{"_id":"56e2146d4f1c1bb34c8b456b","slug":"kidney-transplant","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"किडनी प्रत्यारोपण हुआ और भी आसान, जरूरी नहीं होगा मेल कराना","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
किडनी प्रत्यारोपण हुआ और भी आसान, जरूरी नहीं होगा मेल कराना
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस / वाशिंगटन
Updated Fri, 11 Mar 2016 06:21 AM IST
सार
- बेमेल दानदाता की किडनी का प्रत्यारोपण संभव
- रोगी के ‘इम्यून सिस्टम’ में बदलाव की प्रक्रिया पर हुआ शोध
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
नई किडनी के प्रत्यारोपण के इंतजार में बैठे दुनिया के लाखों लोगों की राह अब आसान हो गई है। वर्तमान में बेमेल दानदाता से प्राप्त किडनी यदि रोगी के ‘इम्यून सिस्टम’ से मेल नहीं खाती है तो प्रत्यारोपण नहीं हो पाता है और कई बार किडनी के अभाव में रोगी की मौत तक हो जाती है। लेकिन अब मेडिकल साइंस में ऐसी प्रक्रिया पर शोध हुआ है जिसमें मिलान न होने के बावजूद शरीर के अंग सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं।
विज्ञापन
‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में प्रकाशित नई शोध रिपोर्ट के मुताबिक डॉक्टरों ने रोगी के ‘इम्यून सिस्टम’ के भीतर ऐसा बदलाव करने में सफलता पाई है जिसमें रोगी का शरीर किसी भी बेमेल दानदाता की किडनी को ग्रहण करने योग्य हो जाता है। डॉक्टरों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। इस प्रक्रिया को शोधकर्ताओं ने ‘डेसेंसिटिजेशन’ का नाम दिया है। यह प्रक्रिया ‘फेफड़ों’ और ‘लिवर’ के प्रत्यारोपण के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
विज्ञापन
यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया के मेडिसिन स्कूल में किडनी विशेषज्ञ और अमेरिकी नेशनल किडनी फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. जेफरी बर्नस ने बताया कि इस नई प्रक्रिया के बाद कई रोगियों की जिंदगी बच सकती है। शोध टीम के लीडर और प्रत्यारोपण सर्जन डॉ. डॉरी सेजेव ने भी इसकी तस्दीक की और बताया कि अस्पतालों में किडनी फेल्योर के असंख्य मरीजों की डायलिसिस के दौरान अक्सर मौत तक हो जाती है।
विज्ञापन
ऐसी है नई प्रक्रिया
‘डेसेंसिटिजेशन’ प्रक्रिया में सबसे पहले रोगी के खून से ‘एंटी-बॉडीज’ को फिल्टर किया जाता है, उसके बाद अन्य व्यक्ति की एंटी-बॉडीज को इसमें मिलाया जाता है। इस दौरान काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। इस बीच इम्यून सिस्टम अपनी अलग एंटी-बॉडीज का निर्माण कर लेते हैं। यह नए एंटी-बॉडीज अन्य व्यक्ति के नए अंग को स्वीकार करते वक्त अधिक हमलावर नहीं हो पाते हैं। इस प्रक्रिया में ‘श्वेत रक्त कोशिका’ में भी ऐसे बदलाव किए जाते हैं ताकि वे नई किडनी पर हमला न कर सकें।
काफी महंगी है यह प्रक्रिया
अमेरिका में इलाज के दौरान मरीज के लिए यह प्रक्रिया काफी महंगी पड़ेगी। इस पर करीब भारतीय मुद्रा के हिसाब से बीस लाख रुपये का खर्च आएगा। जबकि प्रत्यारोपण का खर्च अलग से उठाना होगा। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि यह महंगा सौदा नहीं है, क्योंकि डायलिसिस पर पूरी जिंदगी हर साल होने वाला खर्च इससे कहीं ज्यादा हो जाता है।
आठ साल से चल रहा है प्रयोग
अमेरिका में पिछले 8 वर्षों के दौरान यह प्रक्रिया 22 मेडिकल केंद्रों पर अपनाते हुए 1,025 रोगियों पर इसका प्रयोग किया गया। इस दौरान पाया गया कि 76.5 प्रतिशत रोगियों को बेमेल किडनी प्रत्यारोपित करने के बावजूद वे आठवें साल में भी जीवन का आनंद उठा रहे हैं।
काफी महंगी है यह प्रक्रिया
अमेरिका में इलाज के दौरान मरीज के लिए यह प्रक्रिया काफी महंगी पड़ेगी। इस पर करीब भारतीय मुद्रा के हिसाब से बीस लाख रुपये का खर्च आएगा। जबकि प्रत्यारोपण का खर्च अलग से उठाना होगा। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि यह महंगा सौदा नहीं है, क्योंकि डायलिसिस पर पूरी जिंदगी हर साल होने वाला खर्च इससे कहीं ज्यादा हो जाता है।
आठ साल से चल रहा है प्रयोग
अमेरिका में पिछले 8 वर्षों के दौरान यह प्रक्रिया 22 मेडिकल केंद्रों पर अपनाते हुए 1,025 रोगियों पर इसका प्रयोग किया गया। इस दौरान पाया गया कि 76.5 प्रतिशत रोगियों को बेमेल किडनी प्रत्यारोपित करने के बावजूद वे आठवें साल में भी जीवन का आनंद उठा रहे हैं।