SC-ST एक्ट : जानें दलित हिंसा के बाद कैसे बदले सरकार के सुर
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अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले से पहले और बाद में केंद्र सरकार के रुख में काफी फर्क आया है। इस बीच यदि कुछ हुआ है तो वह है दो अप्रैल का देशव्यापी दलित आंदोलन।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की बेंच के सामने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए एडिशनल सोलिसीटर जनरल मनिंदर सिंह ने गुजारिश की थी कि मामला प्रथम दृष्टया झूठा लगने पर अग्रिम जमानत दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने इस बाबत राज्य सरकारों के लिए तीन फरवरी 2005, 1अप्रैल 2010 और 23 मई 2016 को एडवाइजरी (सलाह) भी जारी की हैं। मनिंदर सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार ने 2016 में इस अधिनियम में संशोधन कर विशेष अदालतें गठित करने का प्रावधान किया है।
पहले कहा- झूठा केस करने वालों को सजा हो
केंद्र सरकार की ओर से उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकडे़ उद्धृत करते हुए कहा कि 2015 में एससी और एसटी वर्ग के लोगों द्वारा इस कानून के तहत दर्ज कराए गए 15 फीसदी मामले तो सक्षम अधिकारियों द्वारा जांच में ही झूठे पाए गए और उनमें क्लोजर रिपोर्ट लगा दी गई। जो केस अदालतों के समक्ष आए भी उनमें से भी 75 फीसदी मामलों में अपराध सिद्ध नहीं हो पाया।
मनिंदर सिंह ने यह भी कहा कि इस बारे में संसद में भी सवाल उठ चुके हैं कि एससीएसटी एक्ट में झूठे केस दर्ज कराने वालों पर किस सजा का प्रावधान होना चाहिए। केंद्र सरकार ने 19 मार्च 2015 को एक प्रेस रिलीज जारी कर राज्य सरकारों से कहा था कि झूठे मामलों में आईपीसी की उचित धाराओं में केस दर्ज कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
राजनाथ सिंह : सरकार नहीं करना चाहती कानून को कमजोर
बाद में कहा - आदेश पर रोक लगाएं
दंगों के बाद दाखिल रिव्यू पिटीशन पर बहस करते हुए अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में जितने भी तर्क दिए, वे सभी एडिशनल सोलिसीटर जनरल मनिंदर सिंह द्वारा दिए तर्कों के एकदम विपरीत थे। वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार एससीएसटी एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत दिए जाने के सख्त खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इस फैसले के चलते पूरे देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं। हजारों लोग सड़क पर हैं। लिहाजा, इस आदेश पर फिलहाल रोक लगाई जाए। शोषित वर्ग के साथ बहुत अत्याचार होता है। कोर्ट ने जो सात दिनों का वक्त रखा है उस दौरान पीड़ित को डराया-धमकाया जा सकता है। इसलिए गिरफ्तारी से पहले जांच की जरूरत नहीं है।
केंद्र पक्षकार नहीं : गृहमंत्री
तीन अप्रैल को शून्यकाल में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में बयान दिया कि सरकार इस कानून को कतई कमजोर नहीं करना चाहती है। वह तो इसे और मजबूत करने के पक्ष में है। लेकिन चूंकि सरकार उस केस में पक्षकार नहीं थी जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को फैसला सुनाया है, इसलिए वह कुछ भी कर पाने में असमर्थ थी। कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने भी बाद में कहा कि सरकार को औपचारिक रूप से पक्षकार नहीं बनाया गया।
केंद्र का पक्ष एएसजी ने रखा था
लेकिन हकीकत यह है कि सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार (जिसका फैसला 20 मार्च को सुनाया गया) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बाकायदा नोटिस जारी कर इस मामले पर उसका पक्ष जानना चाहा था। एडिशनल सोलिसीटर जनरल मनिंदर सिंह ने केंद्र सरकार की ओर स्थिति स्पष्ट की और कानून को लचीला बनाने की सिफारिश की।