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जानिए कैसा है इंदिरा कैंटीन का खाना?
बीबीसी, हिंदी
Updated Mon, 20 Nov 2017 08:33 PM IST
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इंदिरा कैंटीन
- फोटो : bbc
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कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की सरकार ने हाल में राजधानी बेंगलुरु में इंदिरा कैंटीन की शुरुआत की थी। यह कैंटीन हर रोज 2 लाख से अधिक लोगों को सस्ता खाना मुहैया कराती है। हम भी कैंटीन की लाइन में लगे और खाना खाया। भीड़भाड़ भरे सिटी मार्केट के नजदीक ही एक इमारत के बाहर सुबह सात बजे के बाद भीड़ इकट्ठा होने लगी थी। साढ़े सात बजे दरवाजा खुला और भीड़ अंदर चली गई। थोड़ी देर की धक्का-मुक्की के बाद लोग लाइन में लग गए। लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। महिला-पुरुष एक छोटी-सी खिड़की के अंदर पैसे देते थे और एक हरे रंग का टोकन लेते थे जिसे काउंटर पर देकर खाना मिलता था।
लोग अपनी पीली थाली लेकर कमरे के अंदर ही किसी टेबल पर या फिर खाना खाने परिसर के बाहर चले जाते थे। मैंने भी टोकन खरीदा और नाश्ते के लिए लाइन में लग गई। नाश्ते में इडली, पोंगल और नारियल की चटनी थी। खाना गर्म, ताजा और स्वादिष्ट था और सबसे खास बात यह थी कि हर पकवान का दाम 5 रुपये थार।
पढ़ें- इंदिरा कैंटीन से भूखे लौटे लोग, उमड़ी भीड़ का संभाल नहीं पाया स्टाफ
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लोग अपनी पीली थाली लेकर कमरे के अंदर ही किसी टेबल पर या फिर खाना खाने परिसर के बाहर चले जाते थे। मैंने भी टोकन खरीदा और नाश्ते के लिए लाइन में लग गई। नाश्ते में इडली, पोंगल और नारियल की चटनी थी। खाना गर्म, ताजा और स्वादिष्ट था और सबसे खास बात यह थी कि हर पकवान का दाम 5 रुपये थार।
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अम्मा कैंटीन मॉडल पर शुरुआत
इंदिरा कैंटीन
- फोटो : bbc
16 अगस्त को जब यह कैंटीन खुली तब इसका नाम भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर रखा गया था। जाहिर है यह विचार तमिलनाडु की अम्मा कैंटीन से उधार लिया गया है। तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने लोगों को सस्ता खाना देने के लिए अम्मा कैंटीन की शुरुआत की थी। अम्मा कैंटीन में भी मैंने एक साल पहले खाना खाया था। वो खाना अच्छा था, लेकिन इंदिरा कैंटीन का खाना उससे अच्छा है। इन कैंटीन के उपभोक्ता खासकर के गरीब होते हैं। इनमें दिहाड़ी मजदूर, ड्राइवर, सुरक्षाकर्मी और भीख मांगने वाले ऐसे लोग भी होते हैं जो दिन में कुछ सौ रुपये या कुछ भी नहीं कमाते हैं। जिनके लिए एक-एक पैसे की कीमत है।
सिक्यॉरिटी गार्ड के तौर पर काम करने वाले मोहम्मद इरशाद अहमद कहते हैं कि वह लगातार इंदिरा कैंटीन ही आते हैं। वह कहते हैं, "खाना बहुत अच्छा है। इससे पहले मैं एक नजदीकी रेस्त्रां में नाश्ता करता था जिसके लिए मुझे 30 रुपये देने पड़ते थे। अब मैं 25 रुपये बचा रहा हूं। यह अच्छी बात है और इस योजना को पूरे राज्य में लागू करना चाहिए।"
एक स्कूल के बाहर फल बेचने वाली लक्ष्मी कहती हैं कि कैंटीन के कारण उन्हें सुबह-सुबह नाश्ता बनाने की मेहनत से आजादी मिल गई है। वह कहती हैं, "सुबह में अब मुझे काफी समय तक खाना बनाने की जरूरत नहीं है। इससे मेरी जिंदगी आसान हो गई है। यहां खाना सस्ता है जिसे में खरीद सकती हूं और जो अच्छा भी है।"
सरकारी खजाने पर बोझ?
कैंटीन के नजदीक ही एक लॉज में रहने वाले मोहन सिंह तीनों वक्त का खाना यहीं खाते हैं। उनका कहना है, "मैं तीनों वक्त के खाने पर 40 रुपये खर्च करता हूं।" मोहन कहते हैं कि बाहर खाना बहुत महंगा है और इससे पहले वह एक दिन में खाने पर 140 रुपये खर्च करते थे। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस तरह की कैंटीन सरकारी खजाने पर बोझ है, लेकिन नेताओं ने इसे प्रसिद्ध बना दिया है क्योंकि इस देश में करोड़ों लोग एक दिन में एक डॉलर से कम पर गुजारा करते हैं।
कई विश्लेषकों का कहना है कि पिछले चुनाव में जयललिता के जीतने का मुख्य कारण अम्मा कैंटीन ही था। कर्नाटक में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इस कैंटीन को स्थापित करने का फैसला राजनीतिक जरूर हो, लेकिन अधिकारी इसका मकसद परोपकार बता रहे हैं।
सिक्यॉरिटी गार्ड के तौर पर काम करने वाले मोहम्मद इरशाद अहमद कहते हैं कि वह लगातार इंदिरा कैंटीन ही आते हैं। वह कहते हैं, "खाना बहुत अच्छा है। इससे पहले मैं एक नजदीकी रेस्त्रां में नाश्ता करता था जिसके लिए मुझे 30 रुपये देने पड़ते थे। अब मैं 25 रुपये बचा रहा हूं। यह अच्छी बात है और इस योजना को पूरे राज्य में लागू करना चाहिए।"
एक स्कूल के बाहर फल बेचने वाली लक्ष्मी कहती हैं कि कैंटीन के कारण उन्हें सुबह-सुबह नाश्ता बनाने की मेहनत से आजादी मिल गई है। वह कहती हैं, "सुबह में अब मुझे काफी समय तक खाना बनाने की जरूरत नहीं है। इससे मेरी जिंदगी आसान हो गई है। यहां खाना सस्ता है जिसे में खरीद सकती हूं और जो अच्छा भी है।"
सरकारी खजाने पर बोझ?
कैंटीन के नजदीक ही एक लॉज में रहने वाले मोहन सिंह तीनों वक्त का खाना यहीं खाते हैं। उनका कहना है, "मैं तीनों वक्त के खाने पर 40 रुपये खर्च करता हूं।" मोहन कहते हैं कि बाहर खाना बहुत महंगा है और इससे पहले वह एक दिन में खाने पर 140 रुपये खर्च करते थे। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस तरह की कैंटीन सरकारी खजाने पर बोझ है, लेकिन नेताओं ने इसे प्रसिद्ध बना दिया है क्योंकि इस देश में करोड़ों लोग एक दिन में एक डॉलर से कम पर गुजारा करते हैं।
कई विश्लेषकों का कहना है कि पिछले चुनाव में जयललिता के जीतने का मुख्य कारण अम्मा कैंटीन ही था। कर्नाटक में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इस कैंटीन को स्थापित करने का फैसला राजनीतिक जरूर हो, लेकिन अधिकारी इसका मकसद परोपकार बता रहे हैं।
पूरे राज्य में कैंटीन खोलने की योजना
इंदिरा कैंटीन
- फोटो : bbc
इस प्रॉजेक्ट के आधिकारिक इंचार्ज मनोज रंजन ने कहा, "हमारे मुख्यमंत्री ने गरीबों को खाना खिलाने का फैसला किया है।" वह कहते हैं, "इस कैंटीन का लक्ष्य प्रवासी आबादी, ड्राइवरों, विद्यार्थियों और काम करने वाले जोड़ों को खाना खिलाना है जिनके पास खाना बनाने के लिए कम समय होता है, लेकिन यह हर किसी के लिए खुली है।" जब अप्रैल में मुख्यमंत्री ने इस योजना की घोषणा की थी तब रंजन की टीम ने दिन-रात काम करके इस योजना को असल शक्ल दी।
आजादी की 70वीं सालगिरह के अगले दिन 16 अगस्त को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेंगलुरु आकर इस कैंटीन का उद्घाटन किया। आज शहर में 152 कैंटीन हैं जो 2 लाख लोगों को खाना देती हैं। रंजन योजना पर कहते हैं कि नवंबर के आखिर तक इसकी संख्या 198 करने की है जो हर रोज 3 लाख लोगों को खाना देगी। इस योजना को जनवरी तक पूरे राज्य में लागू करने की है जिसके तहत 300 से अधिक कैंटीन खुलेंगी।
कैंटीन बंद होने का डर
नाश्ते के बाद हमें दोपहर के खाने के लिए भूख लगने लगी तो हम एक दूसरी इंदिरा कैंटीन पर गए। इस बार हम काफी महंगे इलाके मरखम रोड पर थे जहां भीड़ तो कम थी लेकिन खाना खाने वालों में दफ्तर के कर्मचारी और स्कूल के छात्र भी थे। खाने में चावल और सांबर था जिसने निराश नहीं किया। एक प्रसिद्ध कहावत है कि लोगों के दिलों तक पहुंचने का रास्ता पेट से जाता है। कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव के समय वह जरूर जीतेगी।
मेरे साथ खाना खा रहे वेंकटेश का कहना था कि लोगों में डर है कि अगर सरकार बदली तो यह कैंटीन बंद हो जाएगी। मैंने रंजन से पूछा कि कांग्रेस पार्टी हारी तो क्या ऐसा होगा तो उनका कहना था कि नागरिक केंद्रित योजनाएं जारी रहेंगी, सरकार कौन बनाता है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
आजादी की 70वीं सालगिरह के अगले दिन 16 अगस्त को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेंगलुरु आकर इस कैंटीन का उद्घाटन किया। आज शहर में 152 कैंटीन हैं जो 2 लाख लोगों को खाना देती हैं। रंजन योजना पर कहते हैं कि नवंबर के आखिर तक इसकी संख्या 198 करने की है जो हर रोज 3 लाख लोगों को खाना देगी। इस योजना को जनवरी तक पूरे राज्य में लागू करने की है जिसके तहत 300 से अधिक कैंटीन खुलेंगी।
कैंटीन बंद होने का डर
नाश्ते के बाद हमें दोपहर के खाने के लिए भूख लगने लगी तो हम एक दूसरी इंदिरा कैंटीन पर गए। इस बार हम काफी महंगे इलाके मरखम रोड पर थे जहां भीड़ तो कम थी लेकिन खाना खाने वालों में दफ्तर के कर्मचारी और स्कूल के छात्र भी थे। खाने में चावल और सांबर था जिसने निराश नहीं किया। एक प्रसिद्ध कहावत है कि लोगों के दिलों तक पहुंचने का रास्ता पेट से जाता है। कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव के समय वह जरूर जीतेगी।
मेरे साथ खाना खा रहे वेंकटेश का कहना था कि लोगों में डर है कि अगर सरकार बदली तो यह कैंटीन बंद हो जाएगी। मैंने रंजन से पूछा कि कांग्रेस पार्टी हारी तो क्या ऐसा होगा तो उनका कहना था कि नागरिक केंद्रित योजनाएं जारी रहेंगी, सरकार कौन बनाता है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।