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Kisan Diwas 2021: किसान आंदोलन ने सरकारों और नीति निर्माताओं को क्या सिखाया, समझिए 5 अहम संदेश क्या मिले?
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सार
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गाजीपुर बॉर्डर पर किसान आंदोलन का एक साल (फाइल फोटो)
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Agency
विस्तार
किसानों के साल भर के संघर्ष की जिस वजह से केंद्र सरकार तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए मजबूर हुई उसकी सराहना करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने एक ट्वीट में कहा ‘किसान आंदोलन को एक साल पूरा हो गया है। इस ऐतिहासिक आंदोलन को मौसम के अलावा कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। किसानों ने हमें सिखाया है कि धैर्य के साथ अपने अधिकारों के लिए कैसे लड़ना है। मैं हमारे किसानों के साहस, जज्बे और बलिदान को सलाम करता हूं’।23 दिसंबर को हर साल किसान दिवस मनाया जाता है। इसी मौके पर हम भी यह जानने की कोशिश कर रहे हैं तीन कृषि कानूनों के विरोध में 2020 से शुरू होकर 2021 में स्थगित होने वाले किसान आंदोलन से सरकार, नीति निर्माताओं और आम लोगों को क्या सिखाया है?
1. गैरदलीय आंदोलन भी होता है सफल
किसान आंदोलन में बेशक तीन राज्यों (पंजाब, हरियाणा और यूपी) के ही किसान मुख्य तौर पर हिस्सा ले रहे थे लेकिन यह किसानों का अखिल भारतीय संघर्ष बन गया था जिसे धीरे-धीरे देश भर से लोगों का समर्थन मिला। यह एक प्रकार का गैर-दलीय आंदोलन था। संयुक्त किसान मोर्चा की छत्रछाया में नेताओं ने एक समूह की तरह काम किया।
farmers protest up, किसान आंदोलन
- फोटो :
farmers protest up, किसान आंदोलन
तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन पहले पंजाब में शुरू हुआ, लेकिन धीरे-धीरे हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में फैल गया। बाद में किसानों ने इसे राष्ट्रीय राजधानी में ले जाने का फैसला किया। लेकिन इसने देश का ध्यान तभी खींचा जब किसानों ने पिछले साल 26 नवंबर को दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर मार्च किया और यहां डेरा डालकर बैठ गए। इसे स्वतंत्र भारत का सबसे लंबा कृषि आंदोलन कहा जा रहा है। वे एकजुट थे इसलिए उनके विरोध को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया।
2.अहिंसक आंदोलन ही सही रास्ता
इसके स्पष्ट और जोरदार संकेत हैं कि आंदोलन को सफल बनाने के लिए हिंसक होना जरूरी नहीं है। जब इस साल की शुरुआत में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के एक वर्ग पर कथित तौर पर हिंसक होने का आरोप लगे तो यह आंदोलन के लिए एक झटका था। लेकिन आंदोलन ने समय रहते उस खतरे को पहचान लिया कि अब उन्हें राष्ट्र-विरोधी और देशद्रोही कहा जा सकता है। इसलिए वे संभले और अपने आंदोलन को हिंसामुक्त रखने के वादे पर डटे रहे। हालांकि लोगों ने कयास लगाया था कि यूनियन में विभिन्न विचारधारा के लोग है लिहाजा यह आंदोलन किसी भी समय खत्म हो सकता है। किसी को भी उनके इतने दिनों तक एक साथ रहने की उम्मीद नहीं थी।
2.अहिंसक आंदोलन ही सही रास्ता
इसके स्पष्ट और जोरदार संकेत हैं कि आंदोलन को सफल बनाने के लिए हिंसक होना जरूरी नहीं है। जब इस साल की शुरुआत में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के एक वर्ग पर कथित तौर पर हिंसक होने का आरोप लगे तो यह आंदोलन के लिए एक झटका था। लेकिन आंदोलन ने समय रहते उस खतरे को पहचान लिया कि अब उन्हें राष्ट्र-विरोधी और देशद्रोही कहा जा सकता है। इसलिए वे संभले और अपने आंदोलन को हिंसामुक्त रखने के वादे पर डटे रहे। हालांकि लोगों ने कयास लगाया था कि यूनियन में विभिन्न विचारधारा के लोग है लिहाजा यह आंदोलन किसी भी समय खत्म हो सकता है। किसी को भी उनके इतने दिनों तक एक साथ रहने की उम्मीद नहीं थी।
farmers protest up, किसान आंदोलन
- फोटो :
अमर उजाला
3.हार नहीं मानना
किसान आंदोलन ने यह भी सिखाया कि हार नहीं मानना है। किसान संघों ने पहली बार सितंबर 2020 में भारत बंद का आह्वान किया था, लेकिन सरकार ने उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज किया। कुछ समय बाद सरकार के साथ बातचीत शुरू हुई लेकिन हर बार गतिरोध पैदा हुआ। किसान कृषि कानूनों को जल्द ही निरस्त करने की मांग कर रहे थे लेकिन सरकार ने उनकी नहीं सुनी। पर किसान हार नहीं माने। सर्द मौसम में भी उन्होंने अपना विरोध जारी रखा।
जानकार कहते हैं कि किसान आंदोलन से युवा पीढ़ी ने यह देखा कि किसानों में अटूट इच्छाशक्ति होती है और वे अविश्वसनीय कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं। जबकि उन्हें मानसिक तौर पर तोड़ने की कई कोशिशें की गईं। कई प्रदर्शनकारियों को दंगा करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। किसानों के लिए इंटरनेट का उपयोग करने पर रोक लगा दी गई, फिर भी आंदोलन चलता रहा। सितंबर में मुजफ्फरनगर में किसान महापंचायत में करीब पांच लाख किसानों ने भाग लिया था। यूपी के इस शहर के आसपास के 20 किमी के दायरे में सड़कें ट्रैक्टरों और कृषि वाहनों से ठप हो गई थी।
किसान आंदोलन ने यह भी सिखाया कि हार नहीं मानना है। किसान संघों ने पहली बार सितंबर 2020 में भारत बंद का आह्वान किया था, लेकिन सरकार ने उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज किया। कुछ समय बाद सरकार के साथ बातचीत शुरू हुई लेकिन हर बार गतिरोध पैदा हुआ। किसान कृषि कानूनों को जल्द ही निरस्त करने की मांग कर रहे थे लेकिन सरकार ने उनकी नहीं सुनी। पर किसान हार नहीं माने। सर्द मौसम में भी उन्होंने अपना विरोध जारी रखा।
जानकार कहते हैं कि किसान आंदोलन से युवा पीढ़ी ने यह देखा कि किसानों में अटूट इच्छाशक्ति होती है और वे अविश्वसनीय कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं। जबकि उन्हें मानसिक तौर पर तोड़ने की कई कोशिशें की गईं। कई प्रदर्शनकारियों को दंगा करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। किसानों के लिए इंटरनेट का उपयोग करने पर रोक लगा दी गई, फिर भी आंदोलन चलता रहा। सितंबर में मुजफ्फरनगर में किसान महापंचायत में करीब पांच लाख किसानों ने भाग लिया था। यूपी के इस शहर के आसपास के 20 किमी के दायरे में सड़कें ट्रैक्टरों और कृषि वाहनों से ठप हो गई थी।
राज्यसभा में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर (फाइल फोटो)
- फोटो :
पीटीआई
4.किसानों की राय लेना जरूरी बनेगा
कृषि मामलों के विशेषज्ञ और रूरल व्हाइस के प्रमुख संपादक हरवीर सिंह के मुताबिक सरकार को तीन कृषि कानूनों को लेकर अपने कदम पीछे खींचने पड़े इसका श्रेय किसान आंदोलन को ही जाता है। अब किसानों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। इतनी बड़ी उपलब्धि किसी भी आंदोलन को नहीं मिली। किसानों का एक समूह बन गया है और भविष्य में भी यह किसान संगठन एक बड़ी ताकत बनेंगे। नीति निर्माण में भी उनकी भूमिका बदलेगी और खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों पर अब सरकार और नीति निर्माताओं के लिए उनकी राय लेना जरूरी होगा।
कृषि मामलों के विशेषज्ञ और रूरल व्हाइस के प्रमुख संपादक हरवीर सिंह के मुताबिक सरकार को तीन कृषि कानूनों को लेकर अपने कदम पीछे खींचने पड़े इसका श्रेय किसान आंदोलन को ही जाता है। अब किसानों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। इतनी बड़ी उपलब्धि किसी भी आंदोलन को नहीं मिली। किसानों का एक समूह बन गया है और भविष्य में भी यह किसान संगठन एक बड़ी ताकत बनेंगे। नीति निर्माण में भी उनकी भूमिका बदलेगी और खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों पर अब सरकार और नीति निर्माताओं के लिए उनकी राय लेना जरूरी होगा।
5.बाजार के भरोसे नहीं बैठा जा सकता
एक अन्य विश्लेषक के मुताबिक किसान आंदोलन ने सरकारों को यह सबक दिया कि वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बाजार की अनिश्चितताओं और नीति निर्माण में बयानबाजी और भावनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। किसानों ने जो मांगे उठाई हैं उनकी मांगों को स्वीकार करने के अलावा अब सरकारों के लिए यह भी जरूरी होगा कि वे किसानों को कॉरपोरेट के कहे रास्ते पर चलने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। किसानों ने अपने आंदोलन से साफ कर दिया कि वे बाहरी ताकतों (यहां कॉर्पोरेट) के बहकावे में नहीं आना चाहती है। किसान इन ताकतों से प्रभावित होने के बजाए खेती-किसानी में यह स्पष्टता चाहते हैं कि वे खेतों में जो उगाएं सरकार उन्हें उसका उचित मूल्य मिले यानी उत्पादकों को उच्च स्तर का लाभ मिले।
उनके मुताबिक किसानों के उत्पाद को स्टोर करने के लिए कोई कोल्ड स्टोरेज, प्रसंस्करण इकाइयां या टिन शेड भी नहीं हैं। एक बार फसल बाजार लेकर जाने के बाद यदि उचित कीमत नहीं मिलती है तो दोबारा जाने पर उनकी परिवहन लागत भी कवर नहीं की जाती है। एक रिपोर्ट में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण हुई बेमौसम बारिश के कारण किसानों को फसल की 60 प्रतिशत फसल का नुकसान हो रहा है। अब किसान किसी तरह के दया भाव पर नहीं रहना चाहते, यह देश के लिए शुभ संकेत हैं।
एक अन्य विश्लेषक के मुताबिक किसान आंदोलन ने सरकारों को यह सबक दिया कि वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बाजार की अनिश्चितताओं और नीति निर्माण में बयानबाजी और भावनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। किसानों ने जो मांगे उठाई हैं उनकी मांगों को स्वीकार करने के अलावा अब सरकारों के लिए यह भी जरूरी होगा कि वे किसानों को कॉरपोरेट के कहे रास्ते पर चलने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। किसानों ने अपने आंदोलन से साफ कर दिया कि वे बाहरी ताकतों (यहां कॉर्पोरेट) के बहकावे में नहीं आना चाहती है। किसान इन ताकतों से प्रभावित होने के बजाए खेती-किसानी में यह स्पष्टता चाहते हैं कि वे खेतों में जो उगाएं सरकार उन्हें उसका उचित मूल्य मिले यानी उत्पादकों को उच्च स्तर का लाभ मिले।
उनके मुताबिक किसानों के उत्पाद को स्टोर करने के लिए कोई कोल्ड स्टोरेज, प्रसंस्करण इकाइयां या टिन शेड भी नहीं हैं। एक बार फसल बाजार लेकर जाने के बाद यदि उचित कीमत नहीं मिलती है तो दोबारा जाने पर उनकी परिवहन लागत भी कवर नहीं की जाती है। एक रिपोर्ट में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण हुई बेमौसम बारिश के कारण किसानों को फसल की 60 प्रतिशत फसल का नुकसान हो रहा है। अब किसान किसी तरह के दया भाव पर नहीं रहना चाहते, यह देश के लिए शुभ संकेत हैं।