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जब जापान की राजकुमारी के नाम पर रख दिया था बाघिन के बच्चे का नाम

Wed, 29 Jul 2020 04:46 PM IST
Rajeev Rai अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Published by: Rajeev Rai Updated Wed, 29 Jul 2020 04:46 PM IST
सार

  • जापान की राजकुमारी कीको कोवाशिमा और उनके पति राजकुमार एकीशिनो की 1992 की यात्रा से जुड़ा है यह अनुभव                        

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Know why tigress of delhi zoo was named after the princess of Japan
दिल्ली चिड़ियाघर की वार्षिक रिपोर्ट 1992-93 में छपा चित्र, जापान के राजकुमार एकीशीनो और राजकुमारी कीको कोवाशिमा के साथ चिड़िया घर के अधिकारी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वन्यजीव प्रेमी पशुओं के लिए कभी-कभी ऐसे काम कर जाते हैं जो इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो जाते हैं। ऐसा ही एक वाकया 1992 में तब हुआ था जब जापान की राजकुमारी कीको कोवाशिमा अपने पति राजकुमार एकीशिनो के साथ भारत यात्रा पर आई हुईं थीं। यात्रा के दौरान उनका दिल्ली चिड़ियाघर देखने का कार्यक्रम बन गया। जब वे चिड़ियाघर पहुंचीं तो वहां सफेद बाघिन को देखकर बहुत खुश हुईं। 

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सफेद बाघिन ने उसी समय दो मादा बच्चों को भी जन्म दिया था। राजकुमारी की यात्रा को यादगार बनाने के लिए उनसे उनके नाम पर बाघिन के बच्चों के नाम रखने की अनुमति मांगी गई। अनुमति मिलते ही बाघिन के दोनों बच्चों के नाम राजकुमारी और उनकी बेटी के नाम पर ‘कीको’ और ‘माको’ रख दिए गये थे।
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उस समय दिल्ली चिड़ियाघर के निदेशक रहे बीएम अरोड़ा ने अमर उजाला को बताया कि यह उनके साथ-साथ चिड़ियाघर के सभी कर्मचारियों के लिए बेहद गौरवशाली क्षण था। राजकुमारी बाघिन को देख बहुत खुश हुईं थीं और हम किसी भी तरह उनकी यात्रा को यादगार बनाना चाहते थे। यह उनके सम्मान के साथ-साथ भारत के मैत्रीपूर्ण संबंधों को बल देने वाली बात भी थी।
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कुछ लोगों को इस बात पर संकोच हो रहा था कि जापान का राजपरिवार इसके लिए अनुमति देगा भी या नहीं। अंतत: उनसे इसके बारे में औपचारिक अनुमति लेने का निर्णय हुआ। लेकिन उन सबके लिए यह बेहद ख़ुशी की बात थी कि राज परिवार ने इसे बेहद सकारात्मक ढंग से लिया और बाघिन के बच्चों के नाम राजकुमारी और उनकी बेटी के नाम पर रखने की अनुमति दे दी।

क्यों कराया था बाघों का बीमा

बीएम अरोड़ा ने बताया कि उसके कुछ समय पहले ही कर्नाटक के जीव विज्ञानी उलासकरन को बाघों पर अध्ययन करने की विशेष अनुमति दी गई थी। वे बाघों का अध्ययन करने के लिए उन्हें ट्रांकुलाइजर से बेहोश करते थे और उसके बाद अध्ययन करते थे। अज्ञात दुर्घटनावश इस अध्ययन के समय कुछ बाघों की मौत हो गई थी। अपुष्ट रिपोर्ट्स में इनकी संख्या पांच या छ: बताई जाती है।

इन बाघों की मौत की जांच के लिए वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के तत्कालीन डायरेक्टर एचएस पवार की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई गई थी। इस कमेटी ने घटना की जांच के बाद क्या रिपोर्ट दिया, इसका कभी कुछ पता नहीं चला। लेकिन इसी बीच इस समस्या को उजागर करने के लिए बीएम अरोड़ा ने उन दोनों बाघों का बीमा करवा दिया था जिन्हें राजकुमारी और उनके बेटी के नाम पर नाम दिया गया था।

बीमा के लिए उस समय ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से मां बाघिन के लिए 15 हजार रूपये और उसके दोनों बच्चों का पांच-पांच हजार का बीमा कराया गया था। बाघों की जीवन लीला समाप्त होने के बाद कंपनी ने इस राशि का भुगतान भी चिड़ियाघर को किया था।
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