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जानिये किस दर्द में जीती हैं आग से जली लड़कियां

Wed, 28 Nov 2018 09:42 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 28 Nov 2018 09:42 PM IST
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know the Pain of Girls Who Burning by Fire 
- फोटो : अमर उजाला

आग चाहे एसिड की हो या मिट्टी के तेल की, वह जलाती है, झुलसाती है और मारती है। अगर कोई व्यक्ति, खासतौर पर महिला या लड़की आग से 50-60 फीसदी जल गई है तो उसे कई तरह के दर्द झेलने पड़ते हैं। शरीर का दर्द तो वे सहती ही हैं, मगर साथ ही सामाजिक जीवन में बदली उनकी जिंदगी भी उन्हें कम पीड़ा नहीं पहुंचाती है। प्रभा बताती हैं कि आग से जलने के बाद कई जान-पहचान वाले बदल जाते हैं। रोजाना मिलने-जुलने वाले भी कन्नी काटने लगते हैं। अगर चेहरा खराब हुआ है तो दुनिया ऐसा व्यवहार करती है, जैसे वे सालों से यहां रह रहे हैं तो मैं उनके बीच अजनबी बनकर अभी आई हूं।

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इंटरनेशनल सोसायटी फॉर बर्न इंजुरीज 'आईएसबीआई' की बुधवार को जो रिपोर्ट जारी हुई है, इस मौके पर आग से जलने का दंश झेल रही कई लड़कियों को भी आमंत्रित किया गया था। दिल्ली के मुनिरका इलाके में रहने वाली प्रभा का कहना है कि गत 27 मई को वह घर में अकेली थी। किचन में खाना बनाते वक्त अचानक उसके कपड़ों में आग लग गई। लेफ़्ट बॉडी ऊपर से लेकर नीचे तक जल गई थी। 
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एमबीए कर चुकी प्रभा ने मुंबई में चार साल तक जॉब भी की है। उनके मुताबिक, यह बात तो सही है कि आग की मार के बाद लोग बदल जाते हैं। कई अपने भी दूरी बना लेते हैं। अगर दूसरों के व्यवहार को दिल से लगाएं तो जीना मुश्किल हो जाता है। एक इच्छा को जीवित रखना हमारे लिए किसी चैलेंज से कम नहीं होता। शादी, जॉब और दूसरे कई सामाजिक सरोकारों में बहुत परायापन सा दिखने लगता है।
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पहले खुद स्वीकार करुंगी कि मेरे साथ ऐसा हुआ है

बतौर प्रभा, पहले खुद स्वीकार करुंगी कि मेरे साथ ऐसा हुआ है। मैं ठीक होकर दिखाउंगी। इसके बाद मेरा मकसद है दूसरों की मदद करना। यानी मेरी तरह ही जो लोग आग के शिकार हुए हैं, उन्हें हर तरीके से जीवन में आगे ले जाने का प्रयास करुंगी। हालांकि मैने अपनी मुहिम शुरु भी कर दी है।

फ़िलहाल सोशल मीडिया पर मैं अपने लक्ष्य को आगे बढ़ा रही हूं। दूसरे पीड़ित लोगों की समस्याएं क्या हैं, सामाजिक तौर पर उन्हें क्या झेलना पड़ रहा है, आदि बातों की जानकारी लेकर उनकी दिक्कतों का हल निकालने का प्रयास करेंगे। मैं उनके साथ अपनी स्टोरी शेयर कर रही हूं। पेरेंट्स ने कहा था कि जले हुए हाथ पर कपड़ा बांध कर रखो, लेकिन मैंने मना कर दिया। मैंने कहा, आप उसकी सच को छिपाने के लिए कह रहे हैं, जिसे दुनिया छिपाने पर मजबूर करती है। हरगिज नहीं, मैं ऐसे ही लोगों के बीच आउंगी। इससे मुझे ही नहीं, बल्कि दूसरों में भी सच का सामना करने का कितना साहस है, पता चलेगा।

चेहरे से पेट तक आग की लपटें थी, अब जीवन साथी तक नहीं मिल रहा

know the Pain of Girls Who Burning by Fire 

शीबा जब यूपी के बदायूं में रहती थी तो उसके साथ बडा हादसा हो गया। उसके मुताबिक मिट्टी के तेल से भरा लैंप मेरे उपर गिर गया था। उस वक्त मेरी उम्र करीब दस साल रही होगी। चेहरे से लेकर पेट तक का हिस्सा जल चुका था। परिवार को छोड़ दें तो बाकी लोग धीरे-धीरे किनारा करने लगे थे। सातवीं कक्षा में स्कूल छूट गया। एक बार तो ऐसा भी लगा, जैसे कि कोई साथ ही नहीं दे रहा है।

अब शादी में भी दिक्कत आ रही हैं। देखने वाले आते हैं, चेहरे की ओर निहारते हैं और बाद में बिना कोई जवाब दिए चुपके से निकल जाते हैं। दो साल अस्पताल में रहने और उसके बाद घर पर भी करीब सात वर्ष ईलाज चला। चार भाई और चार बहनें, इन्हें भी तो देखना है। अब ऐसे में कोई प्लास्टिक सर्जरी की सोचे भी तो कैसे सोचे।

भारत में स्किन बैंक की कमी है
डॉ. राजीव बी आहूजा का कहना है कि विदेशों में स्किन बैंक खुलने लगे हैं, लेकिन भारत में अभी यह लोगों के लिए एक कौतूहल का विषय बना है। कोई भी इस तरफ देखना या सोचना पसंद नहीं कर रहा है। सरकार की ओर से लोगों में जागरुकता फैलाने के लिए कुछ नहीं हो रहा है। हमारे देश में चेहरे की सर्जरी करानी है तो कम से कम 25-30 लाख रुपये लग जाते हैं। यह इलाज सबके वश में नहीं है। इसके लिए सरकार और बड़े औद्योगिक घरानों को आगे आने होगा। वे अत्याधुनिक अस्पताल बनवाएं या फिर वर्तमान अस्प्तालों में प्लास्टिक सर्जरी जैसे इलाज को सस्ता करा दें।

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