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काउंट डाउन... चंद्रयान-2: खतरों के बीच चंद्रमा पर भारतीय तकनीकी कौशल की सॉफ्ट लैडिंग

Fri, 06 Sep 2019 11:40 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Fri, 06 Sep 2019 11:40 AM IST
सार

  • चंद्रयान 2 की सॉफ्ट लैंडिंग के जरिए भारत दुनिया के सामने अपनी तकनीकी श्रेष्ठता का प्रदर्शन करेगा
  • लैंडिंग की सफलता के लिए वह जगह सबसे महत्वपूर्ण है, जहां अंतरिक्ष यान को उतरना है
  • अब तक अमेरिका, रूस और चीन ऐसा कर पाए हैं, भारत बनेगा चौथा देश

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Chandrayaan 2 Landing: Know where Chandrayan 2 will land on the moon and what basis and analysis
चंद्रयान-2 - फोटो : इसरो

विस्तार

चंद्रमा पर चंद्रयान 2 की सॉफ्ट लैंडिंग के जरिए भारत दुनिया के सामने अपनी तकनीकी श्रेष्ठता का प्रदर्शन करेगा। अब तक अमेरिका, रूस और चीन ऐसा कर पाए हैं। इस किस्म की लैंडिंग की सफलता के लिए वह जगह सबसे महत्वपूर्ण है, जहां अंतरिक्ष यान को उतरना है। भारत ने इसके लिए चंद्रमा के दो क्रेटर (गड्ढों) सिम्पेलियस एन और मैनजिनस सी के बीच मौजूद नौ किमी लंबे समतल मैदान को चुना है। सात सितंबर की भोर से पहले पहले यहां यान को उतारा जाना है। वहीं एक वैकल्पिक साइट भी तैयार रखी गई है, जिसे योजना में बदलाव की स्थिति में उपयोग किया जा सकता है। ऐसे में आइए जानते हैं इन जगहों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य और चंद्रयान-2 के लिए इनके चुनाव की वजहों के बारे में।

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चंद्र सतह पर विक्रम के लिए तीन बड़े खतरे

चंद्रयान 2 को चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर 65 डिग्री से 90 डिग्री अक्षांश पर उतारा जाना है। यहां उपयुक्त जगह का चुनाव अपने आप में बड़ी चुनौती है। इसके लिए दो कसौटियां बनाई गईं, तकनीकी और वैज्ञानिक और इनके आधार पर लैडिंग के समय विक्रम व प्रज्ञान के लिए चंद्र सतह पर उतरने के समय पेश आने वाले तीन प्रमुख खतरे तय किए गए।

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  • 1. ढलान : विक्रम को उतारने के लिए 15 डिग्री से कम ढलान वाली जगह को चुना जाएगा। ज्यादा ढलान होने पर विक्रम को उतरते समय संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।
  • 2. बोल्डर : विक्रम जहां उतरेगा, वहां 0.5 मीटर से बड़े और 32 सेमी से ऊंचे बोल्डर (बड़े पत्थर) नहीं होने चाहिए। ऐसा हुआ तो वे न केवल लैंडिंग के समय बाधा बन सकते हैं, बल्कि संतुलन भी बिगाड़ सकते हैं। प्रज्ञान को चंद्रमा की सतह पर चलाने और ऑर्बिटर व पृथ्वी से इन दोनों का रेडियो संपर्क बनाने में भी बाधा आ सकती है।
  • 3. साया : किसी बड़ी चट्टान, पहाड़ या ऊंची जगह के साये से भी विक्रम को बचाना होगा। कोशिश की जाएगी की उसे ज्यादा से ज्यादा समय सूर्य की रोशनी मिले। इससे मिशन की लाइफ बढे़गी, जिसे कम से कम एक चंद्रदिवस (हमारे 14 दिन) रखने का लक्ष्य है। दक्षिण ध्रुव पर लैंडिंग की एक वजह मिशन की लाइफ बढ़ाना भी था क्योंकि ध्रुवों पर सूर्य का प्रकाश ज्यादा समय तक रहता है।

3500 तस्वीरों और तकनीकी डाटा से बनाया खतरे का नक्शा

लैडिंग के लिए उपयुक्त जगह के चुनाव में कई चंद्र मिशन के डाटा, तकनीकों और उपकरणों की मदद ली जा रही है। इसमें चंद्रयान-1 से मिला डाटा तो काम आया ही, नासा का लूनर रिक्गनसेंस ऑर्बिटर कैमरा, जापान के कागुया मिशन, डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम) आदि से मिले डाटा व तस्वीरों का भी विश्लेषण किया जा रहा है। इससे पहले केवल ढलान और साये से बचाने के लिए चंदमा के दक्षिण ध्रुव की 3,500 तस्वीरों का भारतीय अंतरिक्ष विज्ञानियों ने विश्लेषण किया। साथ ही पूरे एक साल तक चंद्रमा पर नजर रखकर यहां होने वाली गतिविधियों को दर्ज किया और मिशन के लिए संभावित खतरे का नक्शा बनाया।

और अंतत: ...चंद्रमा के तीसवें अहाते में चुनी दो साइट्स

इस पूरी कसरत के बाद दो जगहों का चयन हुआ। इनमें पीएलएस 54 (प्राइम लैंडिंग साइट) को प्राथमिकता पर रखा गया है। यही साइट मैनजिनस सी और सिम्पेलियस एन के बीच में मौजूद मैदानी भाग है। वहीं एएलएस 01 (ऑल्टरनेट लैंडिंग साइट) को वैकल्पिक लैंडिंग साइट चुना गया है। ये दोनों ही जगहें एक दूसरे के निकट हैं और चंद्रमा के एलक्यू 30 अहाते में आती हैं। जिस प्रकार पृथ्वी की भूमि को सात महाद्वीपों में बांटा गया है, अमेरिकी भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग ने चंद्रमा को 30 अहातों में बांटा है।

चंद्रमा के इतिहास और संरचना का कोष है वहां

वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रमा के एलक्यू 30 क्षेत्र में सर्वाधिक अंतरिक्ष पिंड टकराए हैं। इन टकराव से बने 46 क्रेटर 100 किलोमीटर से बड़े व्यास के हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस टकराव का असर चंद्रमा की सतह पर गहराई तक हुआ। इससे न केवल सतह पर मौजूद चीजों में उथलपुथल मची, बल्कि ये चीजें पिघलकर क्रेटरों में जमा भी होती गईं। वहीं टकराव के समय आसपास के क्रेटरों से निकले चंद्र के भूगर्भीय तत्व भी इनमें हो सकते हैं। यह चंद्रमा, खुद हमारी पृथ्वी और सौरमंडल से जुड़े इतिहास को जानने के टाइम कैप्सूल जैसे हैं।


प्राथमिक लैंडिंग साइट और दोनों क्रेटर

पीएलएस 54 चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव मौजूद ये मैनजिनस सी और सिम्पेलियस एन नाम के दो ‘इंपैक्ट क्रेटरों’ के बीच में हैं। ‘इंपैक्ट क्रेटर’ यानी किसी आकाशीय पिंड के चंद्रमा की सतह पर तेजी से टकराने से इनका जन्म हुआ। इसी वजह से यह सटीक वृत्ताकार हैं। इंपैक्ट क्रेटर आसपास की सतह से निचले स्तर पर होते हैं। ये दोनों सैटेलाइट क्रेटर की श्रेणी में आते हैं। वैज्ञानिक अनुमान है कि जिस पिंड के ग्रह की सतह पर टकराने से मुख्य क्रेटर बनता है, उसके छोटे टुकड़ों के टकराने से सैटेलाइट क्रेटर बनते हैं। चंद्रमा पर दूसरी तरह के क्रेटर भी हैं, जिन्हें ‘वॉलकैनिक-क्रेटर’ यानी ज्वालामुखी से जन्म गड्ढे कहा जाता है। इनका जन्म चंद्रमा की भीतर उथलपुथल की वजह से हुआ है। 

  • मैनजिनस-सी : मैनजिनस का नामकरण 16-17वीं शताब्दी के इतालवी अंतरिक्ष विज्ञानी कार्लो मनजीनी के नाम पर हुआ। मैनजिनस-सी इसका सैटेलाइट क्रेटर है और करीब 25 किमी व्यास का है।
  • सिम्पेलियस-एन : यह सिम्पेलियस क्रेटर का सैटेलाइट क्रेटर है। सिम्पेलियस को 16वीं व 17वीं शताब्दी के स्कॉटिश गणितज्ञ ह्यू सेम्पिल से अपना नाम मिला। सिम्पेलियस-सी आकार में मात्र 8 किमी व्यास का है।
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