क्षेत्रों के लिए होगी जहां कोरोना संक्रमण अभी नहीं पहुंचा है या फिर बेहद कम है और नियंत्रण में है। जैसे पूर्वोत्तर के राज्य और छत्तीगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के दूर दराज के इलाके जहां अभी स्थिति सामान्य है, वहां सीमित दायरे में आर्थिक गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं। लेकिन अंतिम फैसला राज्य सरकारों को ही करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की कोशिश है कि लॉकडाउन की वजह संक्रमण की चाल धीमी करने में जो कामयाबी मिली है, उसे खोए बिना सामाजिक आर्थिक संकट के असर को भी धीरे धीरे कम किया जा सके जिससे 'जान' भी बचे और 'जहान' भी।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed