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Kolkata High Court: अभिषेक बनर्जी के खिलाफ हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका, अदालत पर की थी तल्ख टिप्पणी
Mon, 30 May 2022 08:20 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
Published by: Amit Mandal
Updated Mon, 30 May 2022 08:20 PM IST
सार
याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि प्रार्थना के समर्थन में हलफनामे में लगाए गए आरोपों पर गौर करने पर उसे अवमानना के स्वत: संज्ञान नियम जारी करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं मिलते हैं।
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अभिषेक बनर्जी
- फोटो : एएनआई
विस्तार
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सोमवार को न्यायपालिका पर तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी की टिप्पणियों पर स्वत: संज्ञान लेने के लिए एक प्रार्थना को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि उनके द्वारा कही गई बातों को किसी भी तरह से अदालत का अपमान नहीं होता है। न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य की अध्यक्षता वाली अवकाश पीठ में दो वकीलों ने बनर्जी की टिप्पणियों पर स्वत: संज्ञान लेने की मांग की जिसमें उन्होंने दावा किया कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को कम किया गया है और अभिषेक के खिलाफ अवमानना नियम जारी किया जाए।
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पूर्वी मिदनापुर जिले के हल्दिया के औद्योगिक टाउनशिप में एक सार्वजनिक रैली में बनर्जी ने कहा, मुझे यह कहते हुए बुरा लग रहा है कि न्यायपालिका के कुछ सदस्य दूसरों के इशारे पर और एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। वे छोटे-छोटे मामलों में सीबीआई के फैसले का आदेश दे रहे हैं। वे हत्या के मामलों में रोक लगा रहे हैं। यह अकल्पनीय है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पता है कि इस तरह की टिप्पणियों के लिए न्यायालय उन पर कार्रवाई भी कर सकती है, लेकिन वह आगे भी ऐसा ही कहेंगे।
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याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि प्रार्थना के समर्थन में हलफनामे में लगाए गए आरोपों पर गौर करने पर उसे अवमानना के स्वत: संज्ञान नियम जारी करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं मिलते हैं। न्यायमूर्ति अजय कुमार मुखर्जी ने कहा कि वर्तमान मामले में निस्संदेह व्यक्ति द्वारा की गई टिप्पणी आम जनता और / या न्यायपालिका के सदस्यों के लिए सुखद नहीं हो सकती है।
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पीठ ने अपने आदेश में कहा कि हम संबंधित व्यक्ति द्वारा की गई टिप्पणियों को किसी भी तरह से बदनाम करने या अदालत के अधिकार को कम करने की प्रवृत्ति का नहीं पाते हैं। पीठ ने कहा कि यदि भारत के किसी भी नागरिक की छिटपुट टिप्पणी को अदालतों को अवमानना के स्वत: संज्ञान के नियम जारी करने पड़े तो न्यायपालिका के लिए अधिक महत्वपूर्ण मामलों में अपने न्यायिक कार्यों का निर्वहन करना असंभव हो जाएगा। खंडपीठ ने कहा कि हालांकि यह अपेक्षा की जाती है कि सार्वजनिक जीवन में लोगों को ऐसी टिप्पणी करने से खुद को रोकना चाहिए जो न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को कम कर सकती है।