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कौन थे 'दमादम मस्त कलंदर' वाले बाबा लाल शाहबाज
टीम डिजिटल/अमर उजाला
Updated Fri, 17 Feb 2017 10:54 AM IST
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बाबा लाल शाहबाज़ कलंदर की दरगाह
- फोटो : Getty Images
पाकिस्तान में चरमपंथियों ने इस बार बम धमाके के लिए जिस ठिकाने को निशाना बनाया, वो मशहूर सूफी संत लाल शाहबाज़ कलंदर की दरगाह है। बम धमाके में 70 लोग मारे गए हैं और घायलों की संख्या भी दर्जनों में है। पाकिस्तान में पिछले कुछ समय से लगातार चरमपंथी हमले हो रहे हैं।
कहते हैं कि सूफी कवि अमीर ख़ुसरो ने बाबा लाल शाहबाज़ कलंदर के सम्मान में ही 'दमादम मस्त कलंदर' का गीत लिखा था। बाद में इस गीत में बाबा बुल्ले शाह ने कुछ बदलाव किए और 'दमादम मस्त कलंदर' के 'झूलेलाल कलंदर' लाल शाहबाज़ कलंदर ही हैं।
इस गीत की लोकप्रियता दुनिया भर में है और इसी बात से पाकिस्तान की इस दरगाह की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। माना जाता है लाल शाहबाज़ कलंदर के पुरखे बगदाद से ईरान के मशद आकर बस गए थे और फिर वहां से अफगानिस्तान के मरवांद चले गए जहां 'दमादम मस्त कलंदर' वाले बाबा का जन्म हुआ।
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लाल शहबाज कलंदर फ़ारसी ज़ुबान के कवि रूमी के समकालीन थे। उन्होंने इस्लामी दुनिया का सफ़र किया और आखिर में पाकिस्तान के सेहवान आकर बस गए। उन्हें यहीं दफनाया भी गया। कहा जाता है कि 12वीं सदी के आखिर में वे सिंध आ गए थे। उन्होंने सेहवान के मदरसे में पढ़ाया और यहीं पर उन्होंने कई किताबें भी लिखीं।
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कहते हैं कि सूफी कवि अमीर ख़ुसरो ने बाबा लाल शाहबाज़ कलंदर के सम्मान में ही 'दमादम मस्त कलंदर' का गीत लिखा था। बाद में इस गीत में बाबा बुल्ले शाह ने कुछ बदलाव किए और 'दमादम मस्त कलंदर' के 'झूलेलाल कलंदर' लाल शाहबाज़ कलंदर ही हैं।
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इस गीत की लोकप्रियता दुनिया भर में है और इसी बात से पाकिस्तान की इस दरगाह की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। माना जाता है लाल शाहबाज़ कलंदर के पुरखे बगदाद से ईरान के मशद आकर बस गए थे और फिर वहां से अफगानिस्तान के मरवांद चले गए जहां 'दमादम मस्त कलंदर' वाले बाबा का जन्म हुआ।
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लाल शहबाज कलंदर फ़ारसी ज़ुबान के कवि रूमी के समकालीन थे। उन्होंने इस्लामी दुनिया का सफ़र किया और आखिर में पाकिस्तान के सेहवान आकर बस गए। उन्हें यहीं दफनाया भी गया। कहा जाता है कि 12वीं सदी के आखिर में वे सिंध आ गए थे। उन्होंने सेहवान के मदरसे में पढ़ाया और यहीं पर उन्होंने कई किताबें भी लिखीं।
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भारत भी आए लाल शाहबाज़ कलंदर
बाबा लाल शाहबाज कलंदर
- फोटो : Getty Images
उनकी लिखी किताबों में मिज़ान-उस-सुर्फ़, किस्म-ए-दोयुम, अक़्द और ज़ुब्दाह का नाम लिया जाता है। मुल्तान में उनकी दोस्ती तीन और सूफी संतों से हुई जो सूफी मत के 'चार यार' कहलाए। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि लाल शाहबाज़ कलंदर ने पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों के अलावा भारत के दक्षिणी सूबों की भी यात्राएं कीं।
वे मज़हब के जानकार माने जाते थे और उन्हें तुर्की, सिंधी, पश्तो, फारसी, अरबी और संस्कृत में भी महारत हासिल थी। तकरीबन 98 साल की उम्र में 1275 में उनका निधन हुआ और उनकी मौत के बाद 1356 में उनकी क़ब्र के पास दरगाह का निर्माण कराया गया।
उनके मकबरे के लिए ईरान के शाह ने सोने का दरवाजा दिया था। लाल शाहबाज़ कलंदर की मज़ार पर उनकी बरसी के समय सालाना मेला लगता है जिसमें पाकिस्तान के लाखों लोग शरीक होते हैं।
वे मज़हब के जानकार माने जाते थे और उन्हें तुर्की, सिंधी, पश्तो, फारसी, अरबी और संस्कृत में भी महारत हासिल थी। तकरीबन 98 साल की उम्र में 1275 में उनका निधन हुआ और उनकी मौत के बाद 1356 में उनकी क़ब्र के पास दरगाह का निर्माण कराया गया।
उनके मकबरे के लिए ईरान के शाह ने सोने का दरवाजा दिया था। लाल शाहबाज़ कलंदर की मज़ार पर उनकी बरसी के समय सालाना मेला लगता है जिसमें पाकिस्तान के लाखों लोग शरीक होते हैं।