क्या है डोकलाम इलाके का पुराना विवाद, जानिए क्यों चीन ने इसे बनाया नाक का सवाल?
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भूटान के पठार में स्थित डोकलाम को लेकर भारत और चीन के बीच तलवारें लगातार मयान से बाहर आती जा रही हैं, चीन ने हजारों टन सैन्य सामग्री से लैस सैनिक दस्ते को सिक्किम बार्डर के लिए रवाना किया है।
माना जा रहा है कि डोकलाम मुद्दे पर भारत के तल्ख रवैये को देखते हुए चीन ने यह कदम उठाया है जो उसकी पडोसी देशों पर दबाव बनाने की रणनीति का ही एक हिस्सा है। हालांकि इस बार चीन के मंसूबे सफल होते नहीं दिख रहे हैं।
भारत ने डोकलाम पर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि वह यहां से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है, इसी कड़ी में भारतीय जवानों ने इलाके में अपने तंबू भी गाड़ दिए हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि डोकलाम पर पूरा विवाद आखिर है क्या? और क्यों चीन ने उसे भारत के खिलाफ नाक का प्रश्न बना लिया है। यह जानना भी जरूरी है कि आखिर डोकलाम का इतिहास है? आइए एक बार डालते हैं इस पूरे विवाद पर एक नजर।
कहां स्थित है डोकलाम
भौगोलिक रूप से डोकलाम भारत चीन और भूटान बार्डर के तिराहे पर स्थित है। जिसकी भारत के नाथुला पास से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी है। चुंबी घाटी में स्थित डोकलाम सामरिक दृष्टि से भारत और चीन के लिए काफी महत्वपूर्ण है। साल 1988 और 1998 में चीन और भूटान के बीच समझौता हुआ था कि दोनों देश डोकलाम क्षेत्र में शांति बनाए रखने की दिशा में काम करेंगे।
दूसरी ओर साल 1949 में भारत और भूटान के बीच एक संधि हुई थी जिसमें तय हुआ था कि भारत अपने पडोसी देश भूटान की विदेश नीति और रक्षा मामलों का मार्गदर्शन करेगा। साल 2007 में इस मुद्दे पर एक नई दोस्ताना संधि हुई, जिसमें भूटान के भारत से निर्देश लेने की जरूरत को खत्म कर दिया गया और यह वैकल्पिक हो गया।
क्या है विवाद
तमाम विवादित मुद्दों पर इतिहास का संस्मरण देने वाला चीन डोकलाम मुद्दे पर भी कुछ ऐसा ही तर्क दे रहा है। चीन के अनुसार डोकलाम नाम का इस्तेमाल तिब्बती चरवाहे पुराने चारागाह के रूप में करते थे। चीन का ये भी दावा है कि डोकलाम में जाने के लिए 1960 से पहले तक भूटान के चरवाहे उसकी अनुमति लेकर ही जाते थे।
हालांकि एतिहासिक रूप से इसके कोई प्रमाण मौजूद नहीं हैं। असल में इस पूरे विवाद की जड़ ही दूसरी है, डोकलाम का इलाका भारत के लिए सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। भारत के सिक्किम, चीन और भुटान के तिराहे पर स्थित डोकलाम पर चीन हाइवे बनाने की कोशिश में है, जिसका भारतीय खेमा विरोध कर रहा है। उसकी बड़ी वजह ये है कि अगर डोकलाम तक चीन की सुगम आवाजाही हो गई तो फिर वह भारत को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाली चिकन नेक तक अपनी पहुंच और आसान कर सकता है।
भारत क्यों कर रहा है आपत्ति
दूसरी ओर इस इलाके में भारतीय क्षेत्र में सेना ने सड़क निर्माण का काम शुरू कर दिया है, जो चीन के मंसूबों पर लगाम लगाने की भारत की बड़ी कवायद है। भारत की टेंशन ये है कि अगर चीन डोकलाम इलाके में अपना वर्चस्व साबित करने में कामयाब हो गया तो वो 'चिकन नेक' इलाके में बढ़त ले लेगा, जो भारत के लिए नुकसानदायक होगा।
युद्ध की स्थिति में डोकलाम में कब्जा होने का लाभ चीन को मिलेगा जिसकी जद में सिलिगुडी से लेकर उसके आसपास का इलाका आ जाएगा। अगर चीन डोकलाम में अपनी तोपें तैनात करता है तो उसकी जद में भारत का चिकन नेक वाला इलाका आएगा, जिससे पूर्वोत्तर से शेष भारत के कटने का खतरा बना रहेगा।
चीन की इस मंशा को भारत बखूबी समझता है इसलिए वह वहां ड्रैगन को किसी तरह की बढ़त देने के मूड़ में नहीं है। शुरूआत से ही चीन भारतीय सीमा के सामरिक इलाकों में अपनी बढ़त बनाने में लगा है। इसलिए उसने तिब्बत के दूरस्थ पहाड़ी इलाकों तक बड़े हाइवे का निर्माण कर लिया है, जो युद्ध की स्थिति में चीन के सैन्य साजो सामान को चंद घंटों में ही भारतीय सीमा तक पहुंचा सकते हैं। हालांकि जानकारों की मानें तो फिलहाल चीन डोकलाम क्षेत्र में लगातार बयानबाजी और दबाव बनाकर भारतीय खेमे की ताकत और उसकी मोर्चाबंदी की थाह लेना चाहता है।